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शख्सियतः फिर झनके वीणा के तार

शास्त्रीय संगीतकार पं. विश्वमोहन भट्ट मिमी फिल्म में मोहन वीणा बजाने, रहमान और विशाल भारद्वाज के संगीत से जुड़े रहने और कोरोना संकट के एकांत पर.

शास्त्रीय संगीतकार पं. विश्वमोहन भट्ट शास्त्रीय संगीतकार पं. विश्वमोहन भट्ट

शास्त्रीय संगीतकार पं. विश्वमोहन भट्ट मिमी फिल्म में मोहन वीणा बजाने, रहमान और विशाल भारद्वाज के संगीत से जुड़े रहने और कोरोना संकट के एकांत पर.

रहमान और विशाल भारद्वाज के साथ कई फिल्मों से आप जुड़े रहे हैं. रहमान के साथ टुअर भी किए.

रहमान और विशाल शास्त्रीय संगीत और उसके कलाकारों का बहुत सम्मान करते हैं. रहमान ने मुझसे एक मलयाली गीत में भी वादन कराया था. इश्किया में रेखा भारद्वाज का गाया गीत बड़ी धीरे जली रैना राग ललित पर आधारित था जिसमें मैंने मोहन वीणा बजाई थी.

फिल्मों के संगीत से जुड़ना और उसमें मोहन वीणा वादन करना आपको कितनी संतुष्टि देता है?

यह एक अलग विधा है और बहुत मुश्किल भी है. शास्त्रीय संगीत में तो एक राग एक घंटे तक चलता है लेकिन यहां दो-तीन मिनट में आपको पूरा सार लाना पड़ता है.

मिमी के गीत छोटी-सी चिरैया में ए.आर. रहमान ने आपकी मोहन वीणा का खूब उपयोग किया. अरसे बाद आपका फिल्म संगीत से जुडऩा हुआ.

हां, ज्यादा तो नहीं पर जब भी फिल्म वाले बुलाते हैं तो करता हूं. कुछ संगीत निर्देशक हैं जो शास्त्रीय संगीत चाहते हैं. सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि कौन लोग फिल्म बना रहे हैं, और उनका शास्त्रीय संगीत से कैसा लगाव है.

हम शास्त्रीय संगीत वाले भी परहेज करते हैं क्योंकि वहां समझौते करने पड़ते हैं. हम चाहते हैं कि आप हम पर विश्वास करके पूरी स्वतंत्रता दें. मिमी का यह गीत राजस्थानी लोकसंगीत की एक पुरानी लोरी से प्रेरित है. फिल्मांकन भी राजस्थान में हुआ है.

वैसे फिल्में आपको शुरू से ही पसंद रही हैं. सुना है कि आप युवावस्था में परिवारवालों को बिना बताए ही मुगल-ए-आजम देखने चले गए थे?

मेरे पिता बहुत सख्त थे. वे बहुत अनुशासन में हमारा पालन-पोषण कर रहे थे. उन्हें चिंता थी कि हम कहीं शास्त्रीय संगीत से भटक न जाएं. तो हम परिवारवालों को बिना बताए ही फिल्म देखने चले गए थे और हंगामा हो गया था.

कोरोना काल ने मंचों के कार्यक्रम बंद कर दिए, कई कलाकार हमसे छीन लिए. इस दौरान आपने क्या किया?

आम दिनों में मैं महीने में 20-22 दिन बाहर ही रहता था लेकिन कोरोना काल में समय मिला तो मैंने गुरुओं को खूब सुना. आनलाइन कार्यक्रम और कार्यशालाएं कीं. मेरे मन में रोष नहीं था क्योंकि यह तो नियति है. मैंने इसका उपयोग किया. कई रचनाएं बनाईं. अभ्यास भी खूब हुआ.

—आलोक पराड़कर.

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