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शख्सियतः दुनिया के साथ कदमताल

भरतनाट्यम नृत्यांगना मालविका सरुक्कै पिछले 50 वर्ष से नृत्य के जरिए अपनी दुनिया से एक रिश्ता कायम करती आई हैं. उनका नया शो अनुबंध महामारी पर उनकी टिप्पणी है.

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मालविका सरुक्कै मालविका सरुक्कै

भरतनाट्यम नृत्यांगना मालविका सरुक्कै पिछले 50 वर्ष से नृत्य के जरिए अपनी दुनिया से एक रिश्ता कायम करती आई हैं. उनका नया शो अनुबंध महामारी पर उनकी टिप्पणी है.

 मंचीय कलाओं पर महामारी की बुरी मार पड़ी. आप पर कैसी बीती?

शुरू के कुछेक हफ्तों तक तो बेबस देखती रही, फिर लगा कि मुझे खुद को सकारात्मक ऊर्जा से भरना होगा. एक नृत्य ही तो है जो मैं पिछले दो साल में कर पाई हूं. पूरे जीवन में दो साल का गैप कभी नहीं लिया. एकाकी हो जाने पर एक बार फिर से मैं नृत्य की छात्रा बन गई.

 कइयों ने ऑनलाइन शो की राह पकड़ी थी. आपने भी किया क्या?

इसकी जरूरत ही नहीं महसूस हुई. सोशल मीडिया पर होती तो शायद कुछ काम निकाल लेती, लेकिन मैं किसी प्लेटफॉर्म पर हूं ही नहीं. दूर रहकर अच्छा लगा मुझे. पिछले दो साल में मैंने सबसे ज्यादा संवाद नृत्य से ही तो किया है और नृत्य ने भी शायद मुझसे बात की. अब मैं अपने दर्शकों से मिलने को आतुर हूं.

 नई प्रस्तुति के बारे में थोड़ा और बताएं.

इस वायरस ने सारी भौगोलिक सीमाओं को मिटा दिया. हम सब उदास-निराश और बेताब थे. आइसोलेशन के बाद मुझे कुदरत और लोगों से जुड़ाव की जरूरत महसूस हुई. अनुबंध उसी महामारी पर एक टिप्पणी है जिसमें पूछा गया है कि क्या हम दरकिनार कर देने वाली अलग-अलग दुनिया में रहते हैं? क्या हमें अधिक समावेशी नहीं होना चाहिए?

 6 मार्च को मंच पर आपकी प्रथम प्रस्तुति के 50 वर्ष हो जाएंगे. बतौर कलाकार आप इस यात्रा से संतुष्ट हैं? 

संतोष के भाव के साथ एक कृतज्ञताबोध भी है कि मैं नाच और रच सकी. मैं मां सरोजा कामाक्षी की आभारी हूं जिन्होंने मुझे अनुकूल परिवेश और प्रेरणा दी और गुरु कल्याणसुंदरम पिल्लै, कलानिधि नारायणन और राजरत्नम पिल्लै, जिन्होंने मुझे एक मजबूत आधार प्रदान किया.

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