scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

शख्सियतः अइसन बिपतिया

प्रसिद्ध लोकगायिका शारदा सिन्हा 70वें वर्ष में प्रवेश करने, लोकसंगीत की गुणवत्ता में आ रही कमी, कोरोना से निबटने और और छठ की तैयारियों पर.

लोकगायिका शारदा सिन्हा लोकगायिका शारदा सिन्हा

प्रसिद्ध लोकगायिका शारदा सिन्हा 70वें वर्ष में प्रवेश करने, लोकसंगीत की गुणवत्ता में आ रही कमी, कोरोना से निबटने और और छठ की तैयारियों पर.

एक अक्तूबर को आपने जीवन के 70वें वर्ष में प्रवेश कर लिया. लोकसंगीत की चार दशक से अधिक लंबी यात्रा तय करते हुए आज इसकी क्या स्थिति देखती हैं?

इंटरनेट के जमाने में लोकसंगीत और भी प्रचारित हुआ है. लाउडस्पीकर की जगह अब हर हाथ में मोबाइल है. लोकगीत अब सुने कम, देखे अधिक जाते हैं. छोटी जगहों के कलाकार कुछ भी गाकर प्रचार पा जाते हैं. जीवनशैली के परिवर्तन का फर्क लोकसंगीत पर पड़ा है. सांगीतिक सृजनात्मकता कम, कॉपी-पेस्ट अधिक हो रहा है.

कैसा लगता है जब मैथिली ठाकुर या चंदन तिवारी जैसे युवा कलाकार आपके गीतों को गाते हैं?

मैंने अपनी संगीत यात्रा में गुरुओं का आदर किया है, परिवार और समाज के बीच समरसता कायम करते हुए लोकसंगीत की साधना की. युवा कलाकारों से भी मैं इसी की अपेक्षा करती हूं.

कोरोना से निबटते वक्त आपको अफवाहों का भी खंडन करना पड़ा.

कोरोना वार्ड में संगीत और प्राणायाम ही मेरा सहारा थे. उन दिनों मैं लता जी के गीतों को भी खूब याद करती, गुनगुनाती थी सारंगा तेरी याद में...दिन कटते नहीं रैन. उस दौरान पता चला कि लोग मुझे कितना चाहते हैं. अस्पताल के लोग पीपीई किट के भीतर से भी मुझे बताते थे कि उन्हें मेरा कौन-सा गीत पसंद है.

अफवाह आग की तरह फैल गई. छोटे-छोटे गांवों से फोन आते, पूजा-पाठ होने लगे. मुझे लाइव आकर उसका खंडन करना पड़ा. ठीक होकर घर जाने वाला क्षण बहुत भावुक करने वाला था. मैंने गीत भी सुनाया था: चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना.

छठ पर्व आने वाला है. इस साल नया क्या ला रही हैं?

खुशी होती है कि छठ के मेरे गीतों को देश ही नहीं, विदेश के लोग भी सुनकर भावुक हो उठते हैं. 2016 में एक बार फिर छठ के मेरे गीत पहिले पहिल छट्ठी मइया और सुपवौ न मिले माई ने लोकप्रियता के नए मुकाम हासिल किए थे. इस साल मैंने अपना गीत अइसन बिपतिया आएल भारत सरकार को दिया है, जिसे केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के साथ जारी किया जा रहा है.

● क्या करने को अभी रह गया है?
मंच प्रस्तुतियों की शुरुआत हुई है. पहले की कुछ ऐसी रचनाएं हैं जिन्हें कभी रिकॉर्ड नहीं कर पाई, अब करना चाहती हूं. हिंदी की अपनी कुछ पसंदीदा कविताएं भी गाना चाहती हूं. साथ ही अपने मंच 'स्वर शारदा’ के माध्यम से युवा कलाकारों को प्रोत्साहित करना चाहती हूं.
—आलोक पराड़कर.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें
ऐप में खोलें×