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पर्यावरणः एक विवादास्पद कदम

ऐसी आशंका है कि प्रस्तावित संशोधन वन संसाधनों पर छोटे स्तर के पारंपरिक उपयोगकर्ताओं को बेदखल कर देंगे और एक वैध बहाने की आड़ में वनों के व्यावसायिक दोहन के लिए एक बड़ा चोर दरवाजा खोल देंगे

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हरित क्षेत्र छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में वन से ढकी कलवार नागुर की पहाड़ियां हरित क्षेत्र छत्तीसगढ़ के बालोद जिले में वन से ढकी कलवार नागुर की पहाड़ियां

भारत के वन क्षेत्र के संरक्षण के लिए 1980 का वन संरक्षण अधिनियम (एफसीए) अस्तित्व में आया था. इसे फिर से संशोधित करने (1988 और 1996 में भी संशोधन हो चुके हैं) का प्रस्ताव है और भारत के हरित आवरण के विस्तार के घोषित उद्देश्यों को लेकर इसे कम कठोर बनाया जाना है. 1 अक्तूबर को जारी केंद्र के परामर्श पत्र का जवाब देने के लिए राज्य सरकारों और अन्य हितधारकों के लिए 1 नवंबर तक की समय सीमा तय की गई है.

प्रस्तावित संशोधनों का घोषित तर्क निजी भूमि पर वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करना है. यह तर्क दिया जाता है कि भारत के लिए अपनी वैश्विक पर्यावरणीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने का यह एकमात्र व्यवहार्य तरीका है. भारत ने अपने एनडीसी (राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान) लक्ष्य के तहत 2030 तक अतिरिक्त 2.5-3 अरब टन 'कार्बन सिंक' तैयार करने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है. इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारत के वृक्ष आच्छादन को वर्तमान 21.6 प्रतिशत (2019 की वन रिपोर्ट के अनुसार) से बढ़ाकर देश के भौगोलिक क्षेत्र के एक तिहाई तक करना जरूरी है. ('कार्बन सिंक' ऐसे प्राकृतिक या कृत्रिम कोश हैं—जैसे कि वनस्पति और महासागर—जो कार्बन यौगिकों को संग्रहीत करते हैं जिससे वातावरण में कार्बन-डाइ-ऑक्साइड की मात्रा कम हो जाती है. ये ग्लोबल वार्मिंग को कम करने में महत्वपूर्ण हैं.)

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की प्रस्तावित संशोधनों के पीछे अतिरिक्त वजहें दिखती हैं—'विकास परियोजनाओं' की राह सुगम करना और लकड़ी/लकड़ी के उत्पादों के आयात को कम करना, जिसपर विदेशी मुद्रा में अनुमानित 45,000 करोड़ रू. खर्च होते हैं. सरकार यह भी चाहती है कि हितधारक इस बात पर विचार करें कि क्या 'रणनीतिक' परियोजनाओं (जैसे अंतरराष्ट्रीय सीमाओं की सुरक्षा के लिए बुनियादी ढांचे का विकास) या 1980 से पहले रेलवे और राजमार्गों के लिए अधिग्रहित भूमि (जब एफसीए लागू हुआ) को एफसीए मंजूरी की जरूरत होनी चाहिए.

ऐसी आशंका है कि प्रस्तावित संशोधन वन संसाधनों के पारंपरिक छोटे स्तर के उपयोगकर्ताओं को बेदखल कर देंगे और वृक्षों के आवरण को बढ़ाने के लिए निजी 'वन' भूमि पर वृक्षारोपण को प्रोत्साहित करने के एक वैध बहाने की आड़ में वनों के व्यावसायिक दोहन के लिए एक बड़ा चोर दरवाजा खोल देंगे. इसके अलावा, प्रस्तावित संशोधन सुप्रीम कोर्ट के एक ऐतिहासिक फैसले (1996 का टी.एन. गोदावर्मन थिरुमुलपाड बनाम भारत सरकार मामला) की भी अवहेलना करते हैं, जिसने सभी 'वन' भूमि, न कि केवल वह भूमि जो अधिसूचित वन क्षेत्र के अंतर्गत आती है, को किसी भी परियोजना के तहत शामिल करने के लिए वैधानिक मंजूरी की जरूरतें बढ़ाई थीं.

प्रस्तावित संशोधनों को लेकर संदेह के केंद्र में जो सवाल है: जब व्यवसायों के लिए वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग को आसान बनाया जा रहा हो तो क्या वन क्षेत्र का वाकई विस्तार करना संभव होगा? सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च, नई दिल्ली की वरिष्ठ शोधकर्ता कांची कोहली कहती हैं, ''प्रस्तावित संशोधनों से पता चलता है कि 'वन' आच्छादन (फॉरेस्ट कवर) की जगह 'ग्रीन' कवर (हरित क्षेत्र) का इस्तेमाल करके बस शब्दों के हेरफेर से भ्रमित करने की कोशिश हो रही है. वन कई चीजों को समाहित करता है, जिसमें उन पर निर्भर समुदायों का जीवन भी शामिल है. यह धारणा कि वृक्षारोपण के लिए उपलब्ध मुक्त भूमि का उपयोग करके उस उद्देश्य को पूरा किया जाएगा, अनुमान पर आधारित विचार है. इन खाली जमीनों को सरकार अधिग्रहित कर सकती है या किसी निजी एजेंसी की ओर से किसी भी उपयोग में लाया जा सकता है. बड़ा मुद्दा यह है कि जंगलों को अर्थव्यवस्था में योगदानकर्ता के रूप में देखा ही नहीं जाता है.''

भारतीय वन सेवा के पूर्व अधिकारी मनोज मिश्र कहते हैं कि भूमि उपयोग परिवर्तन का मुद्दा जिसकी बात एफसीए करता है (वन भूमि के गैर-वन उपयोग पर प्रतिबंध लगाना) को पेड़ों को काटने की अनुमति देने की प्रक्रिया के साथ भ्रमित किया जा रहा है. मिश्र कहते हैं, ''संशोधन में जिन छूटों पर विचार किया जा रहा है, वे गलत हैं और 'गैर-प्रतिगमन के सिद्धांत' [पर्यावरण कानून में] के खिलाफ हैं.'' (गैर-प्रतिगमन या नॉन रिग्रेशन का सिद्धांत कानून में संशोधन की अनुमति देता है, सिर्फ तब तक जब तक कि वे कानून के मौलिक उद्देश्यों का हनन नहीं करते हैं.) मिश्र कहते हैं कि निजी भूमि पर हरित आवरण या वृक्षारोपण का लक्ष्य इससे जुड़ा है कि उन पेड़ों को काटने की अनुमति पाना कितना आसान होगा. वे कहते हैं, ''कई राज्यों ने कटाई के नियमों में ढील दी जिससे वृक्षारोपण को बढ़ावा मिला है.''

एफसीए के तहत वन सलाहकार समिति (एफएसी) ने वनों के संरक्षण या कम से कम वन भूमि के उपयोग परिवर्तन को धीमा करने में अहम भूमिका निभाई है. वन मंत्रालय के अनुसार, 1950 और 1980 के बीच, लगभग 45 लाख हेक्टेयर वन भूमि (औसतन 1,50,000 हेक्टेयर प्रति वर्ष) को गैर-वन उपयोग के लिए मोड़ दिया गया था. एफसीए के प्रभावी होने के बाद, 2000 के दशक की शुरुआत तक, इस तरह के उपयोग परिवर्तन औसतन 16,000 हेक्टेयर प्रति वर्ष हो गए थे. मंत्रालय का दावा है कि एफसीए के अस्तित्व में आने के 40 वर्षों में, केवल 15 लाख हेक्टेयर वन भूमि का ही उपयोग बदला जा सका है.

दशकों से हमारे जंगल किधर जाते रहे हैं? 1950 और 1980 के बीच, उपयोग परिवर्तन की गई वन भूमि का 60 प्रतिशत कृषि कार्यों के लिए दे दिया गया; 3 प्रतिशत उद्योगों और शहरों के लिए गया; 1.5 प्रतिशत सड़कों और बिजली लाइनों के लिए लिया गया था. लगभग 12 प्रतिशत का उपयोग बांध बनाने के लिए किया गया था. 1980 के बाद, जब एफसीए लागू हुआ, 15 लाख हेक्टेयर में से लगभग 35 प्रतिशत खनन के अंतर्गत आया; सड़कों और बिजली लाइनों ने 8 प्रतिशत लिया; बांध और नहरों के हिस्से 10 प्रतिशत वन क्षेत्र गए. अन्य 10 प्रतिशत का उपयोग रणनीतिक और रक्षा परियोजनाओं के लिए और 8 प्रतिशत ताप/जल विद्युत परियोजनाओं के लिए किया गया था.

वन और पर्यावरण मंत्रालय के अवधारणा पत्र पर मिश्रित प्रतिक्रियाएं आई हैं. वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट की मुख्य अर्थशास्त्री डॉ. मधु वर्मा कहती हैं, ''प्रस्तावित संशोधनों को पर्यावरण की स्थिति की समग्र तस्वीर के परिप्रेक्ष्य में रखना होगा. अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन, जैसे बॉन चैलेंज, 2030 तक 35 करोड़ हेक्टेयर से अधिक भूमि क्षरण को रोकने का लक्ष्य रखते हैं (अनिवार्य रूप से 35 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर फिर से वन लगाना जिनकी कटाई हो चुकी है). इन प्रतिबद्धताओं पर क्या प्रभाव पड़ेगा?''

माकपा नेता वृंदा करात ने पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव को पत्र लिखकर कहा है कि एफसीए में प्रस्तावित संशोधन से कॉर्पोरेट्स के लिए वनों का 'अधिग्रहण' आसान हो जाएगा. हालांकि मध्य प्रदेश के पूर्व प्रधान वन संरक्षक आर.एन. सक्सेना कहते हैं, ''एफसीए को कभी भी निजी भूमि पर लागू नहीं किया जाना चाहिए था. वन आवरण को बढ़ावा देने में इसका उलटा असर हुआ है.'' हालांकि, वे 1980 से पहले रेलवे और राजमार्गों के लिए आवंटित भूमि के लिए एफसीए मंजूरी को माफ करने के प्रस्तावित कदम को लेकर आगाह भी करते हैं. वे कहते हैं, ''भारतीय वन अधिनियम ने केवल वनों को अधिसूचित किए बिना विकास परियोजनाओं के लिए स्वीकृति दी थी. इन परियोजनाओं को एफसीए की मंजूरी की आवश्यकता से मुक्त कर देने से वन्यजीवों, विशेषकर हाथियों पर असर पड़ेगा.''

क्या निजी वन भूमि को वृक्षारोपण के लिए मुक्त करके भारत को हरा-भरा करने का सरकार का घोषित एजेंडा एक व्यवहार्य लक्ष्य है? क्या संशोधित एफसीए के दायरे से बाहर 'वन' भूमि के अत्यधिक दोहन पर उचित प्रतिबंध लगाया जा सकता है? क्या संशोधन बड़े उद्देश्यों की पूर्ति में सक्षम हैं? नीति नियंताओं के पास अभी भी इन सवालों के सही जबाव नहीं है.

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