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पश्चिम बंगालः पस्त हौसले से परेशान

भाजपा के भीतर हड़कंप-सा मचा हुआ है. उसके विधायकों की तादाद 77 से घटकर 72 रह गई है, कई अन्य भी पाला बदलने को तैयार दिखते हैं

दीदी पर नजर ममता सरकार के खिलाफ शिकायतें लेकर 13 जुलाई को राज्यपाल धनखड़ से मिलने राजभवन पहुंचे भाजपा नेता दीदी पर नजर ममता सरकार के खिलाफ शिकायतें लेकर 13 जुलाई को राज्यपाल धनखड़ से मिलने राजभवन पहुंचे भाजपा नेता

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद भाजपा ने अपने काडर में नए सिरे से प्राण फूंकने के लिए अगस्त में पूरे महीने अभियान चलाया. सेबायी संगठन (संगठन का अर्थ है सेवा) नाम से चले इस अभियान का उद्देश्य सामाजिक कल्याण गतिविधियों के माध्यम से सद्भावना पैदा करना था, लेकिन पर्याप्त कार्यकर्ता न मिल पाने से अभियान सिरे न चढ़ पाया. भाजपा ने राज्य भर में करीब 1,60,000 बूथ स्तर कार्यकर्ताओं को इसमें लगाने की उम्मीद की थी पर आए बमुश्किल 3,000.

बीती 24-25 अगस्त को संगठनात्मक शक्ति की समीक्षा के लिए कोलकाता और दुर्गापुर में हुई बैठकों के दौरान पार्टी में मायूसी के मौजूदा माहौल के और भी सबूत सामने आए. राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव (संगठन) शिवप्रकाश की मौजूदगी में कई जिलों के मंडल अध्यक्षों ने स्वीकारा कि राज्यस्तरीय और केंद्रीय नेताओं को अपने बीच न पाने से काडर का मोहभंग हो गया है. दक्षिण 24 परगना के एक मंडल अध्यक्ष ने नाम न छापने का अनुरोध करते हुए कहा कि ''हमारे लगभग एक-चौथाई कार्यकर्ता सक्रिय राजनीति से दूर हो गए हैं. डर या हताशा के कारण तृणमूल कांग्रेस में शामिल होने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है. हमारे नेता उन्हें वापस लाने को कह रहे हैं पर यह बहुत मुश्किल लग रहा है.''

दरअसल, कार्यकर्ताओं के पार्टी छोड़ कर जाने के बीच भाजपा बंगाल में अपना आधार बनाए रखने की लड़ाई लड़ रही है. 294 सदस्यीय विधानसभा में पार्टी की ताकत 77 विधायकों से घटकर 72 हो गई है. तीन विधायक तृणमूल कांग्रेस में चले गए, जबकि दो लोकसभा सांसदों निशीथ प्रमाणिक और जगन्नाथ सरकार—ने संसद में बने रहने को विधानसभा सीटें छोड़ दीं. बड़ी चुनावी जीत की उम्मीद में भाजपा में शामिल हुए बहुत से तृणमूल नेताओं ने पार्टी छोड़ दी है. सत्ताधारी दल पर उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए भी कई कार्यकर्ता भाजपा छोड़ रहे या निष्क्रिय हो गए हैं.

संघ का अनुसरण करें

समर्थकों को फिर से पार्टी से जोड़ने का भाजपा का प्रयास राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सामाजिक कल्याण वाली युक्ति से प्रेरित है. बंगाल के आदिवासियों के बीच पैठ बनाने के लिए संघ दशकों से समाज सेवा पर भरोसा करता रहा है. बंगाल में इसकी 1,600 शाखाएं हैं और यह शिक्षा तथा ग्रामीण विकास सहित लगभग 250 कार्यक्रमों का संचालन करता है. संघ के एक नेता बताते हैं, ''सेबायी संगठन ग्रामीण विकास के लिए संसाधन और आजीविका सृजन तथा आत्मनिर्भरता को प्रोत्साहित करने के संघ के मिशन पर आधारित घर-घर पहुंचने वाला अभियान है.'' संघ बंगाल में तीसरी कोविड लहर की आशंका में करीब 1,00,000 स्वयंसेवकों को प्रशिक्षित भी कर रहा है.

बंगाल में सात विधानसभा सीटों के लिए उपचुनाव के मद्देनजर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जे.पी. नड्डा ने हाल ही में राज्य इकाई के प्रमुख दिलीप घोष के साथ बातचीत में पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल ऊंचा रखने की जरूरत पर जोर दिया. घोष कहते हैं, ''कार्यकर्ताओं को ऊर्जान्वित करने के लिए उन्हें जन कल्याण में शामिल करने से बेहतर तरीका क्या हो सकता है?'' कोविड प्रबंधन एक प्रमुख सेवा क्षेत्र है. ''हमारे स्वास्थ्य स्वयंसेवक अस्पताल में भर्ती होने या ऑक्सीजन सिलेंडर की आपूर्ति में मदद करेंगे. सेबायी संगठन बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं के लिए कोविड टीकाकरण भी पक्का कर रहा है. अपने लोगों के लिए टीके उपलब्ध कराने को हमें जिलों में प्रखंड विकास कार्यालयों पर डेरा डालना पड़ा. तृणमूल के नियंत्रण वाली नगर पालिकाएं, निगम और स्वास्थ्य केंद्र उन्हें टीकों से वंचित रख रहे थे.''

अपनी उपस्थिति नए सिरे से जताने के लिए भाजपा ने 19 से 21 अगस्त के बीच कूचबिहार, अलीपुरदुआर, बांकुड़ा और उत्तर 24 परगना से 'लांग मार्च' निकाले. ये मुख्यत: वे क्षेत्र हैं जहां पार्टी को विधानसभा चुनावों में जीत हासिल हुई थी. इसके अलावा, 9 से 16 अगस्त तक राजनैतिक कार्यक्रमों की एक शृंखला आयोजित की गई. 16 अगस्त को 'पश्चिमबंग बचाओ दिवस' का आयोजन करके उसी दिन ममता की पार्टी की ओर से आयोजित 'खेला होबे दिवस' का जवाब दिया गया. भाजपा ने सड़कों के किनारे छोटी-छोटी बैठकें कीं और 'बंगाली हिंदुओं की मातृभूमि' के रूप में पश्चिम बंगाल के सृजन में श्यामा प्रसाद मुखर्जी के योगदान पर प्रकाश डाला.

कुल 213 सीटों के साथ विधानसभा में तृणमूल की प्रभावशाली उपस्थिति है, लेकिन कुछ भाजपा नेताओं को विधानसभा चुनाव में अपनी पार्टी का 2.28 करोड़ वोट हासिल करना सुखद लग रहा है. यह संख्या तृणमूल को मिले मतों की तुलना में लगभग 60 लाख ही कम है. उनका तर्क है कि यह अंतर राज्य के कुल 1,10,000 चुनाव बूथों में से प्रत्येक में औसतन सिर्फ 50 वोटों का अंतर है. घोष कहते हैं, ''पिछले विधानसभा चुनाव (2016) में केवल तीन सीटें जीतने के मद्देनजर यह कोई मामूली उपलब्धि नहीं है. लेकिन मीडिया केवल इस बारे में बात कर रहा है कि हमारा चुनावी पूर्वानुमान कितना गलत निकला. वे इस पर प्रकाश नहीं डाल रहे कि हम अपने कार्यकर्ताओं (चुनाव-पश्चात हिंसा के बाद) के साथ कैसे खड़े रहे हैं, उन्हें कानूनी सहायता, आश्रय और भोजन प्रदान किया है.''

हिंसा पर राजनीति

भाजपा का दावा है कि तृणमूल के सत्ता में लौटने के बाद उसके 7,500 समर्थकों को झूठे मामलों में फंसाया गया है और पार्टी उनमें से 5,500 को कानूनी और वित्तीय सहायता दे रही है. ममता को घेरने के लिए भाजपा चुनाव बाद हुई ज्यादतियों के लिए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की ओर से सरकार को दोषी ठहराने और कलकत्ता हाइ कोर्ट के बलात्कार तथा हत्या जैसे जघन्य मामलों की जांच सीबीआइ को सौंपने का उल्लेख कर रही है.

बंगाल में चुनाव बाद की हिंसा पर जुलाई में आई मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट में राज्य की तत्कालीन स्थितियों का उल्लेख 'कानून का शासन' के बजाए 'शासक का कानून' की स्थिति के रूप में किया गया है. हाइ कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की खंडपीठ के सीबीआइ जांच के निर्देश देने को भाजपा अपने उस दावे की पुष्टि के रूप में देखती है जिसके अनुसार ममता प्रशासन ने हिंसा के अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई करने में राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी दिखाई. सीबीआइ ने इन मामलों की जांच के लिए अपने अधिकारियों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस के 50 कार्मिकों की मदद ले रही है.

इस मुद्दे पर जहां तृणमूल केंद्र के राजनैतिक प्रतिशोध का हल्ला मचा रही है, वहीं भाजपा का कहना है कि सीबीआइ केवल अपना काम कर रही है. भाजपा प्रवक्ता समिक भट्टाचार्य कहते हैं कि इसका उद्देश्य हिंसा पीड़ितों के निडर होकर शिकायत दर्ज कराने में मदद करना है. सीबीआइ अदालत के निर्देश पर काम कर रही है. पार्टी का इससे कोई लेना-देना नहीं. सीबीआइ जांच शुरू होने के बाद से चुनाव-बाद हिंसा से संबंधित 31 नई प्राथमिकी दर्ज की गई हैं. इनमें चुनाव नतीजे घोषित किए जाने के दिन 2 मई को पूर्वी बर्दवान में एक वामपंथी मतदान एजेंट की हत्या का मामला शामिल है.

भाजपा के कुछ नेताओं को भरोसा है कि सीबीआइ जांच से कार्यकर्ताओं में विश्वास पैदा होगा. पूर्वी मिदनापुर, दक्षिण 24 परगना और पूर्वी बर्दवान में बंद हुए पार्टी कार्यालय फिर से खुल गए हैं और स्थानीय नेताओं को उम्मीद है कि कार्यकर्ताओं की संख्या बढ़ेगी. हालांकि, राजनैतिक विश्लेषक इमानकल्याण लाहिड़ी का मानना है कि सीबीआइ जांच के निष्कर्षों का जनता की राय पर असर नहीं होगा. कोलकाता के जादवपुर विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय संबंध पढ़ाने वाले लाहिड़ी कहते हैं, ''कुछ भाजपा नेताओं के (चुनाव अभियान के दौरान) मुस्लिम विरोधी प्रचार और धर्म पर हमला करते हुए लोगों को उकसाने की घटनाओं को देखते हुए सामाजिक और स्थानीय प्रतिक्रिया तो होनी ही थी.''

करोड़ों रुपए के कोयला चोरी घोटाले में पूछताछ के लिए ममता के भतीजे और तृणमूल में दूसरे नंबर के नेता अभिषेक बनर्जी और उनकी पत्नी रुजिरा को प्रवर्तन निदेशालय के भेजे सम्मन को भी लोग ध्यान से देख रहे हैं. रुजिरा ने 1 सितंबर को महामारी का हवाला देते हुए पूछताछ के लिए आने से मना कर दिया है जबकि अभिषेक से 6 सितंबर को घंटों पूछताछ की गई. लाहिड़ी सवाल उठाते हैं, ''आपको लगता है कि जो लोग राज्य सरकार से मिलने वाले 500 या 1,000 रुपए के अनुदान के लिए महामारी के बीच भी घंटों कतार में खड़े रहते हैं, उन्हें इस बात की परवाह है कि प्रवर्तन निदेशालय राज्य में सत्ताधारी दल के किसी नेता के पीछे पड़ा है?'' लाहिड़ी का मानना है कि ''ममता बनर्जी की सामाजिक कल्याण योजनाओं ने उनकी पार्टी से जुड़ी बहुत सारी नकारात्मक बातों और भ्रष्टाचार के आरोपों को बेमानी कर दिया है.''

इस बीच, भाजपा की मुश्किलों में इजाफे की वजह उसके भीतरी मतभेद हैं. ममता के संभावित चुनाव क्षेत्र भवानीपुर में 30 सितंबर को होने जा रहे विधानसभा उपचुनाव को लेकर ताजा मतभेद हाल ही में सामने आए हैं. घोष के नेतृत्व वाला खेमा कानूनी सलाह ले रहा है कि जब राज्य चुनाव आयोग ने महामारी के कारण 142 नगर पालिकाओं में चुनाव से इनकार कर दिया, तब यह उपचुनाव कराने का औचित्य क्या है. लेकिन पार्टी का एक धड़ा उपचुनाव कराने और ममता को कड़ी टक्कर देने के पक्ष में है. भट्टाचार्य कहते हैं, ''भाजपा बंगाल में टिकने के लिए आई है, भागने के लिए नहीं.'' पर फिलहाल तो बेहतर होगा कि इसमें एकता के कुछ लक्षण दिखें.

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