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शख्सियतः शिष्य हों संकल्प वाले

मेवाती घराने के दिग्गज गायक पंडित संजीव अभ्यंकर उम्र, सौंदर्य-दृष्टि और शिष्य आदि मामले पर बेबाक राय रखते हुए उसी तरह प्रभावित करते हैं जैसे भक्ति संगीत गाते या रागदारी रंग सुनाते.

 गायक पंडित संजीव अभ्यंकर गायक पंडित संजीव अभ्यंकर

मेवाती घराने के दिग्गज गायक पंडित संजीव अभ्यंकर उम्र, सौंदर्य-दृष्टि और शिष्य आदि मामले पर बेबाक राय रखते हुए उसी तरह प्रभावित करते हैं जैसे भक्ति संगीत गाते या रागदारी रंग सुनाते.

 आप उन सिद्ध खयाल गायकों में से हैं जिन्होंने शुद्ध रागदारी को नई पीढ़ी में भी असाधारण लोकप्रियता दिलाई. आप स्वयं दिग्गज नाम हैं. क्या अभी भी मंच पर बैठते हुए कोई झिझक होती हैं?

बेचैनी बस इसी बात की होती है कि क्षमता के मुताबिक जितना मैं दे सकता हूं, उतना दे सकूं. चिंता या डर कभी नहीं रहा. इसकी वजह मंच पर बैठने का आत्मविश्वास है, जो बाल्यकाल से था. संभवत: पिछले जन्म का कोई पुण्य प्रताप हो.


 पुणे एक दौर में शास्त्रीय संगीत के लिए अपनी अलग साख रखता था. आज वह साख कितनी सुरक्षित है?

अतीत हमेशा सुंदर होता है , लेकिन वर्तमान और भविष्य भी कोई चीज है. आज नए रसिक आ रहे हैं, उनमें भी वही आग, वही एप्रोच है. 1981 में 11 साल की उम्र में मैंने पहली महफिल गाई. आज चालीस साल हो गए. हर दशक में सुनकार पीढ़ी भी आगे चली जाती है. सिर्फ पुणे क्यों, देश में वे सारे शहर जहां गाने-बजाने का माहौल अपेक्षाकृत सुंदर है वहां दशक बदलते ही दृश्य भी बदलता है.

 उम्र के असर से आप बेअसर दिखते हैं! बढ़ती जाती उम्र के साथ राग में छिपा सौंदर्य भी पेश करने के ढंग को नई समझ देता है क्या?

बेशक शरीर की उम्र होती है लेकिन मन की भी होती है. अगर हम उसी का विचार करें तो नेगेटिविटी आती है. फिर व्यसन मुक्त जीवन. कर्म और नैसर्गिक ताकत भी शक्ति देते हैं. उम्र बढऩे के साथ दृष्टिकोण निस्संदेह विस्तार लेता है. इसे मैं प्रतिभा के पड़ाव कहूंगा. गाना रोज नया लगना भी चाहिए. जैसे हम प्रेयसी से मिलते हैं उसी तरह रोज अपने गाने से मिलें.

 जो सीखने आते हैं, उनमें न्यूनतम क्या देखकर उन्हें बतौर शिष्य स्वीकार करते हैं?

कई बातें हैं. गले का स्वभाव पहले. फिर आवाज मेरी गायिकी की प्रकृति के अनुरूप हो. आवाज न हो तो सारी कल्पनाएं मन में ही रह जाएंगी, इसलिए आवाज बेहद जरूरी चीज है. मेरे गाने को लेकर उनका लगाव कितना है?

सिर्फ नाम देख कर आए हों तो बात नहीं बनेगी. और बेशक, बेसिक गाना जानते हों. अर्थात् सीखे हों. यानी आगे कुछ सिद्ध करने की इच्छा से आए हों. बाद में उन पर है कि वे मेरा सान्निध्य कितना आत्मसात कर पाते हैं.

 अभंग गायिकी आपके गले से अधिक असर पैदा करती है. अभंग या कह लें सुगम के प्रति लगाव कैसे आया?

अभंग या संत रचनाओं के प्रति रुझान स्वाभाविक रूप से बालपन में मिला. मेरे गले की प्रकृति और आवाज का टेक्चर अभंग के लिए जैसे एकाकार हो गए. लेकिन दोनों में तैरने का आनंद है.

रागदारी असीमित समुद्र है और भक्ति संगीत उसका एक मोहक जलाशय. रागदारी में मुझे सभी रसों के शेड्स मिलते हैं जबकि अभंग का मूल रंग भक्ति अथवा निर्गुण रस का बहाव है. पूरी महफिल बगैर दोहराव रागदारी से जीती जाए—इतनी रचनात्मक संपदा मेरे पास हो, यह मेरा लक्ष्य था—और मैंने वह पाया, ऐसा विनम्रता से कह सकता हूं.

—राजेश गनोदवाले

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