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वसुंधरा राजे: फिर ताज दिलाने की चुनौती

अब राजे को यह साबित करना होगा कि पार्टी आलाकमान पर दबाव बनाकर अध्यक्ष बनने का फैसला उनका सही कदम था.

वसुंधरा राजे वसुंधरा राजे

राजस्थान में वसुंधरा राजे को विधानसभा चुनाव में बीजेपी की कमान सौंपी गई है और पार्टी की राज्य इकाई की अध्यक्ष बनाकर पर्याप्त अधिकार भी दे दिए गए हैं. उनकी नियुक्ति के दो तात्कालिक प्रभाव हुए हैं. पहला तो बीजेपी अपने मतभेद भुलाकर तत्काल एकजुट हो गई है और दूसरा कांग्रेस में खलबली-सी मच गई है.

माना जा रहा है कि 59 वर्षीया वसुंधरा राजे मध्य प्रदेश के दतिया में गुप्त नवरात्र की पूजा संपन्न करके फरवरी के अंत तक राज्य में आ डटेंगी. बीजेपी ने विपक्ष के तौर पर गहलोत पर निशाना साधने के चार महत्वपूर्ण साल गंवा दिए हैं. मार्च, 2011 में जब गहलोत और उनके परिवार के सदस्यों पर भ्रष्टाचार और कारोबारी हितों के आरोप पहली बार उजागर हुए थे तब बीजेपी के पास उन्हें घेरने का सुनहरा मौक़ा था. लेकिन उसने गफलत दिखाई और ऐसा लगा कि गहलोत पर व्यक्तिगत वार न करने की अंदरखाने कोई सहमति हो गई है.

लेकिन गहलोत लगातार राजे पर निशाना साधते रहे और अकसर बीजेपी के भीतर उनके विरोधियों के बयानों पर ही उन्हें घेरते रहे. राजे की पहली प्राथमिकता इसे खत्म करने की है. गहलोत विरोधियों का सफाया बेरहमी से करने में माहिर हैं और बीजेपी में सिर्फ राजे को अहमियत देते हैं. अब राजे को यह तय करना है कि गहलोत की छवि को कैसे बिगाड़ें.vasundhara raje

गहलोत का यह कार्यकाल घोटालों और भ्रष्टाचार के आरोपों से भरपूर रहा है, फिर भी बीजेपी के लिए उन्हें घेरना आसान नहीं है क्योंकि राजे की पार्टी और उनके अपने कोर-ग्रुप तथा विरोधियों के भीतर भी कुछ लोगों के रिश्ते गहलोत और उनके कुछ मंत्रियों के साथ इतने मधुर हैं कि वे राजे को हल्का हाथ रखने की सलाह देंगे.

जरूरी है कि राजे पार्टी के भीतर सभी को साथ लेकर चलें. गहलोत और कांग्रेस को भरोसा है कि बीजेपी में राजे के दुश्मन उनकी बजाए गहलोत को मुख्यमंत्री बनाना पसंद करेंगे. लेकिन यह आकलन बेहद गलत है. अधिकतर असंतुष्ट समझ चुके हैं कि सत्ता से बाहर रहने पर उनकी हालत कितनी पतली हो गई है. उनके सबसे कट्टर विरोधी गुलाब चंद कटारिया मजे हुए नेता हैं. वे जानते हैं कि पार्टी के लिए इस वक्त सबसे जरूरी चुनाव जीतना है. वे पार्टी और राजे के

लिए भी जान लड़ा देंगे. राजे को भी वे अपने विरोधियों में सबसे मजबूत लगते हैं. लिहाजा उन्हें साथ लेकर चलने का फैसला राजे को स्वयं करना है. राजे विरोधियों में अरुण चतुर्वेदी और ललित किशोर चतुर्वेदी का आधार बहुत छोटा है और वे सही समय पर अरुण को साथ लेकर चलेंगी. घनश्याम तिवाड़ी ने पिछले 15 साल में अपनी जो विश्वसनीयता खोई है उसके लिए वे स्वयं जिम्मेदार हैं और राजे उनसे अपनी पसंद की सीट पाने के लिए अच्छी-खासी मशक्कत कराने वाली हैं.

राजे के लिए असली चुनौती टिकट चाहने के दावेदारों पर लगाम कसने की होगी. उन्हें कुछ मौजूदा विधायकों के टिकट काटने होंगे. उन्हें समझना होगा कि इस बार टिकट चाहने वालों की भारी भीड़ होगी और जिन्हें टिकट नहीं मिलेगा वे बागी हो जाएंगे. इसलिए शुरू से ही इस बारे में रणनीति बनानी होगी. राजे खुद ही कह चुकी हैं, “मैं जानती हूं कि अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हैं और मैं अच्छा नेतृत्व उभारने के लिए काम करूंगी और लोकतांत्रिक प्रक्रिया की अलग-अलग सीढिय़ों पर उसे इनाम भी मिलेगा.” वे अगले दो साल में संगठन में विभिन्न पदों के साथ-साथ विधानसभा, संसद, स्थानीय निकायों और पंचायतों के लिए सही उम्मीदवार चुनने की रणनीति बना रही हैं.

तीसरा मुद्दा जाति का है. राजे को किरोड़ी लाल मीणा का तोड़ ढूंढऩा होगा जो पूरे जनजातीय इलाके में अपना आधार बढ़ाने की जी-तोड़ कोशिश में जुटे हैं. उन्हें जनजातियों में पार्टी के आधार को मजबूत करने के लिए आरएसएस और कटारिया के साथ साथ मीणा जैसे जनजातीय नेताओं का सहारा लेना होगा. सबसे अहम भूमिका अनुसूचित जाति के वोटों की है. राजे के पास परसराम मोरदिया जैसा कद्दावर अनुसूचित जाति का कोई नेता नहीं है. राजस्थान कांग्रेस के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष पांच बार के विधायक मोरदिया इस समय राजस्थान हाउसिंग बोर्ड के अध्यक्ष हैं. उनका कहना है, “मुख्यमंत्री गहलोत ने जिस तरह पिछड़ों और अनुसूचित जातियों की मदद की है वह विधानसभा चुनाव में हमारे बहुत काम आएगी. हम अनुसूचित जातियों के कुछ युवा नेता तैयार कर रहे हैं जो बहुत ताकतवर साबित होंगे.”

मोरदिया ने गहलोत को जब से सीकर में उनके विरोधियों द्वारा अवैध रूप से बनाए गए कांग्रेस भवन के उद्घाटन से दूर रहने की सलाह दी है तब से राजनैतिक सूझबूझ वाले नेता के रूप में उनका कद बढ़ा है. जहां तक जाटों, पंजाबियों, राजपूतों और ब्राह्मणों तथा अन्य पिछड़े वर्गों का सवाल है, राजे पार्टी के अंदर उनके नेताओं पर नए सिरे से गौर कर रही हैं.

प्रशासनिक मोर्चे पर गहलोत अपने को ऐसा मुख्यमंत्री दिखाने की जी-तोड़ कोशिश में हैं जो अपने काम के दम पर चुनाव जीत सकता है. वे पार्टी को जिताने में दूसरी बार नाकाम रहने का कलंक अपने सिर नहीं लेना चाहते. लोक निर्माण मंत्री भरत सिंह का कहना है कि वे यह साबित करने में जुटे हैं कि चुनाव जीत सकते हैं, और उनकी प्रमुख योजनाएं उन्हें वोट दिलाएंगी. गहलोत को उम्मीद है कि सब्सिडी सीधे बांटने, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को कमरा बनाने के लिए अनुदान, तथा सरकारी दवाखानों और अस्पतालों में मुफ्त दवा बंटवाने से उनकी पार्टी को अच्छे-खासे वोट मिलेंगे. उन्हें ये भी उम्मीद है कि राज्यभर में उनके राजस्व शिविरों के अच्छे नतीजे मिलेंगे और जयपुर में मेट्रो चलवा कर वे अपने को आधुनिक राजस्थान का निर्माता कहलवा सकेंगे.

यहीं पर राजे और बीजेपी की परीक्षा होगी. राजे गहलोत के इन दावों की हवा निकालने की जी-तोड़ कोशिश करेंगी और जनता को बताएंगी कि जिन्हें वे अपनी योजनाएं बता रहे हैं, उनमें से कुछ असल में केंद्र की हैं. अगर राजे आगामी महीनों में अपनी प्रस्तावित यात्रा के दौरान आम आदमी का पर्याप्त समर्थन नहीं जुटा पाईं तो गहलोत को पटखनी देना उनके लिए मुश्किल होगा. दूसरी तरफ गहलोत को अपने थिंक-टैंक का फायदा मिलेगा. जिसमें बैठे डॉक्टर, मीडियाकर्मी, विद्वान, सरकारी अधिकारी, छात्र नेता और कारोबारी लोग उनके लिए हालात का जायजा लेते रहते हैं. जबकि राजे के पास ऐसा कुछ नहीं है. वे अपने राजनैतिक गुट पर बहुत अधिक निर्भर रहती हैं. पिछले दिनों धौलपुर में पार्टी कार्यकर्ताओं से संवाद की उनकी कोशिश बदली रणनीति की तरफ इशारा करती है.

राजे को भीड़ जुटाने का हुनर आता है. कांग्रेस के मुकाबले उनका शासन कहीं अधिक चाक-चौबंद और कहीं कम भ्रष्ट माना जाता है. लेकिन पहले विधानसभा और फिर आम चुनाव में हार ने उन्हें सिखा दिया होगा कि चुनाव जीतने के लिए इन सब के अलावा कुछ और भी चाहिए.

बीजेपी ने राजे को सूबे की कमान उस वक्त सौंपी है, जब पार्टी में कई गुट नजर आ रहे हैं और विधानसभा चुनाव बिलकुल सिर पर है. उन्हें गहलोत विरोध की लहरों की सवारी करनी है.

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