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शख्सियतः जो मुझको है पसंद

रस्किन बॉन्ड ने 17 की वय में लिखना शुरू कर दिया था. आज 87 की उम्र में भी वे उतने ही लिक्खाड़ हैं. अपने ताजा कहानी संग्रह में वे अतीत और भविष्य दोनों की पड़ताल करते हैं.

रस्किन बॉन्ड रस्किन बॉन्ड

रस्किन बॉन्ड ने 17 की वय में लिखना शुरू कर दिया था. आज 87 की उम्र में भी वे उतने ही लिक्खाड़ हैं. अपने ताजा कहानी संग्रह में वे अतीत और भविष्य दोनों की पड़ताल करते हैं.

राइटिंग फॉर माइ लाइफ: द वेरी बेस्ट ऑफ रस्किन बॉन्ड की कहानियों और आलेखों को आपने अपना पसंदीदा बताया है. क्या ये रचनाएं लिखे जाते समय ही बाकियों से बेहतर दिख गईं?

मेरा ख्याल है, बचपन और बड़े होने वाले दिनों पर लिखते समय मैं बेहद खुश होता हूं. अतीत में टहलना मुझे पसंद है. अब मैं प्रकृति, परिंदों, चरिंदों, दरख्तों, जंगल यानी कुदरती दुनिया पर लिखता हूं. आम पाठकों को कुछ कहानियां पसंद आएं, कुछ नहीं, तो मुझे शिकायत नहीं. यह महज एक संयोग है.

आपने लिखा है कि स्कूल की लाइब्रेरी में छुप-छुपकर पढ़ने की आदत ने आपको लेखक बनाया. अब बहुत कम बच्चे इतनी शिद्दत से पढ़ते हैं. क्या यह बात आपको परेशान करती है?

बच्चे कभी भी इतने पढ़ाकू नहीं थे. 35 बच्चों की मेरी ही क्लास में हम बमुश्किल  2-3 ही थे जो दूसरी किताबें पढ़ते थे. मजे के लिए पढ़ने का शौक थोड़े ही लोगों को रहा है, आगे भी ऐसा ही रहेगा. हालांकि आज अगर 35 की क्लास में 2-3 पढ़ाकू हैं तो भी उनकी तादाद दसियों हजार पहुंच जाती है क्योंकि शिक्षा का काफी प्रसार हो गया है. और इससे मुझे रोजी कमाने में मदद मिलती है.

अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्षरत युवा लेखकों को आप क्या सुझाव देना चाहेंगे?

मैं लिखने से किसी को हतोत्साहित नहीं करता पर हमेशा यही कहता हूं कि बेसिक्स दुरुस्त रखो. मैं आज नौजवानों को देखता हूं कि वर्तनी तक दुरुस्त नहीं और किताब छपवाने दौड़ पड़ते हैं और कई भलेमानस प्रकाशक भी हैं जो वह भी नहीं सुधारते. सैकड़ों अच्छे लेखकों की किताबें छप रही हैं पर हजारों ऐसे भी हैं जो अच्छे-बुरे की परवाह किए बिना सिर्फ छपने को उतावले बैठे हैं.

लैंडोर (मसूरी) में जलवायु परिवर्तन का कोई असर दिखाई दे रहा है?

पिछला हफ्ता तो गर्मी के मौसम जितना गरम था. आज भारी बारिश, ठंडी हवाएं. हीटर चलाकर बैठा हूं. टहलने के दौरान दिखने वाले कई परिंदे, दरख्त और फूल अब नहीं दिखते. यह बदलाव पूरी कुदरती दुनिया पर असर डाल रहा है, जिसका प्रभाव हम तक आएगा ही.

-श्रीवत्स नेवटिया

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