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अब कैमरे के पीछे

कैमरे के सामने जी भर कर जीने के बाद वहीदा रहमान ने अब वन्यजीवन की फोटोग्राफी करते हुए उसके पीछे खड़े होने का फैसला किया है. उनका मानना है कि उनका यह शौक उन्हें जिंदादिल बनाए रखता है

 वहीदा रहमान वहीदा रहमान

श्रीवत्स नेवतिया

आपकी फोटोग्राफी, खासकर वन्यजीवन की फोटोग्राफी में कैसे दिलचस्पी पैदा हुई?

फोटोग्राफी में शुरू से ही मेरी दिलचस्पी रही है. खास लम्हों को कैद करना मुझे अच्छा लगता है लेकिन इसे कभी बाकायदा सीख नहीं पाई. जंगल के भीतर की जिंदगी, प्रकृति और लैंडस्केप मुझे बहुत भाते हैं. छह-सात साल पहले मेरी मुलाकात (फोटोग्राफर) हिमांशु सेठ से हुई, जो मुझे सफारी पर ले जाने लगे. और इस तरह से यह सिलसिला शुरू हुआ.

जंगल में होने का अनुभव कैसा था?

बेहद रोमांचकारी रहा. आप जानवरों को इतने नजदीक से देखते हैं. मैं खुली जीप में थी और तभी एक शेरनी को घूरते हुए देखा तो एक पल को तो मेरी जान ही निकल गई. पर यही तो जंगल का रोमांच है, जो मुझे बेहद पसंद है.

और अपनी खींची फोटो की प्रदर्शनी लगने के अनुभव पर क्या कहेंगी?

मैं इसे लेकर बहुत उत्सुक नहीं थी. पर हमारा 24 फोटोग्राफरों का एक ग्रुप है और हमने एक उद्देश्य के लिए यह प्रदर्शनी की. मुझे यह बताने का आशय कतई नहीं था कि मैं एक तुर्रमखां फोटोग्राफर बन गई हूं. लोग कह रहे थे कि काफी अच्छे फोटोग्राफ हो गए हैं तो एकल प्रदर्शनी हो जाए. पर मैं चाहती थी अपने काम को देखकर पहले मुझे तो खुशी हो, तब मैं दूसरों को इसे दिखाऊं.

अभिनय के दिनों में कभी कैमरे के

पीछे होने की बात मन में आई?

उन दिनों यह मजाक चलता था कि कैमरे के पीछे से देखने के लिए किसी भी आर्टिस्ट को पूरे क्रू को कोका-कोला पिलाना पड़ेगा. और मैं हमेशा ही शॉट देखना चाहती थी. लाइट और कंपोजिशन देखने में मेरी दिलचस्पी रहती थी. पर उस वक्त यह नहीं सोचा था कि इसे पेशेवर के तौर पर अपनाऊंगी.

तो क्या अब आप स्कूबा डाइविंग सीखेंगी?

दुनिया में सीखने को कितना कुछ है. ऐसी चीजें सीखते रहना चाहिए जो आपको जिंदादिल रखें.

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