scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

मेहमान का पन्नाः नमूदार होने का अधिकार

लेखिका यूनाइटेड सिख्स की इंटरनेशनल लीगल डायरेक्टर हैं.

X
मजिंदरपाल कौर मजिंदरपाल कौर

मजिंदर पाल कौर

हिजाब को लेकर चल रहे विवाद ने हमें हतप्रभ कर दिया. मुस्लिम औरतें स्कूलों सहित सार्वजनिक स्थलों पर दुनिया भर में हिजाब पहनती हैं. यह और भी स्तब्धकारी है कि यह बहस भारत में हो रही है. उस देश में जहां कई धर्मों की स्थापना हुई और भारतीय संविधान के जरिए धार्मिक स्वतंत्रता प्रदान किए जाने से बहुत पहले युगों-युगों से मौजूद रही है.

इसी धार्मिक स्वतंत्रता की खातिर 347 साल पहले सिखों के नौवें गुरु श्री तेग बहादुर जी ने अपनी जिंदगी न्योछावर कर दी ताकि कश्मीरी पंडित अपना जनेऊ पहन सकें. जनेऊ के भेदभावपूर्ण होने की तो बात ही छोड़ दें, उन्होंने यह सवाल उठाए बगैर ऐसा किया कि यह सनातन धर्म की अनिवार्य आवश्यकता है या नहीं. उनके पिता गुरु हरगोबिंद साहिब जी ने मुगल काल में हरगोबिंदपुर में मुसलमानों के लिए गुरु की मसीत का निर्माण किया.

भारत के शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर पाबंदी लगाने का कोई विधिशास्त्रीय कारण नहीं है. कर्नाटक हाइकोर्ट के अंतरिम आदेश ने प्रभावित मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनने पर वस्तुत: प्रतिबंध लगा दिया, जबकि इसका कोई कानूनी आधार नहीं है; यह प्रभावी तौर पर उनके शिक्षा के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन भी है, जिससे बचा जा सकता था.

हाइकोर्ट संबंधित संस्थाओं को आदेश दे सकती थी कि वे मामले का अंतिम निबटारा होने तक मुस्लिम छात्राओं को परिसरों के भीतर पढ़ाई की वैकल्पिक और सुरक्षित जगह दें. हाइकोर्ट के अंतरिम आदेश के विरुद्ध दायर याचिका पर जल्द सुनवाई से सुप्रीम कोर्ट का इनकार भी मददगार नहीं था. यूनाइटेड सिख्स ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग में शिकायत दाखिल करके मामले का संज्ञान लेने को कहा है, क्योंकि यह भारत के संविधान का उल्लंघन है, जो धर्म के आचरण और शिक्षा के अधिकार की रक्षा करता है.

धर्म या आस्था की स्वतंत्रता सार्वजनिक स्थल पर निजी अधिकार है. आप किसी व्यक्ति से निजी तौर पर या अल्पकालिक आधार पर अपनी आस्था को मानने या अपने धर्म के अनुसार आचरण करने की उम्मीद नहीं कर सकते, क्योंकि यह धर्म या आस्था की सार्वभौमिकता के विपरीत होगा. यही जीवन में आस्था या धर्म के प्रदर्शन पर भी लागू होता है.

धार्मिक अल्पसंख्यक अक्सर तभी अलग दिखाई देते हैं जब उनके धर्म का प्रदर्शन वह पहचान रखता है जो निर्धारित ढांचों के खिलाफ जाती है. पश्चिम में सिखों के खिलाफ पक्षपात इसलिए नहीं होता है कि वे दिखाई देते हैं बल्कि अज्ञानी जनता की वजह से होता है. भारत में पगड़ीधारी सिख से जनता सुरक्षित महसूस करती है. इसी तरह हिजाब में महिलाओं को सम्मान से देखना चाहिए, ऐसे लोगों की तरह जो अपने ज्ञानबोध के प्रति आस्थावान हैं
.
स्थापित अंतरराष्ट्रीय कानून यही कहता है कि यह तय करना सेक्यूलर अदालत का काम नहीं कि अनिवार्य धार्मिक आवश्यकता क्या है. जहां तक धार्मिक विश्वास सच्चा है, उसे स्वीकार करना सेक्यूलर अदालत की बाध्यता है. हमारी कानूनी टीम ने 2018 में साइक्लिंग एसोसिएशन की ओर से एक सिख साइकिल चालक के पगड़ी पहनने पर लगाए गए प्रतिबंध के विरुद्ध भारतीय सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी.

सुनवाई के दौरान पीठ ने पूछा, ''क्या पगड़ी सिख धर्म में आवश्यक है?’’ इस सवाल से हम अवाक् रह गए, क्योंकि लगा कि अदालत सिख पहनावे में पगड़ी की केंद्रीयता के बारे में व्यापक सामाजिक समझ का न्यायिक संज्ञान लेने को तैयार नहीं थी. हम परेशान नहीं हुए. हमने जजों को संतुष्ट करने के लिए सिख ग्रंथों और ऐतिहासिक पाठों को खंगालने में कई-कई घंटे गुजारे और हम सफल रहे.

पश्चिम में सिख घृणा से उपजे अपराधों और 9/11 की प्रतिक्रिया में लाए गए कानूनों के बेजा निशाने बन गए. जनता से कहा गया कि 9/11 के आंतक को पगड़ीधारी आदमियों ने अंजाम दिया था. अज्ञानी जनता ने अपना डर पगड़ीधारी सिखों पर डाल दिया. हवाई अड्डों और दूसरी सार्वजनिक जगहों पर सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं के नतीजतन पगड़ियों की अंधाधुंध जांच होने लगी और मेटल डिटेक्टरों के बज उठने के चलते कृपाण को निशाना बनाया गया.

सिखों को अपने इस अधिकार के लिए लड़ना पड़ा कि अपनी आस्था की वस्तुएं पहनने की वजह से उनके खिलाफ भेदभाव न हो. यूनाइटेड सिख्स की कानूनी टीम ने स्कूलों में और आइडी के फोटो के लिए पगड़ी पर फ्रांस की पाबंदी के खिलाफ 2008 में यूएनएचआरसी में तीन अर्जियां पेश कीं. हम तीनों मामले जीते लेकिन फ्रांस ने यूएनएचआरसी के निर्धारण को अनदेखा कर दिया और पाबंदी अब भी जारी है. 

धर्म की स्वतंत्रता सार्वजनिक स्थल पर निजी अधिकार है. आप किसी व्यक्ति से निजी तौर पर या अल्पकालिक आधार पर अपनी आस्था को मानने या अपने धर्म के अनुसार आचरण करने की उम्मीद नहीं कर सकते.

—मजिंदरपाल कौर

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें