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वन रैंक वन पेंशन: पेंशन की पेचीदा होती सियासत

वन रैंक वन पेंशन मांग रहे रिटायर्ड फौजी यूपीए सरकार के 2,300 करोड़ के पैकेज से खुश नहीं. अब रेलवे और दूसरी सर्विसेज से भी उठने लगी है ऐसी ही मांग.

राकेश प्रसाद चतुर्वेदी 1997 में कर्नल पद से रिटायर हुए. उनकी मौजूदा पेंशन 25,050 रु. है. जबकि 1 जनवरी, 2006 के बाद इसी पद से रिटायर होने वाले किसी भी कर्नल की पेंशन करीब 35,841 रु. है. समान रैंक और सेवा की समान अवधि के बावजूद रक्षा सेवा से रिटायर फौजियों की पेंशन में ऐसी विसंगतियां भरी पड़ी हैं.

अगर 2006 से पहले कोई फौजी मेजर जनरल पद से रिटायर हुआ तो उसे सिर्फ 26,700 रु. पेंशन मिलती है, जबकि उससे जूनियर कर्नल रैंक का अधिकारी 2006 के बाद रिटायर हुआ तो उसे नौ हजार रु. अधिक पेंशन मिल रही है. अधिकारी ही नहीं, 2006 के पहले और बाद में रिटायर सिपाही, नायक और हवलदार की पेंशन में भी चार हजार रु. का अंतर है.

चतुर्वेदी कहते हैं, ‘‘1971 में जो सूबेदार मेजर पद से रिटायर हुआ, उसे आज रिटायर होने वाले नायक के बराबर पेंशन मिलती है. ‘‘वन रैंक वन पेंशन की मांग की एक बड़ी वजह यही है कि बाद में रिटायर होने वाला निचले पद का आदमी पहले रिटायर होने वाले बड़े ओहदेदार से ज्यादा पेंशन क्यों पा रहा है.

सेना के जवानों को तीसरे वेतन आयोग से पहले रिटायरमेंट के वक्त के वेतन का 75 फीसदी पेंशन के रूप में मिलता था, जबकि सिविल में 33 फीसदी था. 1973 के तीसरे वेतन आयोग ने रक्षा सेवा और सिविल का अंतर खत्म कर पेंशन को आखिरी वेतन का 50 फीसदी कर दिया था. फौजियों की यह लड़ाई तब से चलती आ रही है और अब तक आठ आयोग या कमेटियों ने वन रैंक वन पेंशन पर विचार किया है.

देश में हर साल करीब 65,000 फौजी रिटायर होते हैं और एक अनुमान के मुताबिक अभी देश में 23 लाख पूर्व फौजी हैं, जिन्होंने 2008 में इंडियन एक्स सर्विसमैन मूवमेंट (आइएसएम) नामक संगठन बनाकर पूर्व फौजियों की पेंशन की विसंगतियों को दूर कराने के लिए तीन दशक से चली आ रही मुहिम तेज कर दी है.

पूर्व फौजियों की इस मांग की वजह है सरकार की वह नीति जिसके तहत सेना को युवा रखने के मकसद से फौजियों को कम उम्र में ही रिटायर कर दिया जाता है. लगभग 85 फीसदी सैनिकों की रिटायरमेंट 38 वर्ष, 10 फीसदी की 46 वर्ष और महज 5 फीसदी की 56 से 58 वर्ष की आयु में होती है. जबकि सिविल में रिटायरमेंट की उम्र 60 वर्ष तय होती है.

फौजियों के आंदोलन की कमान संभाल रहे लेफ्टिनेंट जनरल (रिटा.) राज कादयान इंडिया टुडे से कहते हैं, ‘‘फौज का सिपाही आम तौर पर उस उम्र में रिटायर कर दिया जाता है, जब उसके ऊपर ज्यादा जिम्मेदारी होती है. सरकार हमें भी 60 साल तक नौकरी में रखे, हम वन रैंक वन पेंशन नहीं मांगेंगे.‘‘

हालांकि यह दिलचस्प है कि फौज के बड़े अफसरों की नौकरी के वर्ष सिविल अफसरों के लगभग बराबर हैं. फिर भी वन रैंक वन पेंशन आंदोलन का नेतृत्व फौजी अफसर ही कर रहे हैं. कादयान सिविल पुलिस के कांस्टेबल और सेना के एक सिपाही की तुलना करते “ए कहते हैं, ‘‘सिपाही 35 साल में रिटायर होता है और कांस्टेबल 60 की उम्र में. अगर वेतन का भी फर्क देखें तो सेना के सिपाही को 60 साल की उम्र तक में 47 लाख रु. का नुकसान होता है. आपको जवान चाहिए जो कारगिल में मर सके, लेकिन उसे वाजिब हक देने में भी परेशानी हो रही है.’’

2009 में फौजियों ने क्रमिक भूख हड़ताल करते हुए राष्ट्रपति को हजारों मैडल वापस किए थे और डेढ़ लाख पूर्व फौजी अपने खून से दस्तखत वाला ज्ञापन तत्कालीन  राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल को सौंपने की नाकाम कोशिश कर चुके हैं. कादयान कहते हैं, ‘‘अगले आम चुनाव से पहले सरकार को फौजियों का हक देना होगा. कानून और फौजी अनुशासन के दायरे में हक मिलने तक हमारा संघर्ष जारी रहेगा. ‘‘इन पूर्व सैनिकों ने इसी साल दिसंबर में दिल्ली के जंतर-मतंर पर अपनी ताकत दिखाने और फरवरी, 2013 तक इंतजार करने की रणनीति बनाई है.

हालांकि वन रैंक वन पेंशन की मांग को सरकार पूरी तरह से खारिज नहीं कर रही, लेकिन धन की कमी और कानूनी अड़चन की दलील देकर असमर्थता जता रही है. राज्यसभा की याचिका समिति ने भी मंत्रालय की ओर से दी गई प्रशासनिक, वित्तीय और कानूनी अड़चन की दलीलों को खारिज करते हुए कड़ी सिफारिश की थी कि जल्द से जल्द वन रैंक वन पेंशन को लागू किया जाए.

लेकिन सरकार ने संसदीय समिति की इस रिपोर्ट पर कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में छह सदस्यीय कमेटी गठित कर दी. कादयान बताते हैं, ‘‘इस कमेटी में फौज के प्रतिनिधि को शामिल करने की मांग तीनों सेनाध्यक्षों ने की थी, लेकिन सरकार नहीं मानी.’’ सरकार की दलील है कि पूर्व सैनिकों को 1 जनवरी, 2006 के पहले से समान रैंक समान पेंशन दी जाती है तो केंद्र सरकार पर तत्काल लगभग 1,300 करोड़ रु. का अतिरिक्त बोझ पड़ेगा.

कार्मिक मंत्रालय ने सिविलियन पेंशनभोगियों की ओर से भी ऐसी मांग उठने की आशंका जताई है. लेकिन संसदीय समिति कहती है, ‘‘सरकार की यह आशंका निराधार है क्योंकि सैनिक रैंक के आधार पर रिटायर होते हैं, जबकि असैनिक सरकारी कर्मचारी आयु के आधार पर. सेना का काम अधिक जोखिम भरा है.’’ संसदीय समिति ने 1,300 करोड़ रु. सालाना बोझ की दलील को भी खारिज कर दिया है.

लेकिन सरकार की आशंका को रेलवे यूनियन की मांग से बल मिल रहा है. ऑल इंडिया रेलवेमैन्स फेडरेशन के महासचिव शिवगोपाल मिश्र कहते हैं, ‘रेलवे में भी जनवरी, 2006 के पहले और बाद में रिटायर लोगों की पेंशन में अंतर है, जिसके लिए हम लड़ रहे हैं. फौजियों की और हमारी मांग वाजिब है. अगर फौज में वन रैंक वन पेंशन मिलती है तो हमें भी उससे मजबूती मिलेगी.’’ लेकिन इस तरह बैंकिंग से लेकर पीएसयू और सरकारी कर्मियों की मांग का अंतहीन सिलसिला शुरू हो सकता है.

छठे वेतन आयोग ने पेंशन की विसंगति को तब और बढ़ा दिया, जब ले. कर्नल से मेजर जनरल तक को एक रनिंग पे बैंड में शामिल कर उसने सबसे निचले पे बैंड का लाभ दिया. यानी अगर कोई अधिकारी मेजर जनरल रैंक से रिटायर हुआ तो उसे ले. कर्नल स्तर की पेंशन मिलेगी. अधिकारियों के लिए भी यह प्रतिष्ठा का सवाल है कि बाद में जूनियर रैंक पर रिटायर होने वाला अधिकारी उनसे ज्यादा पेंशन पाने लगता है.

छठे वेतन आयोग ने आइएएस के लिए एनएफसी (नॉन फंक्शनल अपग्रेड) लागू कर दिया, जिसके मुताबिक कोई आइएएस संयुक्त सचिव बनता है, तो उससे दो साल सीनियर बैच के सभी आइएएस को भी संयुक्त सचिव स्तर की सारी सुविधाएं मिलेंगी, भले वह उस स्तर का काम नहीं कर रहा हो. रक्षा सेवा में  भी इसे लागू करने और अलग पे कमीशन बैठाने की मांग हो रही है. हाल ही में 2,300 करोड़ रु. के पैकेज की घोषणा के बावजूद वन रैंक वन पेंशन की मांग जस की तस है.

जाहिर है कि फौजियों की पेंशन विसंगति दूर करने के लिए सरकार को इच्छाशक्ति दिखानी होगी और यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वन रैंक वन पेंशन के बाद रेलवे, बैंकिग या अन्य सेवाओं से भी ऐसी मांग न उठे. पंजाब और हिमाचल की सरकारें प्रस्ताव पारित कर वन रैंक वन पेंशन की मांग का समर्थन कर चुकी हैं.

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