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बदल जाए रिश्तों की तासीर

अटकलें बेहिसाब हैं कि भारत के साथ सीमा झड़प शुरू करने की चीनी वजहें हैं. लेकिन ये आखिरी चीज होगी जो इसके नेता करना चाहेंगे.

झिकुन झू झिकुन झू

कवि गुरु, नोबल पुरस्कार से सम्मानित रवींद्रनाथ टैगोर की मशहूर उक्ति है, ''सूरज न देख पाने पर दुखी हो जाओगे तो तारे भी नहीं दिखेंगे.’’ उनका यह कथन भारत-चीन के बीच बढ़ते तनाव के दौर में शांत रहकर सकारात्मक बातों पर ध्यान देने की जरूरत की याद दिलाता है.

टैगोर पहली बार 1924 में प्रसिद्ध चीनी बौद्धिकों लियांग किचाओ और कई युयानपी के बुलावे पर चीन गए थे. उन्होंने शंघाई से लेकर बीजिंग तक कई भाषण दिए और चीनी दोस्तों तथा श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया. उन्होंने चीन के कवि शू झिमो और चित्रकार शू बीहोंग जैसे कई मशहूर विद्वानों से गहरे संबंध बना लिए. टैगोर चीनी विद्वान तान युनशान से 1927 में मलय में मिले और उन्हें पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में पढ़ाने के लिए आमंत्रित किया.

1937 में तान ने उनकी मदद से विश्वभारती विश्वविद्यालय में चीन भवन की स्थापना की. टैगोर-तान की वह दोस्ती भारत और चीन के लोगों के बीच आदर भाव और सहयोग की मिसाल थी. हाल में सीमा पर खूनी झड़प से दोनों देशों के रिश्तों में मनमुटाव बढ़ा तो हैरानी होती है कि भारत-चीन की वह दोस्ती क्या दोबारा कायम हो पाएगी.

गलवान घाटी में 15 जून, 2020 को बड़ी दुखद घटना घटी. 20 भारतीय जवान शहीद हुए जबकि चीन ने अपने हताहातों की संख्या घोषित नहीं की है. भारत और चीन, दोनों ही एक-दूसरे पर आक्रामक रुख अख्तियार करने और पहले के समझौतों का उल्लंघन करने का आरोप लगा रहे हैं. तथ्य तो यही है कि पिछले कुछ साल से दोनों तरफ की सेनाएं सीमा के आसपास अपनी अग्रिम चौकियों, सड़कें और दूसरे इन्फ्रास्ट्रक्चर मजबूत कर रही हैं.

उंगलियां उठाने का कोई खास मतलब नहीं है. उलझे इतिहास, सीमा के साफ-साफ बंटवारे की कमी और रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता के कारण सीमा विवाद का हल जल्दी निकलने वाला नहीं है. दोनों पक्षों को तनाव घटाने, घरेलू राष्ट्रवाद के उफान पर काबू पाने, उस त्रासद घटना की समीक्षा करने और आगे की राह तलाशने की जरूरत है. यह सुखद है कि भारी प्रतिद्वंद्विता के बावजूद दोनों का बातचीत के जरिए विवाद हल करने पर जोर है.

जापान और चीन के बीच ऐसे ही पेचीदा क्षेत्रीय विवाद से निपटने के वक्त चीन के पूर्व नेता देंग शियाओपिंग ने सुझाया था कि ऐसे मसलों को हल करने के रास्ते शायद अगली स्मार्ट पीढिय़ां निकाल लें, मौजूदा पीढ़ी तो बस मतभेदों को दूर ठेलकर सहयोग के रास्ते तलाश सकती है. देंग की उस दलील को भले न मानें, पर भारत और चीन, दोनों उनकी व्यावहारिकता से कुछ सबक ले सकते हैं.

यह भी न भूलें कि भारत और चीन, दोनों के लिए घरेलू आर्थिक वृद्धि और गरीबी दूर करना ही नीतिगत प्राथमिकता बनी हुई है. सीमा विवाद उससे ध्यान हटा देगा, जो दोनों देशों के लिए ज्यादा जरूरी है.

अटकलें बेहिसाब हैं कि चीन के पास भारत के साथ सीमा झड़प शुरू करने की वजहें हैं. ऐसी अटकलों में कुछ दम दिखता है क्योंकि चीन घरेलू और बाहरी मोर्चे पर कई तरह की चुनौतियों से रू-ब-रू है और उसके नेताओं में शायद इन समस्याओं से ध्यान हटाने की चाल चलने की चाह पैदा हो सकती है.

थोड़ी गहरी जांच-परख करने पर पता चलता है कि इसका उलटा भी उतना ही सही हो सकता है. चीन पहले ही कई मोर्चों पर लगी आग बुझाने में व्यस्त है. ऐसे में उसके नेता भारत के साथ सीमा पर टकराव शुरू करना लगभग नहीं चाहेंगे, क्योंकि यह बड़ी आसानी से बेकाबू हो सकता है.

चीन के नेता घरेलू मोर्चे पर बड़ी सावधानी से अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के जतन में लगे हैं. उनकी कोशिश यह भी है कि कोविड-19 की दूसरी लहर कहीं देश को फिर चपेट में न ले ले, जिसकी आशंका जताई जा रही है. बाहरी मोर्चे पर चीन का दशकों बाद खासकर अमेरिका की ओर से प्रतिकूल माहौल से साबका पड़ा है.

यह अलग बात है कि चीन, अमेरिका को चुनौती देने और उसकी जगह प्रभावी वैश्विक ताकत बनने की काबिलियत और ख्वाहिश रखता है या नहीं, मगर वाशिंगटन के कट्टर तत्व हर मौके पर चीनी नेताओं को उकसाने और चीनी हितों पर चोट करने पर उतारू हैं. शायद नया शीतयुद्ध शुरू हो चुका है, खासकर हांगकांग, ताइवान और दक्षिण चीन सागर में छद्म प्रतिद्वंद्विता के बहाने. हाल के वर्षों में झगड़ालू ट्रंप सरकार और प्रतिकूल अमेरिकी कांग्रेस से जूझना चीनी नेतृत्व के लिए बड़ी बाहरी चुनौती है.

यह मानने की कई वजहें हैं कि शी जिनपिंग अपने करीबी कामकाजी रिश्ते नरेंद्र मोदी के साथ बनाए रखना चाहते हैं. भारत में हाल में जनरलों से लेकर सांसदों, कैबिनेट मंत्रियों, विपक्षी नेताओं और मीडिया से लेकर बुद्धिजीवियों तक ने चीन की लानत-मलामत की है. इसके विपरीत, चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ताओं के ऊपर के किसी अधिकारी या नेता ने भारत पर सार्वजनिक रूप से आक्रामक रुख नहीं दिखाया. यही नहीं, चीन की मीडिया और लोगों ने भी सीमा झड़प पर खास तवज्जो नहीं दी.

गौरतलब कि पक्का संकल्प दिखाने के लिए मोदी की 3 जुलाई के लद्दाख दौरे को भी शायद चीन की फौज उकसावे की तरह देख सकती है मगर चीन की आधिकारिक प्रतिक्रिया नरम ही थी. बस विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने 'संबंधित पक्षों’ से आग्रह किया कि तनाव को और न बढऩे दें. सरहदी इलाके में टकराव की संभावना के मद्देनजर भारत ने रूस से मिग-29 की नई खेप और 12 एसयू-30 लड़ाकू जेट का सौदा 2.4 अरब डॉलर में किया, तब भी चीन मौन ही रहा.

फिर, अमेरिका के हर प्रतिबंध का वैसा ही जवाब देने और उसके साथ जैसा को तैसा वाला सलूक करने के विपरीत चीन ने भारत के साथ वह रुख नहीं अपनाया. भारत ने वीबो, वीचैट और टिकटॉक जैसे 59 स्मार्टफोन ऐप पर पाबंदी लगाई और चीनी कंपनियों को हाइवे परियोजनाओं में काम करने से रोक दिया तो चीन ने वैसी कोई गरमी नहीं दिखाई. जाहिर है, चीन नहीं चाहता कि भारत से तनाव बढ़े.

भारत-चीन रिश्तों में एक बड़ी चुनौती समझ के अंतर की है. भारत अपनी विदेश नीति में चीन पर खास तवज्जो देता है जबकि चीन भारत को गंभीरता से नहीं लेता. भारत की ख्वाहिश क्षेत्रीय या वैश्विक ताकत के रूप में भी चीन को पछाडऩे की है, पर चीन की नजर में तो विश्व मंच पर अमेरिका इकलौता प्रतिद्वंद्वी है. चीन के लोग भारत के पेचीदे से लोकतंत्र से प्रभावित नहीं हैं. दरअसल, चीन के कई लोग देश में लोकतंत्र की स्थापना के पश्चिमी दबाव को यह कहकर खारिज कर देते हैं कि चीन ने पिछले कुछ दशकों में लोगों को गरीबी से उबारने में लोकतांत्रिक भारत से बेहतर काम किया है.

कई चीनी पर्यटक अपने सतही निरीक्षण के आधार पर भारत के पिछड़ेपन, अव्यवस्था और अक्षमता पर नाक-भौं सिकोड़ते हैं. उन्हें भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ें, सक्रिय सिविल सोसाइटी और उद्यमी भावना नहीं लुभाती. इसलिए दोनों तरफ के लोगों में तर्कसंगत नजरिए के लिए उनके बीच अधिक आवाजाही की ज्यादा जरूरत है.

भारत और चीन को तीसरे पक्ष के दखल से सचेत रहना चाहिए, जो उनके बीच दुश्मनी बढ़ा सकता है. मसलन, भारत के कब्जे वाले कश्मीर में कुछ लोग चीन को आक्रामक रुख के लिए उकसा रहे हैं और पश्चिम के कुछ छुपेरुस्तम भारत को अधिक झगड़ालू रुख अख्तियार करने के लिए हवा भर रहे हैं.

सीएनएन की 18 जून की रिपोर्ट में कहा गया कि ‘हिमालय में बड़े पैमाने पर टकराव की हालत में अमेरिकी खुफिया और निगरानी तंत्र लड़ाई के मोर्चे की साफ तस्वीर देकर भारत की मदद कर सकता है.’ रिपोर्ट में दावा किया गया है, 'पारंपरिकमान्यता यही है कि भारत के खिलाफ चीन की सैन्य ताकत काफी ज्यादा है, लेकिन हाल के अध्ययनों...से पता चला है कि भारत ऊंचे पर्वतों के माहौल में बढ़त रखता है, जहां 2020 में तनाव जारी है.’ यह अजीबोगरीब है कि झड़प के तीन दिन बाद ऐसी रिपोर्ट क्यों बाहर आई.

मोदी ने तो कहा, ‘‘कोई हमारी सीमा में नहीं घुसा, न ही अब वहां कोई है, न हमारी किसी चौकी पर कब्जा हुआ है.’’ लेकिन अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पॉक्विपयो ने चीन को 'दबंग’ बताया जो भारत के साथ तनाव बढ़ा रहा है. अमेरिकी विदेश राज्यमंत्री डेविड स्टिलवेल ने तो सीमा झड़प को चीन की घुसपैठ और उसकी आक्रामक रणनीति का हिस्सा बताया. पॉक्विपयो ने ऐलान किया कि अमेरिका सीमा पर चीन की गतिविधियों की खुफिया जानकारी भी भारत को मुहैया करेगा.

वाशिंगटन में बैठे बाज अमन नहीं चाहते. उन्होंने चीन के खिलाफ अमेरिकी अगुआई में मोर्चा बनाने का नजरिया पेश किया जिसका भारत हिस्सा हो. हालांकि भारत ने लंबे वक्त से गुटनिरपेक्ष नीति बना रखी है. भारत-चीन के रिश्तों की जड़ें गहरी हैं और उन्हें तीसरे पक्ष से मुन्न्त रखना चाहिए. भारत के लिए यही व्यावहारिक है कि वह चीन के खिलाफ ट्रंप सरकार के नए शीतयुद्ध में शामिल न हो.

कथित ‘एशियाई सदी’ संभव नहीं हो पाएगी, अगर भारत और चीन मिलकर काम नहीं करते. दोनों देशों ने 2020 में कूटनयिक रिश्तों की 70वीं सालगिरह के मौके पर कई आयोजनों की योजना बनाई थी. कोविड-19 और सीमा झड़प की वजह से आयोजनों का तो कोई सवाल नहीं है. उम्मीद यही है कि जब दोनों तरफ तेवर ठंडे हों तो चीन और भारत टैगोर की सीख से सबक लेंगे और मिलकर समृद्ध तथा शांतिपूर्ण एशिया के निर्माण की खातिर बेहतर रिश्तों पर फोकस करेंगे.

झिकुन झू, पीएचडी, अमेरिका के पेनसिल्वेनिया में बकनेल यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के प्रोफेसर हैं.

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