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शख्सियतः शेष आकांक्षा गुरुकुल की

विख्यात शास्त्रीय-उपशास्त्रीय गायक पद्मविभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र कोरोना की दूसरी लहर में पत्नी और बेटी की मृत्यु, बुढ़ापे में आर्थिक सुरक्षा के सवाल और बनारस में गुरुकुल की योजना पर.

पं. छन्नूलाल मिश्र पं. छन्नूलाल मिश्र

विख्यात शास्त्रीय-उपशास्त्रीय गायक पद्मविभूषण पं. छन्नूलाल मिश्र कोरोना की दूसरी लहर में पत्नी और बेटी की मृत्यु, बुढ़ापे में आर्थिक सुरक्षा के सवाल और बनारस में गुरुकुल की योजना पर.

 कोरोना की दूसरी लहर में आपको पत्नी और बेटी की मृत्यु के त्रासद अनुभव से गुजरना पड़ा. हमने एक विख्यात गायक और परिजनों को न्याय की गुहार लगाते देखा.

चार दिनों के भीतर ही पत्नी और बेटी की मौत हो गई. उनकी याद बहुत आती है लेकिन क्या कर सकते हैं? प्रभु की इच्छा समझकर बर्दाश्त करते हैं. शरीर तो अब कुछ ठीक हो रहा है लेकिन मन अभी भी बहुत दुखी है.

 आप वाराणसी संसदीय क्षेत्र में प्रधानमंत्री के प्रस्तावक भी रहे हैं, दूसरी बेटी ने चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल भी उठाए थे.

जी सबसे कहा है. जांच भी हो रही है. जांच करने वाले घर भी आए थे.

खेलैं मसाने में होरी दिगंबर... गाने वाले को भी श्मशान की तस्वीरों ने काफी विचलित किया होगा?

निश्चित रूप से विचलित किया. बहुत सारे लोग इस दौरान हमसे बिछड़ गए. कितने ही कलाकारों का निधन हो गया. क्या कहें, ''होइहि सोइ जो राम रचि राखा...’’

संगीत समारोहों के बंद होने से कलाकारों के सामने आर्थिक संकट भी है. क्या कहेंगे आप इस पर?

डेढ़ साल से कार्यक्रम बंद हैं. कहीं कुछ नहीं हो रहा. हम तो किसी को सिखा भी नहीं पा रहे क्योंकि हम ऑनलाइन बात कर नहीं पाते. लेकिन जीविकोपार्जन, परवरिश के लिए कुछ-न-कुछ तो होना चाहिए. बड़ी चिंता होती है कि जीविका के लिए क्या करें?

जीवन की तमाम जरूरतें तो रहती ही हैं लेकिन किसी से कुछ मांग भी तो नहीं सकते—प्रेम घटे कछु मांगत तें, मान घटे पर गेह के जाए...बहुत सारे कलाकारों का यही हाल है. इस उम्र में भी हमारे साथ कोई आर्थिक सुरक्षा नहीं है.

 85 की उम्र है, कोई इच्छा जो अभी पूरी होनी बाकी हो?

सम्मान, पुरस्कार तो सब मिल चुके हैं, बहुत सारी जगहों पर कार्यक्रम भी किए लेकिन एक इच्छा मन में है. मेरा छोटा-सा घर है. यहां ज्यादा लोगों को बुलाकर सिखाया नहीं जा सकता. तो चाहता हूं कि एक गुरुकुल बना सकूं.

ऐसा लगता है कि चार-पांच साल जब तक हूं, जो भी विद्या मेरे पास है, अधिक से अधिक बच्चों को सिखा सकूं, उन्हें दान कर सकूं. नहीं तो मेरी कला मेरे साथ ही चली जाएगी. इस कला का प्रचार-प्रसार जरूरी है. गुरुकुल के लिए सरकार की मदद की दरकार होगी, कह रहा हूं सबसे.

—आलोक पराड़कर

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