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डरपोक पाठक किस काम के!

लेखिका गीतांजलि श्री अपने उपन्यास रेत समाधि के अनुवाद टॉम्ब ऑफ सैंड के बुकर प्राइज के लिए शॉर्टलिस्ट होने, अनुवाद के अनुभव, पाठकों को चुनौती देने और अपनी पसंदीदा किताबों के बारे में.

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गीतांजलि श्री गीतांजलि श्री

 अगले हफ्ते बुकर प्राइज अनाउंस होना है. उलझन, घबराहट, रोमांच! किस तरह का सोच-विचार चल रहा है आपके भीतर?

मन शांत है. मेरा उपन्यास अंतिम छह में आया, मेरे लिए फख्र की बात है. अब आगे एक तरह का तुक्का भी है. थोड़ा तो गैंबल है ही. पर मैं उसके इंतजार में नहीं बैठी हूं.

 डेजी रॉकवेल के साथ अंग्रेजी अनुवाद की प्रक्रिया का कैसा अनुभव रहा?

बुकर की वजह से अंग्रेजी अनुवाद की ज्यादा चर्चा हुई पर आनी मोंतो फ्रेंच में पहले ही इसका अनुवाद कर चुकी थीं. दोनों के साथ लंबी खतो-किताबत काफी थकाऊ होती थी पर मजा भी आता था. आनी मोंतो ने तो मेरे माई उपन्यास के अनुवाद के दौरान उसमें वर्णित घर का नक्शा तक बनवा डाला था.

 अपने अगले उपन्यास सह-सा (इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी-22) में भी आप ढर्रे वाले पाठकों को चुनौती देती दिखती हैं.

पाठक अगर इस तरह की चुनौती से उत्साहित नहीं होते तो वे पाठक ही किस काम के! उन्हें यह सोचना चाहिए कि नई जमीन पर जाने में आपको डर क्यों लगता है? वहीं क्यों जाना है जहां आप बार-बार जाते रहे हैं?

 ऐसी कौन-सी पांच किताबें हैं जिन्हें आप पाठकों के लिए सुझाना चाहेंगी?

महाभारत और रामायण के अलाव मैला आंचल (रेणु), दिलोदानिश (कृष्णा सोबती), बस्ती (इंतजार हुसैन), आधा गांव (राही मासूम रजा) और दीवार में एक खिड़की रहती थी (विनोद कुमार शुक्ल). पर ये अभी याद आ रही हैं. सूची अंतिम न मानी जाए.

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