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शख्सियतः जिंदगी मेरी फैसले मेरे

सुंदर पिचाई और सत्य नडेला वाली कड़ी में उनसे भी पहले आती हैं इंदिरा नूई. पेप्सिको की पूर्व सीईओ ने नई किताब अ लाइफ इन फुल में किया निजी और पेशेवर जिंदगी की बेबाकी से बयान.

इंदिरा नूई इंदिरा नूई

सुंदर पिचाई और सत्य नडेला वाली कड़ी में उनसे भी पहले आती हैं इंदिरा नूई. पेप्सिको की पूर्व सीईओ ने नई किताब अ लाइफ इन फुल में किया निजी और पेशेवर जिंदगी की बेबाकी से बयान.

आपकी किताब मां-बेटी के रिश्तों की जटिलता पर बात करती है...
बच्चे खासकर बेटियां मां से ही कह-सुन, लड़-झगड़ पाती हैं. और आप कामकाजी हैं तो दस काम और करने होते हैं. दोनों ही आपको अपने बारे में जब-तब याद दिलाते रहते हैं, और यह स्वाभाविक भी है. जिंदगी मुकम्मल कहां होती है!

पानी में तैरती बत्तख जैसा हाल है—ऊपर से शांत लेकिन नीचे तेजी से पानी को चीरती चलती है. नेपथ्य में तो हम सब बेसब्री से हाथ-पांव चला रहे होते हैं, घर की चुनौतियों और वहां हो रही कहा-सुनी को जाहिर नहीं होने देते. एक मिसाल से मैंने आपको समझाया. यह सब इतना आसान नहीं होता. पर संतुलन साधते हुए रास्ता निकालते हैं, निकालना पड़ता है.

डोरिटोज़ चिप्स और केंडेल जेनर विज्ञापन विवाद को किताब में जगह नहीं मिल पाई...

जितना कुछ 90,000 शब्दों में बताया जा सकता था, बताया गया. आप पॉडकास्ट सुनिए, मैंने इतना ही कहा था कि लोग पब्लिक में चिप्स बहुत जोर से चबाना पसंद नहीं करते. तुरंत उससे 'फीमेल डोरिटोज’ का अर्थ निकाल लिया गया. केंडल जेनर ऐड एक अश्वेत ने बनाया था, सो हम पर वर्ण संवेदनहीनता का आरोप बेमानी था. कोई बात नहीं. यह किताब किसी को नीचा दिखाने के लिए थोड़े ही है.

आपने लिखा है कि आपको ''ब्राह्मण के रूप में पैदा होना किस्मत की बात रही.’’ ऐसा क्योंकि कहा आपने?

भई, मैं आखिर वही हूं ना! ब्राह्मणत्व को धन-संपदा से जोड़ना गलत है. ब्राह्मण इतने समृद्ध नहीं थे. पारंपरिक ब्राह्मणों के नाते अध्ययन और कर्नाटक संगीत तथा भरतनाट्यम की शिक्षा ही हमारे मूल्य थे. पर जैसा किताब में जिक्र है, ब्राह्मण होने का एक लाभ था. लोग हमें सम्मान देते थे क्योंकि हमें सुशिक्षित तबका माना जाता था. यह कबूलने वाली मैं पहली हूं कि इसका मुझे थोड़ा-सा लाभ मिला.

क्या भारत में कामकाजी महिलाओं का अलग ही किस्म की चुनौतियों से सामना होता है?

जितने देशों को मैं जानती हूं, उनके मुकाबले भारत में ज्यादा प्रगतिशील कानून हैं पर उन्हें सख्ती से लागू करना होगा. कॉर्पोरेट परिवेश बदलना होगा. वे कहेंगे कि कोई महिला नौकरी में रखे जाने पर भी तभी आती है जब उसके पति का भी तबादला हो. ऐसे पूर्वाग्रह दूर करने होंगे.

—अनु प्रभाकर

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