scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

पाक-भारत संबंध: चुप्पी, हिंसा और हठधर्मिता

उकसावे के बावजूद भारत को पाकिस्तान के साथ बातचीत का रास्ता तो खुला रखना ही है, लेकिन हमेशा होशियार रहना होगा. ‘‘आक्रामक सुरक्षा’’ की नीति विवेक सम्मत नहीं.

X

भारत का नया मंत्र प्रेम और शांति नहीं, बल्कि ‘‘मेक इन इंडिया’’ है. वैसे भी वह प्रेम कोई प्रेम नहीं, जिसमें प्रेमी मुसलमान और प्रेमिका हिंदू हो, तब वह जेहाद  कहलाने लगता है. कई हिंदू भारत की मुस्लिम विरासत के प्रति नफरत पाले रहते हैं, लेकिन खुलकर इजहार नहीं कर पाते, वे उसे पाकिस्तान की तरफ उड़ेल देते हैं. पाकिस्तान इस नफरत के जहर के लिए नीलकंठ बन जाता है. इससे लगता है, जब तक सचमुच शांति न हो, तब तक शांति कायम नहीं की जा सकती.

अगर हमारा राष्ट्रीय मिशन पहले भारत को विकसित करना है, तो पाकिस्तान कोई मायने नहीं रखता. वह न तो बाजार है और न ही प्रतिस्पर्धी, न ही निवेश या टेक्नोलॉजी का कोई ठिकाना. हम इतनी तेजी से आगे बढ़े जा रहे हैं कि पाकिस्तान हमारी नजर के दायरे में नहीं है. हमारे पास विशाल भौगोलिक इलाके की वजह से ऐसी सामरिक ताकत है जिसे पाने का ख्वाब पाकिस्तानी फौज देखती रहती है.

हमारी आबादी उससे छह गुना ज्यादा है और हमारी अर्थव्यवस्था उससे आठ  गुना बड़ी है. पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था में पिछले लगभग दो दशक से मंदी बनी हुई है,  लेकिन पांच साल की सुस्ती के बाद भारत की अर्थव्यवस्था ने फिर रफ्तार पकड़ ली है, इसलिए दोनों का अंतर भी बढ़ता जा रहा है. जिन लोगों ने शीत युद्ध के दौर में पाकिस्तान को भारत के बरअक्स खड़ा करने की कोशिश की थी, उन्हें भी इसका एहसास हो गया था कि यह मुमकिन नहीं. ऐसे में हम अक्सर पूछते हैं कि यह पाकिस्तानियों को क्यों नहीं दिखता, नाक रगड़े जाने पर भी उन्हें एहसास क्यों नहीं होता?

असलियत तो यह है कि उन्हें यह एहसास है. हमारी चूक तो यह है कि हम बीस करोड़ की आबादी वाले देश को ही बुराई का प्रतीक मान लेते हैं जबकि उनमें से ज्यादातर को अपनी जिंदगी की फिक्र है. उन्हें भारत से भय हो सकता है लेकिन ज्यादातर लोग जानते हैं कि पाकिस्तान कितना पीछे है. वे इस हकीकत से भी वाकिफ हैं कि उनकी परेशानियां उनकी अपनी हैं, हमारी किसी साजिश का नतीजा नहीं हैं.

इस समय पाकिस्तान में भारत विरोध अब उतना व्यापक नहीं है जितना पाकिस्तान के प्रति हमारे यहां है. वहां का शिक्षित व व्यावसायिक तबका मजबूत होते भारत के साथ तालमेल का इच्छुक है. जो भारतीय इस बात को गलत बताते हैं, उन्होंने वहां के पिछले दो चुनावों पर गौर नहीं किया. उस दौरान वहां न तो विदेशी हाथ और न ही कट्टर राष्ट्रवाद का हौवा था. दोनों प्रमुख पार्टियों ने भारत का जिक्र केवल इस संदर्भ में किया कि वे उसके साथ शांति बनाए रखने की दिशा में भरसक कोशिश करेंगी.

पाकिस्तान के सियासी नेताओं ने अपने कहे पर अमल भी किया. प्रधानमंत्री नवाज शरीफ फौज के विरोध के बावजूद भारतीय प्रधानमंत्री की शपथ ग्रहण में आए. यह इसकी मिसाल है कि कि फौज और राजनैतिक नेताओं के नजरिए में कितना फर्क आ गया है. इससे पहले 2008 में पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ जरदारी ने भारतीय मीडिया में यह कहकर सनसनी फैला दी थी कि वे ‘‘उस दिन का ख्वाब देखते हैं जब पाकिस्तान भारत की ताकत में गुणात्मक वृद्धि करने वाला देश बन जाएगा.’’

यह कहने की हिम्मत कोई भारतीय नेता पाकिस्तान के बारे में या किसी भी अन्य देश के बारे में शायद ही जुटा पाएगा. हालांकि इसके विरोध में पाकिस्तान में आवाज भी उठी. पाकिस्तानी फौज तो इतनी बौखला गई कि उसने अपने एजेंटों से काबुल में हमारे दूतावास और फिर मुंबई में हमले करवाए.

पाकिस्तानी फौज और आम लोगों के बीच इस अंतर्विरोध पर हम शायद ही गौर करते हैं. हमें पाकिस्तानी फौज के इस दावे को खारिज करने की हर मुमकिन कोशिश करनी चाहिए कि भारत उनके देश के लिए खतरा है. नियंत्रण रेखा  पर हो रही फायरिंग के जवाब में हमारा अपनी मशीनगनों व मोर्टारों का मुंह खोल देना और सीमा पार आम लोगों को मौत के घाट उतार देना ठीक वही है जो उनकी फौज हमसे कराना चाहती है. इससे पाकिस्तानी जनरल न तो रुकते हैं, न कमजोर होते हैं, उलटे उन्हें ताकत मिलती है. विरोधाभासी अलंकारों की तरह ‘‘आक्रामक सुरक्षा’’ की हमारी नीति अविवेकपूर्ण है.

 तो क्या दिल्ली के हमारे हुक्मरानों की समझ इस बात पर बन पड़ी है कि पाकिस्तान से पैदा होने वाला आतंकवाद ही हमारी सुरक्षा के लिए सबसे बड़ा खतरा है और उसके रुकने तक उसके साथ सामान्य रिश्ते की संभावना की कोई गुंजाइश नहीं है. अफसोस यह है कि पाकिस्तान के मामले में दिल्ली में चाहे सरकार कोई भी हो, नासमझी में उनमें एका है.

हम खुद को पाकिस्तान से अलग-थलग नहीं रख सकते. कुशल खुफिया तंत्र से ही सीमा पार से हो रहे हमले रुकेंगे, जैसा कि मुंबई हमले के बाद हुआ. लेकिन जब तक उसकी फौज जिद्दी बनी हुई है, हमले पूरी तरह नहीं रुकेंगे.  ऐसे में, हमारे सामने विकल्प क्या हैं?

मुंबई हमले के बाद फिक्की ने विशेषज्ञों के एक पैनल से भारत के सामने आतंकवाद से पेश होने वाले खतरों का अध्ययन करने को कहा था. उन विशेषज्ञों में से कुछ मौजूदा सरकार के सलाहकार भी हैं. उनमें तीन रिटायर्ड पुलिस अधिकारी थे, जिन्हें भारी ज्ञानी-मानी बताया जाता है. उनकी सिफारिशों में गुप्त कार्रवाई से लेकर आर्थिक पाबंदियों और लक्षित सीमा-पार हमलों तक सभी तरह के उपाय शामिल थे. आज नई सरकार में इन सभी उपायों पर फिर से चर्चा होने लगी है. लेकिन इनमें कोई भी कारगर उपाय कतई नहीं है.

इस गुप्त कार्रवाई का मतलब है पाकिस्तान के साथ वही करना जो उसके आतंकवादी हमारे साथ करते हैं. यह बड़ी गलती होगी. इस तरह हम पाकिस्तानी फौज के साथ उसकी शर्तों पर लड़ेंगे, बेगुनाह पाकिस्तानियों को मारेंगे और लोकतांत्रिक सरकार को खस्ताहाल कर देंगे. इस तरह हम अमन चाहने वालों को अलग-थलग कर देंगे. आर्थिक पाबंदियों का कोई मतलब नहीं है क्योंकि पाकिस्तान के साथ न तो कोई व्यापार है और न ही हमारा वहां कोई निवेश है.

किसी परमाणु हथियार संपन्न देश की सीमा में घुसकर हमले इतने जोखिम भरे हैं कि अमेरिका ने अफगानिस्तान स्थित अपनी सेना पर हमलों के बावजूद पाकिस्तान में कभी मोर्चा खोलने की कोशिश नहीं की. 2002 में ऑपरेशन पराक्रम से यह साबित हो चुका है कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय संकट पाकिस्तान की तुलना में हमें कई गुना ज्यादा नुक्सान पहुंचाता है. यानी ये नीतियां नहीं, कोरा गप्प हैं.

फिर पाकिस्तान के साथ रिश्ते को सिर्फ एक मसले से जोड़कर देखना भी उसी तरह अडिय़ल रवैया है, जैसा पाकिस्तान दशकों से कश्मीर मसले को अपनी टेक बनाए हुए है. कई लोग यह दलील देते रहे हैं कि साझी समस्याओं व हितों वाले दो पड़ोसियों के बीच कुछेक मुद्दों पर अड़ा रहना सही नहीं है. ज्यादातर पाकिस्तानी इस दलील को स्वीकार कर चुके हैं जबकि इसके उलट हमने उनकी फौज की दलील अपना ली है.

भारत में लोगों के सामने मौजूद खतरों के पैमाने पर आतंकवाद कहां ठहरता है? साउथ एशिया टेररिज्म पोर्टल के एकत्र किए गए आंकड़े बताते हैं कि 2009 में 721 भारतीय आतंकवादियों के हाथों मारे गए. अगले चार साल में यह आंकड़ा 759, 429, 252 और 304 रहा. इनमें से बहुत कम मौतों के लिए ही पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. 2013 में 304 में से 159 लोग वामपंथी उग्रवादियों के शिकार हुए, 95 लोग असम, मणिपुर, मेघालय व नगालैंड में मारे गए और 30 आंध्र प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल में.

जम्मू-कश्मीर में, जहां पाकिस्तानी आतंकवादी ज्यादातर सक्रिय हैं, यह संख्या केवल 20 थी. उसी साल पाकिस्तानी आतंकवादियों ने 3,001 बेगुनाह पाकिस्तानियों की हत्या की. यकीनन पाकिस्तान आतंकवाद का केंद्र है लेकिन वहीं सबसे ज्यादा तबाही भी मचती है. पाकिस्तान में लगभग रोजमर्रा की बात की तरह हो रही यह तबाही भारतीय मीडिया में जगह नहीं पाती. लेकिन वाघा सीमा के पार फिदायीन हमला शायद हमें यह एहसास करा रहा है कि वहां आम लोग और सरकार किससे रू-ब-रू हैं.

बेशक, आतंकवाद का राजनैतिक असर होता है जो सामान्य अपराधों का नहीं होता, लेकिन यह भी सही है कि केवल शांति ही पाकिस्तान से आतंकवाद को पूरी तरह रोक सकती है. ऐसा तब मुमकिन होगा जब वहां की फौज साथ दे. फौज साथ तभी देगी जब या तो कोई जनरल सत्ता में होगा या फिर लोकतांत्रिक सरकार इतनी मजबूत होगी कि फौज को काबू में रख सके या फौज यह महसूस करे कि शांति रहने से ही उसके हित सधेंगे.

अब जबकि पाकिस्तान में सैन्य तख्तापलट की आशंका कम है क्योंकि फौज इस खस्ताहाली में देश के शासन का बोझ् मोल नहीं लेना चाहती, तो यह हमारे हित में है कि जनरलों के बरअक्स वहां के लोकतांत्रिक नेतृत्व को मजबूत करने के लिए हम हर मुमकिन मदद करें. इसके लिए उससे लगातार संवाद बनाए रखने की जरूरत होगी.

इसके साथ ही हम पाकिस्तानी फौज में भी मिठास भरने के तरीके खोज सकते हैं. जब जनरल परवेज मुशर्रफ ने फौज पर यह दबाव डाला कि शांति अपरिहार्य है, तो पाकिस्तानियों ने कहा था कि इसके सबूत इस तथ्य में निहित हैं कि उसके अफसरों ने वाघा की तरफ जाने वाली सड़क के दोनों ओर खूब जमीन खरीदी हैं.

पाकिस्तानी फौज के बड़े वाणिज्यिक और औद्योगिक हित हैं. जमकर अनुदान पाने वाले उसके अफसर मुनाफे की खेती करते हैं. मसलन, हम उसके दो वाणिज्यिक ठिकानों से सीमेंट खरीद सकते हैं; अपना भंडार भरने के लिए गेहूं खरीद सकते हैं; उनके साथ मिलकर सिंध में प्लांट लगा सकते हैं ताकि पाकिस्तान के विशाल लिग्नाइट भंडार का इस्तेमाल करके बिजली बनाएं और अपना कार्बन फुटप्रिंट बढ़ाए बिना बिजली आयात कर लें.

कट्टर तत्वों को भले न खरीदा जा सके लेकिन हम बाकी पाकिस्तानी फौजियों को यकीन दिला सकते हैं कि भारत के साथ शांति उनके लिए फायदेमंद है. पिछले दशक के मध्य में हमने इसकी शुरुआत भी की थी. लेकिन चुप्पी व हिंसा की हमारी मौजूदा नीति नामसझीपूर्ण मर्दानगी है जो महज सीमा पार शांति के झंडाबरदारों को कम करती है और युद्धोन्मादियों को खुश करती है. यकीनन, हम पाकिस्तानी फौज में उन्मादियों को दरकिनार नहीं कर सकते परबाकियों के साथ संवाद बनाना होगा. यह मुश्किल होगा लेकिन फिर कूटनीति कोई पढ़े-लिखों को पाठ पढ़ाना तो है नहीं.

(सत्यब्रत पाल 2006 से 2009 तक पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त थे)

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें