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नजरियाः गंवा दिए गए मौके की कीमत

साल 2020 को विद्यार्थियों के लिए 'गैप ईयर' मानने से साल बर्बाद होगा, जिसके आर्थिक नतीजे होंगे. ज्यादातर छात्र इसे गवारा नहीं कर सकते

उमा महादेवन दासगुप्ता उमा महादेवन दासगुप्ता

उमा महादेवन दासगुप्ता

भारत में प्रवेश परीक्षाएं फिल्टर करने की प्रणाली हैं. प्रतियोगिता परीक्षा प्रणाली तकनीकी और चिकित्सा शिक्षा की पेशेवर संस्थाओं में सीटों की सीमित संख्या के लिए ढेर सारे आवेदकों में से छानने या फिल्टर करने के मकसद से तैयार की गई है क्योंकि इसके बिना आवेदकों की इतनी बड़ी तादाद को संभालना मुश्किल होता. चीजें अब भी मझधार में हैं और इसको देखते हुए कोविड महामारी से पैदा बेचैनी, जो प्रवेश परीक्षाओं के टलने से और बदतर हो गई है, समझी जा सकती है. क्या विद्यार्थी अपना एक साल 'गंवा' देंगे? क्या अगली बार वे परीक्षा में बैठने के अपात्र हो जाएंगे? क्या प्रतिस्पर्धा इतनी जबरदस्त हो जाएगी?

कोविड के मामलों की संक्चया बढ़ने के साथ इस बात को लेकर चिंताएं बढ़ गई थीं कि आइआइटी-जेईई और एनईईटी या नीट 2020 की परीक्षाएं कैसे आयोजित की जाएं. दो बार टालने के बाद सोच-समझकर परीक्षाएं, पूरी एहतियात के साथ, आयोजित करने का फैसला किया गया था. वैक्सीन मिलने, हर्ड इम्यूनिटी विकसित होने या महामारी के रुखसत होने से पहले ही जिंदगी का सिलसिला आगे बढ़ाना और आजीविकाएं बहाल करना जरूरी है, हालांकि यह सब यथासंभव सबसे सुरक्षित तरीकों से हो.

ऑनलाइन परीक्षा का उपाय अव्यावहारिक तो है ही, इसमें नाइंसाफी भी है. परीक्षाओं को पूरी तरह रद्द कर देना और इसे तमाम विद्यार्थियों के लिए 'गैप इयर' मान लेना समस्या को टाल भर देना होगा. इससे अगले साल आवेदकों की संख्या बहुत ज्यादा बढ़ जाएगी. ग्रेजुएट कर रहे जत्थों का प्रवाह कुछ समय के लिए ठहर जाएगा. इससे इन परीक्षाओं में बैठने वाले बहुसंख्यक विद्यार्थियों की आर्थिक हकीकतें नजरअंदाज हो जाएंगी. एक साल गंवाने के आर्थिक नतीजे हैं, जिन्हें ज्यादातर छात्र गवारा नहीं कर सकते. उच्च मध्यम वर्गीय परिवारों के नौजवानों के लिए गैप ईयर एक किस्म की छोटी-सी विलासिता हो सकती है और उनके परिवार आसानी से इसे स्वीकार कर सकते हैं. वहीं, बहुसंख्यक विद्यार्थियों के लिए उच्च शिक्षा ज्यादा सुरक्षित जिंदगी की सीढ़ी है, जहां उन्हें नियमित आमदनी, अच्छी-भली स्वास्थ्य सेवा और रहन-सहन का बेहतर स्तर मिल पाता है.

लिहाजा अगर परीक्षाएं करवानी ही पड़ें तो जन नीति का सबसे अच्छा विकल्प यह देखना है कि उन्हें सुरक्षित ढंग से कैसे करवाया जा सकता है. यही नहीं जो विद्यार्थी इन परीक्षाओं में बैठते हैं, वे प्राथमिक या माध्यमिक स्कूल के छोटे बच्चे नहीं हैं, जिन्हें संकरे, तंग और बेहवादार कमरों में बैठकर परीक्षा देनी पड़े. भारत यह आयोजन एहतियात से नियोजित व्यवस्थाओं में करवाने में सक्षम है. आदर्श तो यही होगा कि विद्यार्थी ये परीक्षाएं बड़े, हवादार हॉल में बैठकर दें जहां अच्छी हवा आती हो और पिछले ही दिन साफ-सुथरा कर दिया गया हो. वे सांस लेने में आसान सूती मास्क पहनें हों, शारीरिक दूरी रख पाएं और परीक्षा के ठीक पहले और बाद में अपने हाथ धो पाएं.

परीक्षा केंद्रों तक लाने-ले जाने के लिए यातायात के सुरक्षित साधन का इंतजाम मुमकिन है और लोगों को व्यवस्थाओं की जानकारी सार्वजनिक नोटिसों से पहले ही मिल जानी चाहिए. जो विद्यार्थी महामारी के दौरान परीक्षा में नहीं बैठना चाहें, उन्हें अगली परीक्षा में बैठने का मौका दिया जाना चाहिए. अलबत्ता, सोच-विचार यहीं नहीं रुकना चाहिए. यह भारत के लिए व्यवस्था में ज्यादा लचीलापन लाने का मौका भी है. साथ ही, यह सोचने का भी कि इन परीक्षाओं को ऐसा कैसे बनाए जाए कि जिससे इन्हें जिंदगी बनाने या बिगाड़ने वाला, आखिरी विकल्प कम समझा जाए. कोई एक परीक्षा विद्यार्थियों के लिए काबिलियत दिखाने का अकेला मौका नहीं होनी चाहिए. परीक्षा साल में दो बार या ज्यादा बार, व्यवस्थित रूप से नियोजित और निरीक्षक की देखरेख में ऑनलाइन साधनों से आयोजित हो सकती हैं.

एक ही प्रवेश परीक्षा आयोजित करने से आगे, महामारी हमारे लिए जरूरी चीजों को करने के पारंपरिक तरीकों पर नए सिरे से सोचने का वक्त है. हमें पूछना होगा कि क्या परीक्षाएं छात्रों की क्षमताओं के बारे में जानने के बहुत सारे तौर-तरीकों के ज्यादा बड़े बस्ते का महज एक हिस्सा भर होनी चाहिए. एक साझा परीक्षा करवाना सामाजिक गैरबराबरी की समस्या का तकनीकी व्यवस्था पर आधारित समाधान है. तमाम छात्र एक साझा परीक्षा देते हैं, इसका यह मतलब नहीं है कि उन्हें समान सुख-सुविधाएं हासिल हैं या उन्हें तुलनात्मक रूप से समान अवसर सुलभ हैं. क्या ज्यादा सर्वांगीण और ज्यादा बारीक फर्क वाली चयन पद्धति सामाजिक गैरबराबरियों को कम करने और उच्च शिक्षा को ज्यादा विविधतापूर्ण तथा समतामूलक बनाने के लिहाज से बेहतर होगी? हमें उच्च शिक्षा को ऐसे ज्यादा से ज्यादा छात्रों की पहुंच में लाने के तरीकों के बारे में सोचना ही होगा, जिन्हें वे मौके सुलभ नहीं हैं जो यह पेश करती है.

हमें संकट से घिरी उच्च शिक्षा के बारे में भी आत्मनिरीक्षण करना चाहिए. वाइस चांसलर का चयन विविधता से भरे और समावेशी अकादेमिक संस्थान की अगुआई करने की उनकी क्षमता के आधार पर होना चाहिए. संस्थाओं की स्वायत्तता उच्चतम दर्जे की बौद्धिक कृतियों में जाहिर होनी चाहिए. हमारे नौजवान इससे कम के हकदार नहीं हैं.

उमा महादेवन-दासगुप्ता आइएएस अफसर हैं और महिला तथा बाल विकास और शिक्षा क्षेत्रों में काम कर चुकी हैं

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