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शख्सियतः आहत संवेदनाओं के रक्षक

मौजूदा कार्यकाल में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के साथ नरोत्तम मिश्र के रिश्ते इतने बिगड़ गए हैं कि मध्य प्रदेश के गृह मंत्री जब भी दिल्ली जाते हैं तो चर्चा छिड़ जाती हैं कि मुख्यमंत्री बदला जाने वाला है

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नरोत्तम मिश्र: मुख्य चैलेंजरों में से एक नरोत्तम मिश्र: मुख्य चैलेंजरों में से एक

नरोत्तम मिश्र भले ही मध्य प्रदेश के गृह मंत्री हों लेकिन इस 61 वर्षीय नेता ने देश में कहीं भी 'हिंदू संवेदनाओं' को आहत कर सकने वाले मुद्दों पर प्रतिक्रिया देने की जिम्मेदारी संभाल ली है. करीब 30 साल से राजनीति में सक्रिय मिश्र संवेदना आहत करने के कथित दोषियों को पीछे हटने के लिए मजबूर करने में भी सफल रहे हैं, जिससे उनके प्रशंसकों की संख्या बढ़ रही है. वे मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के मुख्य चैलेंजरों में से एक हैं और कई लोग इसे नई राजनैतिक छवि गढ़ने की उनकी जुगत मानते हैं.

मंत्री महोदय की गुस्से के सबसे ताजा शिकार ई-कॉमर्स की दिग्गज कंपनी अमेजन है. मिश्र ने 25 जनवरी को मध्य प्रदेश पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिया कि वे कथित तौर पर भारत के राष्ट्रीय झंडे वाले जूते बेचने के मामले में अमेजन के खिलाफ एफआइआर दर्ज करें. उन्होंने ट्वीट किया, ''मुझे पता चला है कि अमेजन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म अपने उत्पादों को बेचने के लिए राष्ट्रीय ध्वज का इस्तेमाल कर रहा है. प्रथम दृष्ट्या यह ध्वज संहिता के उल्लंघन का मामला लगता है, जो दुखद है. देश का अपमान किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा.'' मिश्र ने कोई पहली बार अमेजन के खिलाफ कार्रवाई नहीं की है. नवंबर 2021 में अमेजन के अधिकारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया. यह पाया गया था कि स्टेविया बेचने की आड़ में इस ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर गांजा बेचा जा रहा था.

इससे पहले मिश्र की नाराजगी का निशाना अभिनेत्री सनी लियोन थीं. उनका नया गाना मधुबन में राधिका नाचे उन्हें नागवार गुजरा. मिश्र ने 26 दिसंबर को भोपाल में कहा, ''शरीब और तोशी (गायक) और सनी लियोन को मेरी चेतावनी है... मैं कानूनी विशेषज्ञों से सलाह ले रहा हूं, अगर उन्होंने तीन दिनों के भीतर माफी नहीं मांगी और गाना नहीं हटाया तो उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी.'' प्रोड्यूसर गाने का मुखड़ा बदलने और बोलों में हेरफेर करने को राजी हो गए. आखिर वही हुआ, जो मिश्र चाहते थे.

पिछले अक्तूबर में वे डाबर के एक विज्ञापन से चिढ़ गए. इसमें महिला समलैंगिक युगल को करवाचौथ के मौके पर दिखाया गया था. उन्हीं दिनों दक्षिणपंथी हिंदू धड़े के लोगों ने प्रकाश झा के आश्रम-3 से सेट पर तोड़-फोड़ की. इस लोकप्रिय वेबसीरीज की शूटिंग भोपाल में चल रही थी. हालांकि गृह मंत्री ने हमले को दुर्भाग्यपूर्ण कहा, पर दंगाइयों को 'देशभक्त' भी बताया और फिल्मकार को चुनौती दी कि दूसरे धर्मों को आहत करने वाली ऐसी सामग्री बनाकर दिखाएं. मिश्र ने यह भी कहा कि जिला कलेक्टरों के मातहत एक समिति बनाई जाएगी जो राज्य में शूटिंग की इजाजत देने से पहले फिल्म की पटकथा की जांच करेगी. कुछ दिनों बाद फैशन डिजाइनर सब्यसाची मुखर्जी मिश्र के निशाने पर आ गए, क्योंकि मंत्री महोदय ने मंगलसूत्र का विज्ञापन अश्लील मान लिया. सब्यसाची ने भी आखिर वही किया, जो उनके निशाने पर आए दूसरे लोगों ने किया था. फटाक से चुपचाप विज्ञापन हटा लिया.

मध्य प्रदेश में राजनैतिक जानकार बताते हैं कि आजकल हर विषय पर मिश्र की कोई न कोई राय होती है, क्योंकि एक तो वे खबरों में बने रहना चाहते हैं और दूसरे उन्हें पता है कि ''योगी (आदित्यनाथ) के सांचे'' में ढलकर विवादास्पद और कट्टर रुख अपनाना मौजूदा सियासी फलक पर फायदेमंद है. चौहान की पिछली सरकारों में भी ऐसे लोग थे जिन्हें कट्टरपंथी माना जाता था. मगर उनमें मिश्र नहीं थे. वरिष्ठ पत्रकार एन.के. सिंह कहते हैं, ''नरोत्तम मिश्र मुख्यमंत्री चौहान से इतर अपनी अलग राजनैतिक जगह बनाने में जुटे हैं. वे कट्टरपंथी नहीं हैं, पर धार्मिक मुद्दों पर प्रतिक्रिया देकर नपा-तुला जोखिम मोल ले रहे हैं और संघ की नजरों में ऊपर चढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. हालांकि राज्य से बाहर दूसरी पार्टियों के लोग उन्हें ज्यादा नहीं जानते, मगर नए विवादों से उन्हें लगता है कि जल्द ही वे सब जान जाएंगे.''

मिश्र राजनैतिक परिवार से आते हैं और 'विविध रुचि वाले व्यक्तित्व' के स्वामी हैं. ग्वालियर की छात्र राजनीति से शुरू करके 1990 में डबरा से विधायक चुने गए. पर तिकोने मुकाबले में वे अगला चुनाव हार गए और 1998 में फिर चुनकर विधानसभा पहुंचे. 2008 में डबरा के आरक्षित सीट घोषित होने पर वे दतिया जिले की दतिया सीट पर आ गए. पिछले तीन चुनाव उन्होंने दतिया से जीते.

सप्ताह के कामकाज वाले दिनों में वे भोपाल में रहते हैं और यहां उनके घर पर चुनिंदा पत्रकारों का नियमित जमावड़ा लगता है. उन्हें बाइट देने के लिए वे सुलभ रहते हैं, पर वैसे बड़े चौकन्ने हैं कि किससे मिलना या नहीं मिलना है. भोपाल में यह खुला राज है कि मिश्र को दोपहर के खाने के बाद आराम करना पसंद है और अपने इन आराम के पलों में वे किसी भी दूसरी चीज को बाधा नहीं बनने देते. मिश्र चार इमली में रहते हैं. शाम को वे हल्ला मचाने वाली टोली के साथ टहलने निकलते हैं. इससे बड़े अफसरों की बीवियों को खासी झुंझलाहट होती है. उन्हें लगता है कि राजनेताओं और उनके लग्गुओं-भग्गुओं ने संभ्रात चार इमली पर 'अतिक्रमण' कर लिया है. मगर वे कुछ कर नहीं पा रहीं.

हफ्ते के आखिरी दो दिन उनका अपने निर्वाचन क्षेत्र में रहना तय है. वहां वे मतदाताओं से मिलने के लिए मौजूद होते हैं. वे मध्य प्रदेश के उन इने-गिने काबीना मंत्रियों में भी हैं जो अपना फोन खुद उठाते हैं. 

1990 के दशक में जब मिश्र विपक्ष में थे तब सदन की कार्यवाहियों और खासकर बहसों के दौरान उन्होंने अपने जोशीले हस्तक्षेपों से जल्द ध्यान आकर्षित कर लिया. वे अपनी भाषण कला के लिए जाने जाते थे. 2005 के मध्य में बाबूलाल गौर ने उन्हें पहली बार मंत्री बनाया. नवंबर 2005 में मुख्यमंत्री बनने के बाद शिवराज चौहान ने भी उन्हें अपने पहले मंत्रिमंडल में बनाए रखा. 2008 में चौहान का पहला कार्यकाल खत्म होने तक दोनों में अच्छा भाईचारा था. मिश्र हमेशा उनके साथ खड़े मिलते. बाद में जब मुख्यमंत्री 'डंपर घोटाले' को लेकर सियासी हमले की जद में आए, तो मिश्र को उनका 'संकटमोचन' तक कहा गया. उन दिनों जब भी कोई मिश्र से हाल-चाल पूछता, तो वे कहते, ''माई (पीतांबरा, दतिया की तंत्र पीठ की देवी) और भाई (शिवराज चौहान) दोनों का आशीर्वाद है.'' 2009 में मिश्र ने गुना से लोकसभा का चुनाव ज्योतिरादित्य सिंधिया के खिलाफ लड़ा और हार गए. 2018 में भाजपा के सत्ता से बेदखल होने तक वे मंत्री बने रहे और कई महकमे संभालते रहे.

कमल नाथ की अगुआई वाली कांग्रेस सरकार ने 2019 में मध्य प्रदेश राज्य बिजली विकास निगम की ई-टेंडरिंग घोटाले की छान-बीन की. इस 3,000 करोड़ रु. के घोटाले में मिश्र के निजी स्टाफ की गिरफ्तारी हुई और कयास तो ये भी थे कि वे भी जल्द सीखचों के पीछे होंगे. मगर मिश्र की पेशानी पर कोई बल न था. जल्द चीजें बदलीं. मार्च 2020 में सिंधिया और उनके कांग्रेसी समर्थकों के पाला बदलकर भाजपा सरकार का समर्थन करने के बाद वे फिर सरकार में थे. इस बार उन्हें गृह मंत्री बनाया गया. उम्मीद के मुताबिक ई-टेंडरिंग घोटाले की जांच करने वाले पुलिस अफसर को गुमनाम तैनाती में डाल दिया गया. अपने निर्वाचन क्षेत्र में अपने राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के साथ भी मिश्र ने कोई रियायत नहीं बरती.

लेकिन इस बार चौहान से मिश्र के संबंध तनावपूर्ण रहे हैं. हद यह कि जब वे 2 जनवरी को दिल्ली गए तो कयास लगाए जाने लगे कि मुख्यमंत्री बदलना तय है. मौजूदा सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर मिश्र का कद काफी ऊंचा है. उनके स्टाफ में एक एडीजी रैंक का आइपीएस अधिकारी है, जबकि मुख्यमंत्री के स्टाफ में अखिल भारतीय सेवा का कोई अधिकारी नहीं है. 

भाजपा के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि पार्टी के सत्ता में लौटने पर मिश्र मुख्यमंत्री पद के संजीदा दावेदार थे, क्योंकि उन्होंने कमल नाथ सरकार की चूलें हिलाने में परदे के पीछे अहम भूमिका अदा की थी. सरकार की बागडोर तो उन्हें नहीं सौंपी गई, पर चौहान को बता दिया गया कि नरोत्तम मिश्र के साथ आम कैबिनेट मंत्री से बेहतर सुलूक किया जाएगा. इसी की बदौलत मिश्र सरकार में अपने सगे-संबंधियों के तबादले और तैनातियां करवा सके. मगर उपचुनावों में जीत के बाद चौहान ने अपनी स्थिति मजबूत कर ली.

भाजपा में उन्हें अमित शाह का करीबी बताया जाता है, लेकिन यह कितना सच है और कितनी किंवदंती, ये कोई नहीं जानता. फिलहाल,पार्टी का जोर ओबीसी की राजनीति पर है और मिश्र की ब्राह्मण पृष्ठभूमि को उनके उत्थान में बाधा की तरह देखा जाता है. यह दीगर बात है कि ब्राह्मण परिवार में जन्म का इत्तफाक उन्हें सबसे अव्वल कुर्सी पर अपना दावा करने से शायद ही रोक पाए.

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