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देर से पर दस्तक दमदार

एक मराठी मुलगी ने गुल्लक सीरीज में मम्मी जी के ठेठ हिंदी कस्बाई किरदार से जीता दर्शकों का दिल.

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गीतांजलि कुलकर्णी गीतांजलि कुलकर्णी

आजकल तुम हमारे साथ अरुणा ईरानी जैसा व्यवहार कर रही हो.’’ ओटीटी प्लेटफॉर्म सोनी लिव पर खासी पॉपुलर हो चुकी मिश्रा परिवार की कहानी गुल्लक में पति के इस उलाहने पर सांती उर्फ शांति मिश्रा ठेठ उत्तर भारतीय कस्बाई महिलाओं जैसी भंगिमा बनाती हैं. शांति हिंदी पट्टी की स्त्रियों की गंवई जबान, देहभाषा खासकर चेहरे की भंगिमाओं को इतनी बारीकी से पकड़ती हैं कि एक बार को यकीन करना ही मुश्किल हो जाता है.

यह रोल गीतांजलि कुलकर्णी सरीखी एक ठेठ मराठी मुलगी ने निभाया है. पति संतोष और दो बेटों के साथ रोजमर्रा की छोटी-छोटी झिकझिक को जीते हुए गीतांजलि गुल्लक के गुदगुदाते किस्सों के जरिए अब हर घर में जाना-पहचाना जाने वाला चेहरा बन गई हैं.
सूती साड़ी-ब्लाउज, पल्लू कमर में खोंसे हुए, कानों में बाली, माथे पर बिंदी और सिंदूर धारण करने वाली यही शांति यानी गीतांजलि हाल में आई एक शांत-सी चर्चित फिल्म कोबाल्ट ब्लू में एक संवेदनशील समलैंगिक बेटे की अहम भूमिका में थीं.

सिनेमाप्रेमी इससे पहले उन्हें हाल के वर्षों में आई सर, फोटोग्राफ और मुक्तिभवन जैसी फिल्मों में देख चुके थे. लेकिन गुल्लक सीरीज ने सचमुच उन्हें हिंदी बेल्ट में आसानी से कहीं भी पहचान लिया जाने वाला चेहरा बना दिया. शांति की जबान को पकड़ने के लिए गीतांजलि ने 10 दिन की रिहर्सल में जान लड़ा दी. उस बीच किसी से भी मराठी में बात नहीं करती थीं.

हालांकि शांति मिश्रा उर्फ मक्वमी जी के किरदार में उतरने की जमीन दस साल पहले 2012 में ही तैयार हो चुकी थी. वह साल एक तरह से उनके करियर में मील का पत्थर था. एक तो अतुल कुमार निर्देशित उनके अभिनय वाले नाटक पिया बहरूपिया का लंदन के प्रतिष्ठित ग्लोब थिएटर में शो हुआ, जो किसी अभिनेता के लिए एक सपना सच होने जैसा होता है. इसी साल गीतांजलि ने जेहान मानेकशॉ और पद्मा दामोदरन के साथ मिलकर ड्रामा स्कूल मुंबई की स्थापना की.

पर सबसे अहम बात! इसी साल उन्हें मराठी फिल्म कोर्ट हासिल हुई. 2014 में आई चैतन्य तम्हाणे निर्देशित इस फिल्म को नेशनल अवॉर्ड मिला. इसमें पब्लिक प्रॉसीक्यूटर नूतन के रोल में मुखर होने के बावजूद बाकी जीवन में वे एक महिला के हिस्से आने वाली लानतें झेलती हैं. गुल्लक के निर्माता टीवीएफ वालों ने उसी नूतन में शांति का चेहरा देखा और प्रस्ताव लेकर वे गीतांजलि के पास पहुंचे. कहते हैं ना, बाकी इतिहास है.

गौरतलब है कि गीतांजलि ने भी अपने अभिनय को निखारने के लिए दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की शरण ली थी और वे 1996 में नवाजुद्दीन सिद्दीकी और गीतकार-अभिनेता स्वानंद किरकिरे वगैरह के साथ थीं. गीतांजलि कुबूलती हैं कि वे ब्राइट स्टुडेंट कभी नहीं रहीं. स्कूल के दिनों में क्लास में अव्वल आने वाले वालों पर ही टीचर्स का फोकस हुआ करता था. ऐसे में उन्हें स्कूल में हुनर दिखाने का मौका नहीं मिला.

ऐक्टिंग का शौक मोहल्ले के नाटकों तक ही सीमित रहा. लेकिन उसके बाद तो रुइया कॉलेज में (बीए, इकोनॉमिक्स में) एडमिशन ही उन्होंने इसलिए लिया क्योंकि वह थिएटर एक्टिविटीज के लिए मशहूर था. वहीं से उन्हें आगे यानी एनएसडी की मंजिल दिखने लगी. उन्हीं के शब्दों में, ''एनएसडी में मेरा दूसरा जन्म हुआ. मेरी पूरी पर्सनालिटी, पूरा नजरिया बदल गया. ऐक्टिंग, थिएटर, जीवन सबको एक नई रोशनी में देखा. देश के अलग-अलग प्रांतों से आए बैचमेट्स, सबकी भिन्न जीवनशैली. दिल्ली शहर के उस जीवन ने एक नया आत्मविश्वास बख्शा.’’

और कुछ सबक भी ऐसे मिले जिसे उन्होंने गांठ बांध लिए और जो आज भी उनके अभिनय में झलकते हैं. एनएसडी में ही बर्तोल्त ब्रेक्चत की कविताओं पर आधारित एक डिप्लोमा प्रोजेक्ट में उन्हें प्रॉस्टिट्यूट के रोल मिला. तब तक वे सादगी वाले रोल करती आ रही थीं. प्रोजेक्ट के डायरेक्टर स्वानंद ने रोल चैलेंजिंग बताकर उन्हें राजी किया. उन्होंने कर लिया. सारे बैचमेट्स और टीचर्स ने तारीफ की.

गीतांजलि सातवें आसमान पर. दर्शकों में रशियन डायरेक्टर वैलेंटिन टेपलोकोव बैठे थे. उन्होंने बाद में धीरे से आकर गीतांजलि को फीडबैक दिया: ''सब तो ठीक था लेकिन तुम्हारी आंखों में सपने दिख रहे थे. यह ऐसी उम्रदराज प्रॉस्टिट्यूट का रोल था जिसका धंधा चौपट हो गया है. उसकी आंखों में सपने नहीं हो सकते. मुझे यह बात खटकी.’’ यह बड़ा सबक था: किरदार की रूह में उतरना है तो आंखों की जबान का भी आपको पता होना चाहिए. उसके बाद तो टेपलोकोव के डायरेक्शन में उन्होंने एंटोन चेखव की रचना पर आधारित इवानोव नाटक भी किया.

पर अभी और सबक बाकी थे. एनएसडी से निकलने के बाद वे बहुत कन्फ्यूज्ड थीं. फिल्मों में रोल के लिए जगह-जगह फोटो देना उनसे नहीं हो पाता था. वे नाटकों की दुनिया में ही सहज महसूस करती थीं. कई नाटक किए, अवॉर्ड भी मिले पर मन मुताबिक काम नहीं मिल रहा था. पारंपरिक सोच वाला एक मराठी कमर्शियल नाटक करने और उसमें असहज महसूस करने के बाद उन्हें सबक मिला कि कुछ भी नहीं कर लेना है. तब से आज तक वे सिलेक्टिव हैं.

उन्होंने सुनील शानबाग, मानव कौल, मोहित टाकळकर सरीखे थिएटर दिग्गजों के साथ काम किया. लेकिन सबसे अच्छी जुगलबंदी रही, 2009 की ऑस्कर एंट्री हरिशचंद्राची फैक्ट्री के डायरेक्टर परेश मोकाशी के साथ. मराठी थिएटर के इस दिग्गज के साथ गीतांजलि ने तीन नाटक किए: संगीत डेबुच्या मुली, लग्न-कल्लोळ और मुक्काम पोस्ट बोंबिलवाडी. ..बोंबिलवाडी के तो पांच सौ से ज्यादा शो हुए.

एनएसडी में ही गीतांजलि को उनके जीवनसाथी अतुल कुलकर्णी मिले, जो एक साल सीनियर थे. वहां मराठी छात्र एक साथ चाय पीने जाया करते थे ताकि मराठी में बात करने का मौका मिले. अतुल ऐसी महफिलों के मेजबान हुआ करते थे. वैसे, प्रेम के इजहार में पहल गीतांजलि ने ही की. अतुल हक्का-बक्का! उन्होंने दो-तीन दिन का समय मांगा.

लौटे तो शादी के प्रस्ताव के साथ. 1996 में एनएसडी से मुंबई आते ही दोनों की शादी हो गई. वे हंसते हुए बताती हैं: ''परिजनों को अंदेशा था कि बच्चे भटक जाएंगे.’’ बच्चे पैदा न करने जैसा बड़ा फैसला भी दोनों ने यही सोचकर लिया कि काम संभालते हुए फैमिली संभालना मुश्किल होगा. गीतांजलि का सरनेम शेरीकर था. शादी के बाद चार साल तक वही रहा पर घर घरीदने के लिए लोन लेने के चक्कर में उन्हें इसे बदलना पड़ा. इसे वे बतौर स्त्री अपनी सबसे बड़ी हार मानती हैं.

पर वे बहुलतावादी सोच में यकीन करती हैं. अपनी फिल्म कोबाल्ट ब्लू से जोड़ते हुए वे कहती हैं: ''हमें हर सोच, हर जाति-धर्म के लोगों की बात सुननी चाहिए. सुनेंगे तो हम क्रांति भले न कर पाएं लेकिन अपने लिए ऐसी जिंदगी जी पाएंगे, जिसमें दूसरों के लिए प्यार हो न कि नफरत.’’ सिनेमा के परदे पर देर से पर दमदार ढंग से हाजिरी लगाने वाली 'मम्मी जी’ का गुल्लक-4 में भी दर्शकों को रहेगा बेसब्री से इंतजार.

—मुबारक अली

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