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फलसफा हसीन मुसाफिर का

बतौर एक बेखौफ मुसाफिर अभिनेत्री शोभिता धूलिपाला ने अपनी यात्राओं में आनंद भी पाया और अक्लमंदी भी.

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अभिनेत्री शोभिता धूलिपाला अभिनेत्री शोभिता धूलिपाला

 आपने बैकपैकर की तरह यात्राएं शुरू की थीं. अब उस आजाद जिंदगी की कमी खलती है?

पीठ पर बस बैग लादकर निकले करीब छह साल हो गए, पर चूंकि यात्रा की वही एक जबान मैंने सीखी इसलिए बैकपैकिंग के तरीके से ही मैं किसी जगह की छानबीन कर पाती हूं. मैं ज्यादातर अकेली यात्रा करती थी.

बस बुनियादी जरूरत के सामान के साथ कंधे पर लटकाया जा सकने वाला छोटा-सा पिट्ठू (रकसैक) लेकर निकल पड़ती और रोज की परेशानियां रोज ही सुलझाती. सफर में मैं अब भी वही अनुभव तलाशती हूं: जगह, उसके लोगों, उसकी संस्कृति और खान-पान के साथ संवाद. मैं जहां जाऊं वहीं की हो जाना पसंद करती हूं.

 अकेले यात्रा करना कितना सुखद है? क्या आपको इसका डर नहीं लगता कि एकांत के साथ धीरे-धीरे अकेलापन आकर न घेर ले?

मैं अकेले हमेशा बहुत कंफर्टेबल होती हूं और सफर से यह कंफर्ट और बढ़ जाता है. मुझे लगता है सबको कम से कम एक बार अकेले सफर करना चाहिए, यह अनुभव करने के लिए कि वह कौन है. इसके अलावा मुझे लगता है कि अकेलेपन को अक्सर इतनी भयावह, स्याह और अंधकारमय चीज कहकर खारिज कर दिया जाता है. हमें तमाम किस्म के जज्बात झेलने चाहिए. उनसे पार पाने का यही अकेला तरीका है.

 क्या यह मान लेना ठीक होगा कि यात्रा आपके लिए एक दार्शनिक अनुभव भी है?

मुझे लगता है हर तरह के अनुभव सार्थक हो सकते हैं, बशर्ते उनमें गहरे उतरने की आपमें हिम्मत हो. मुझे यह भी लगता है कि यात्राओं से आप दूसरों को बेहतर ढंग से समझते हैं क्योंकिा आप अपनी जिंदगी से आगे और भी कुछ देखते हैं. आप खुद को बिल्कुल नई स्थितियों में पाते हैं, जिससे आपके भीतर लचीलापन पैदा होता है. इसे आप दार्शनिक अनुभव कह सकते हैं. वह अनुभव आखिर है कहां; समझदारी कहती है कि आप जहां हैं, पूरी तरह से वहीं रहें.

 अपनी यात्राओं की डॉक्युमेंटिंतग को लेकर आपमें ज्यादा ही बेताबी दिखती है. आखिर कितनी तस्वीरें लेती हैं आप?

मैं सब कुछ आंखों में उतार लेने वाली जीव हूं. मुझे तस्वीरें लेना बहुत अच्छा लगता है, पर हम ऐसे वक्त में रह रहे हैं जब सोशल मीडिया लगातार निरंतर खंगालता रहता है कि कौन, कहां और क्या कर रहा है. ऐसे में आपके भीतर खुद को पेश करने की चाहत कम ही रह जाती है—फिर आपको लगता है कि अपने कहीं घूमने-फिरने की बात बताने का कोई खास अर्थ रह नहीं गया है. लोग अब लगातार कुछ भी 'उत्तेजक देखकर उत्तेजित’ हुए जा रहे हैं. आपके लिए जो बहुत खास है, मुमकिन है दूसरों के लिए उतना मायने न रखता हो, इसलिए मैं अपनी तस्वीरें दिखाने की कोशिश नहीं करती.

 क्या आप हमारे पाठकों के लिए गर्मियों के तीन उम्दा ठिकाने बता सकती हैं?

सबसे पहले तो उत्तराखंड और हिमाचल के खूबसूरत हिल स्टेशन. फिर नीलगिरि में कोडईकनाल, ऊटी, कुन्नूर सरीखी जगहें. और नॉर्थ-ईस्ट तो है ही. उस पूरे इलाके को तो अभी ठीक से खंगाला ही नहीं गया है. इस साल या मुमकिन है अगले साल पहले मेघालय जाऊं और फिर सुंदरबन. वहां मॉनसून में जाना चाहती हूं, जब बारिश शबाब पर होती है.

—श्रीवत्स नेवटिया.

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