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पर्यावरण रक्षा के साथ भी मुनाफे का व्यापार संभव

ईआइए अधिसूचना नुक्सानदेह चीजों के लिए मजबूत प्रोत्साहन है जो हमारे उद्योगों को पहले से कहीं ज्यादा गैर-प्रतिस्पर्धी बना देता है

नजरियाः मुनाफे का व्यापार संभव नजरियाः मुनाफे का व्यापार संभव

माधव गाडगिल

हाल ही आई ईआइए (पर्यावरण प्रभाव आकलन) अधिसूचना उद्योग को देश के प्राकृतिक संसाधनों के खुले दोहन की पूरी अनुमति दे देगी और प्रदूषण संबंधी दंडात्मक कार्रवाई से भी उन्हें बचाएगी. यह मनमानी किसी भी हाल में स्वीकार्य नहीं होगी. यह लोकतंत्र पर कुठाराघात की कोशिश भी है. व्यावहारिक रूप से सार्वजनिक सुनवाई से दूर रखने के अलावा, अधिसूचना केवल अंग्रेजी और हिंदी में प्रकाशित की गई थी. हमारे देश के बहुत-से लोग इसे समझ नहीं सकेंगे. ये ग्रामीण इलाकों में और नदियों तथा समुद्र के किनारे रहने वाले लोग हैं जो बड़े पैमाने पर प्रदूषण और खनन, उत्खनन, अवैध निर्माण, राजमार्ग, रेलवे लाइन, हवाई अड्डों और बंदरगाहों के निर्माण के लिए अपनी जमीनें गंवाने के कारण सबसे अधिक प्रभावित होंगे.

तमिलनाडु सरकार इसका तमिल अनुवाद जारी कर रही है और नागरिकों से 50 दिनों के भीतर इस पर जवाब देने का अनुरोध किया गया है. केरल और पश्चिम बंगाल में ऐक्टिविस्ट अपने स्तर पर ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं. इसके बाद वे संदेश को जमीनी स्तर तक पहुंचाने के लिए लोगों के बीच जाएंगे और बताने की कोशिश करेंगे कि आगे चलकर उन्हें किन चीजों का सामना करना पड़ सकता है. वे लोगों से मंत्रालय को अपनी भाषाओं में संदेश भेजने का आग्रह करेंगे. यदि वे सफल होते हैं तो अब पर्यावरण मंत्रालय को केवल 17 लाख संदेश प्राप्त नहीं होंगे जैसा कि आज हो रहा है बल्कि 17 करोड़ संदेश मिलेंगे.


अधिक महत्वपूर्ण बात जिसे रेखांकित करने की जरूरत होगी कि मौजूदा सरकार का नजरिया दीर्घावधि में हमारे देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज को कई मायनों में चोट पहुंचाएगा. उद्योगों और शहरी केंद्रों को अपनी सभी गतिविधियों की लागत कम करने के लिए इस तरह का लाइसेंस एक तरह से उन्हें अत्यधिक नाकारा रहने को प्रोत्साहित करेगा. उन्नत प्रौद्योगिकियों को विकसित करने और उसे अपनाने के लिए प्रेरित न होने के कारण उद्योग अत्यधिक अक्षम रह जाएंगे. इसकी मिसाल महाराष्ट्र में देखी जा सकती है. यहां के चंद्रपुर जिले में पेपर मिल की स्थापना के बाद से ही उसे अत्यधिक रियायती दरों पर बांस की आपूर्ति की जा रही है. ठेकेदार बांस को सरकार नियंत्रित आरक्षित वनों से कटवाकर लाते हैं और स्थानीय आदिवासी उत्पादकों को बहुत कम मजदूरी देते हैं. मिल आसपास के इलाके में भारी वायु और जल प्रदूषण फैलाती है.

इस फैक्ट्री का कचरा वर्धा नदी में गिराया जाया जाता है जिससे पानी में मछलियों की संख्या बहुत कम हो गई है और मछली पकड़ने वाले समुदाय के लिए आजीविका का संकट छाया है. साथ ही उपभोक्ताओं को इस सस्ते और बहुत पसंद किए जाने वाले प्रोटीन की बहुत किल्लत हो रही  है. 2009 में इस मिल ने यूरोप से ऐसी नई मशीनरी खरीदी जो वहां के कागज उद्योग ने इसलिए कबाड़ में बेची क्योंकि पुरानी तकनीक अत्यधिक प्रदूषणकारी थी. स्थापित होने पर इस मशीनरी ने इतना भयानक वायु प्रदूषण किया कि स्थानीय समुदाय को इसके खिलाफ जोरदार विरोध प्रदर्शन करना पड़ा. हालांकि मिल बंद करने की धमकी देकर और संगठित श्रम की शक्ति का उपयोग करके विरोध को दबा दिया गया. वर्धा नदी का प्रदूषण बढ़ गया, पर असंगठित मछुआरा समुदाय और मछली उपभोक्ता कोई विरोध नहीं कर पाए थे.


फिनलैंड कागज उद्योग के वरिष्ठ प्रौद्योगिकीविद् 1995-97 में इंडोनेशिया में वानिकी अनुसंधान अंतरराष्ट्रीय केंद्र की गवर्निंग बॉडी में मेरे सहयोगियों में से एक थे. उन्होंने बताया कि 1950 के दशक की शुरुआत में फिनलैंड के पेपर उद्योग ने प्रदूषणकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया था. इसका वहां जोरदार विरोध प्रदर्शन हुआ और उद्योग शून्य-अपशिष्ट प्रौद्योगिकी को विकसित करने के लिए गंभीर अनुसंधान को बाध्य हुआ. फिनलैंड पेपर निर्यात से बहुत अच्छी कमाई करता है, लेकिन उससे अधिक कमाई शून्य-प्रदूषण तकनीक बेचकर करता है. ईआइए अधिसूचना नुक्सानदेह चीजों के लिए मजबूत प्रोत्साहन है और यह एक ऐसा खतरनाक कदम है जो हमारे उद्योगों को पहले से अधिक गैर-प्रतिस्पर्धी बना देता है.


मैं एक वैज्ञानिक संस्थान में प्रतिस्पर्धा की इस कमी के ताजा मामले के बारे में जानता हूं, जहां एक वैज्ञानिक पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया गया क्योंकि उसने मौसम की जानकारी प्रदर्शित करने के लिए चीनी कंपनी से सस्ते साइनबोर्ड खरीदे थे. उस वैज्ञानिक ने झूठे तरीके से यह प्रमाणित किया कि वह उत्पाद भारतीय कंपनी ने तैयार किया था, जिसकी कीमत वास्तव में चीनी उत्पाद से पांच गुना ज्यादा थी. उसने बीच का मुनाफा जेब में डाल लिया जो कि कई करोड़ रुपए का था. विकृत प्रोत्साहन की यह एक मिसाल भर है.


इस तरह की नीतियों के चलते दशकों से भारत अपने पर्यावरण को तेजी से नुक्सान पहुंचा रहा है और इससे सामाजिक विवाद बढऩे के साथ सरकार पर विश्वास में भी गंभीर क्षरण देखा जा रहा है. ये बातें भारत के वल्र्ड हैप्पीनेस रैंकिंग में बहुत नीचे चले जाने से परिलक्षित होती हैं. 2020 के रैंकिंग आंकड़ों में 156 देशों की घटते क्रम में रैंकिंग की गई है. इसमें शीर्ष पर फिनलैंड और कुछ अन्य स्कैंडिनेवियाई देश हैं, जिन्होंने सामाजिक और आर्थिक समानता को बढ़ावा देने और अपने पर्यावरण की अच्छी देखभाल करने के लिए कड़ी मेहनत की है. भारत इस सूची में बहुत नीचे 141वें स्थान पर है.

लेखक प्रसिद्ध पारिस्थितिकीविद् और सेंटर ऑफ इकोलॉजिकल साइंसेज के संस्थापक हैं

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