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दिग्विजय सिंह: कांग्रेस के तीस मार खां

रॉबर्ट वाड्रा का बचाव हो या अरविंद केजरीवाल पर हमला, कांग्रेस की ओर से सारे जवाब दिग्विजय सिंह ही दे रहे हैं. जब उनसे कांग्रेस अध्यक्ष के दामाद के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया, ''सोनिया गांधी वाड्रा की चार्टर्ड एकाउंटेंट नहीं हैं.

दिग्विजय सिंह दिग्विजय सिंह

इन दिनों कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह के घर के बुकशेल्फ  पर अर्थशास्त्र और नेताओं के जीवन पर लिखे गए ग्रंथों के बीच एक दिलचस्प किताब रिवर्स डिक्शनरी रखी हुई है, जिसमें किसी भी अवधारणा का अर्थ तलाशें तो आप निराश नहीं होंगे. यह किताब दिग्विजय सिंह के नए करियर का आधार हो सकती है, जिसके माध्यम से वे अपनी वाक्पटुता की कलाबाजियां कर रहे हैं.

चाहे रॉबर्ट वाड्रा का बचाव हो या अरविंद केजरीवाल पर हमला, कांग्रेस की ओर से सारे जवाब दिग्विजय सिंह ही दे रहे हैं. जब उनसे कांग्रेस अध्यक्ष के दामाद के बारे में पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया, ''सोनिया गांधी वाड्रा की चार्टर्ड एकाउंटेंट नहीं हैं.''

रिटेल में एफडीआइ लाने के यूपीए के फैसले पर तीन सप्ताह पहले उन्होंने ट्वीट किया था, ''कांग्रेस वालमार्ट के पक्ष में है क्योंकि यह बिचौलियों को हटाना चाहती है. बीजेपी अग्रवाल-मार्ट की तरफ है क्योंकि यह स्थिति में कोई बदलाव नहीं चाहती. '' वे ही अब अकेले कांग्रेसी हैं जो केजरीवाल के सामने डटकर खड़े हैं.

उन्हें अपना निशाना अपनी पार्टी पर साधने से भी गुरेज नहीं. 12 अक्तूबर को जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सूचना के अधिकार अधिनियम (आरटीआइ) के कुछ कड़े पहलुओं को नरम बनाने की ओर इशारा किया तो दिग्विजय सिंह ने इसकी आलोचना करते हुए कहा, ''आरटीआइ की शक्ति को कम करने की जरूरत नहीं. पारदर्शिता महत्वपूर्ण है. '' वह जानते थे कि वह क्या कर रहे हैं. यह वही आरटीआइ कानून है जिसमें सोनिया गांधी की भूमिका अहम रही है.

राहुल को जल्दी ही और ऊपर के पद की जिम्मेदारी देने की संभावना से दिग्विजय सिंह के सितारे बुलंद हो रहे हैं. कांग्रेस के अंदर कुछ लोगों ने उन्हें राहुल का अहमद पटेल करार कर दिया है, लेकिन दिग्गी राजा जानते हैं कि कामयाब होने के लिए उन्हें सोनिया के राजनैतिक सलाहकार अहमद पटेल के ही सहारे की जरूरत है.

पार्टी के अंदर दिग्विजय सिंह की भूमिका में स्थितियों के अनुसार फेर-बदल होता रहता है. राहुल के अलावा वे ही अकेले महासचिव हैं जो अपनी भूमिका अपने हिसाब से तय कर लेते हैं. वे किसी संगठित टीम का हिस्सा नहीं हैं. महासचिव के तौर पर दिग्विजय सिंह का आधिकारिक कार्य उनके हिस्से आए राज्यों, उत्तर प्रदेश और असम के कार्यों तक ही सीमित है. लेकिन यह कभी हर मसले पर टिप्पणी करने की उनकी अदा पर भारी नहीं पड़ा—चाहे एफडीआइ हो या बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के खिलाफ केजरीवाल के आरोपों की जांच करने के लिए प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखने की बात. वे पार्टी के प्रवक्ता नहीं, लेकिन पार्टी की बातों से ज्यादा उनके ट्वीट्स खबरों में छाए रहते हैं.

वाड्रा से लोगों का ध्यान हटाने के लिए उन्होंने यह पासा फेंका कि कांग्रेस के पास पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और वरिष्ठ बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी के रिश्तेदारों के खिलाफ 'साक्ष्य' हैं. लेकिन इस सिलसिले में पूछने पर उन्होंने बात गोलमोल घुमा दी, ''अगर मैं कहूं कि यह मेरे पास नहीं हैं तो यह सही नहीं होगा...हम उसका इस्तेमाल कभी नहीं करेंगे. ''

वे इतने होशियार तो हैं ही कि अपनी विवादास्पद टिप्पणियों के साथ वैधानिक चेतावनी की पर्ची भी चिपका दें. 18 जून को उन्होंने जब अपना ट्विटर अकाउंट खोला तो उसमें लिखा: ''मैंने हमेशा स्पष्ट किया है कि मेरी टिप्पणी मेरे अपने विचार हैं. मुद्दों से संबंधित पार्टी का नजरिया आधिकारिक प्रवक्ता की ओर से पेश किया जाता है. '' 

दिग्विजय सिंह की सफलता राहुल के साथ उनके समीकरण पर टिकी है. वे अक्सर वह सब कह जाते हैं जो राहुल नहीं कह पाते. 2009 के विकीलीक्स केबल का मामला लीजिए, जिसमें दावा किया गया था कि राहुल कट्टरपंथी हिंदू गुटों को लेकर चिंतित थे, क्योंकि वे लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकवादी गुटों से 'ज्यादा खतरनाक' हैं. जब बीजेपी ने उनकी आलोचना की तो दिग्विजय ने जवाबी हमला कर दिया क्योंकि उनकी ऐसी कोई बाध्यता नहीं कि वे आरएसएस या चरमपंथी हिंदू गुटों पर टिप्पणी नहीं करें.

उनके प्रहार बेलगाम होते हैं. इसके बावजूद रामदेव को 'ठग', केजरीवाल को 'महत्वाकांक्षा के नशे में चूर व्यक्ति' कहने के बाद भी उनकी छवि को कोई फायदा नहीं मिल रहा.

मध्य प्रदेश का यह भद्र और सौम्य पूर्व मुख्यमंत्री आज सियासत की गली का लड़ाका बनकर रह गया है. लेकिन इससे दिग्विजय सिंह को कोई फर्फ नहीं पड़ता. उन्होंने कभी अपनी आलोचना को हंसी में उड़ाते हुए कहा था, ''मैं तो गली का योद्धा हूं, हम सभी कांग्रेस कार्यकर्ता हैं न कि ऊपर से थोपे गए नेता.

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