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मेहमान का पन्नाः रसूख की राजनीति

लेखिका नारीवादी ऐक्टिविस्ट और बेबाक कलेक्टिव की संस्थापक सदस्य हैं.

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हसीना खान हसीना खान

कर्नाटक के स्कूलों ने हिजाब पहनकर लड़कियों के अपने परिसरों में घुसने पर पाबंदी लगाने का जो अचानक फैसला लिया, उससे मुसलमानों के प्रति साजिश की बू आ रही है. लैंगिक सक्तीकरण के नाम पर वे ऐसा अफसाना गढ़ना चाहते हैं कि सारी गलतियां मुस्लिम समुदाय की हैं, अन्य सारे समुदाय अच्छे-भले हैं. वे दिखाना चाहते हैं कि स्कूलों में अनुशासन होना चाहिए, उनमें यूनिफॉर्म होनी चाहिए.

मुझे नहीं लगता कि स्कूलों में यूनिफॉर्म होनी चाहिए और हरेक छात्र या छात्रा को, फिर उसका धर्म चाहे जो हो, इसका पालन करना चाहिए. मगर अभी तक स्कूल प्रबंधन उन छात्रों के मामले में क्या कर रहा था जो अपनी धार्मिक पहचान धारण करके स्कूल आ रहे थे? उन्हें अचानक कैसे रोका जा सकता है? क्या कोई अनुशासन की कार्रवाई की गई? क्या स्कूलों ने कोई परिपत्र भेजा? जितना अचानक यह फैसला लिया गया, उससे यह सियासी साजिश मालूम देती है. फिलहाल चार राज्यों में चुनाव हो रहे हैं, जिनमें बेहद अहम राज्य उत्तर प्रदेश भी है.

मैं नारीवादी ऐक्टिविस्ट हूं. मैं जानती हूं कि औरत की देह ही वह जगह है जहां पितृसत्तात्मक ढांचे सहमति लिए बिना धर्म की राजनीति का खेल खेलते हैं. यह सभी धर्मों के बारे में सच है. जहां तक मुसलमानों की बात है, अनुच्छेद 25 के मुताबिक, हरेक को अपने धर्म के आचरण का अधिकार है और बुर्का आस्था की उस अभिव्यक्ति का हिस्सा है. सवाल यह है—क्या औरतों को वे कपड़े या रंग पहनने का अधिकार है जो वे पहनना चाहती हैं? उन्हें नहीं है. 

यहीं 'प्रभाव’ की बात आती है. मुस्लिम औरतें अपनी धार्मिक पहचान से प्रभावित हैं. 1992 में बाबरी मस्जिद ढहाए जाने के बाद देश भर में दंगे हुए. मैं मुंबई में हुए दंगों की गवाह थी. मुसलमान सांप्रदायिक दंगों, सामाजिक और आर्थिक विस्थापन के शिकार हुए और हमारे वजूद के लिए ही खतरा पैदा हो गया. इस पर समुदाय के भीतर काफी चर्चाएं हुईं. कई सवालों में यह भी था कि क्या अल्पसंख्यक होने की वजह से हमें निशाना बनाया जा रहा था.

इससे उबरने के लिए तय किया गया कि हम अपने जनबल का प्रदर्शन करेंगे. टोपी, दाढ़ी और बुर्का संख्यात्मक ताकत दिखाने का जरिया बन गए.
यह कट्टरपंथी संगठनों की ओर से थोपा जा रहा कट्टरतावाद था, जिसका एजेंडा औरतों के कपड़ों और विचारों को नियंत्रित करना था. हालांकि यही वे संगठन थे, जो दंगा पीड़ितों की मदद भी कर रहे थे. सहायता का यह हाथ हावी हो गया.

इसी ताकत ने यह तय करने में बड़ी भूमिका अदा की कि मजहब किस तरह लागू किया जाना चाहिए और औरतों को किस तरह गरिमा का प्रतीक होना पड़ेगा. समुदाय ने इन फरमानों को कमोबेश स्वीकार कर लिया, क्योंकि ये उनकी सामाजिक सुरक्षा से जुड़े थे. इस राजनीति के खिलाफ मैं 35 साल से लड़ रही हूं. 

मैं ऐसी पृष्ठभूमि से हूं जहां परिवार में कोई बुर्का नहीं पहनता. किसी ने उर्दू माध्यम के स्कूलों में भी बुर्का नहीं पहना. मगर 1992 के बाद मैंने अचानक बदलाव देखा. औरतें, जिनमें चार या पांच साल की बच्चियां भी थीं, बुर्का पहनने लगीं. आज अगर आप इसके खिलाफ बोलें तो आपको बहिष्कार का सामना करना पड़ेगा और शायद खुद अपने परिवार के हाथों भुगतना पड़ेगा.

मैं बुर्का नहीं पहनना चाहती, मेरी देह मेरी देह है, कोई भी मेरी मर्जी के बगैर इस पर कुछ भी थोप नहीं सकता या धार्मिक/राजनैतिक कारणों से इसका इस्तेमाल नहीं कर सकता. लेकिन मैं शहरी महानगर मुंबई में थी. मगर आज आप किसी युवा लड़की से कहें कि बुर्का मत पहनो, तो उसकी क्या राय होगी? उसकी मां, उसकी दादी, पास-पड़ोस में हर कोई पहन रही है. फिर यह पसंद का सवाल नहीं रह जाता, बल्कि प्रभाव का मामला हो जाता है. मैं नहीं समझती कि इसे इतनी आसानी से उलटा जा सकता है.

हम वापस कर्नाटक सरकार के फैसले पर आते हैं. मुद्दा क्या है? अगर आप एक तबके से कह रहे हैं कि बुर्का मत पहनो, तो आपको हरेक से कहना होगा कि घूंघट, बिंदी, मंगलसूत्र मत पहनो. अगर आप एकरूपता लाना चाहते हैं, तो हर जगह लाएं, लैंगिक सशक्तीकरण बहाना भर है. हम हिंदू राष्ट्र की तरफ बढ़ रहे हैं, जहां लोकतंत्र चुनावों तक सीमित है. लड़कियों को पढ़ने देना चाहिए, बातचीत में शामिल होने देना चाहिए, जगह दी जानी चाहिए. अगर आप उन पर पाबंदियां लगाएंगे, तो वे अवज्ञा से जवाब देंगी.

हम बुर्के के खिलाफ हैं, लेकिन लड़कियों को इसे हटाने के लिए मजबूर करना बेहद, बेहद गलत है. समुदाय पहले ही सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर है और औरतें भारी मुश्किलों से पार पाकर पढ़ने के लिए, पहचान बनाने के लिए घरों से बाहर आ रही हैं. अब सरकार डर को बढ़ावा देकर क्या उन्हें घर के भीतर जाने को मजबूर करना चाहती है? यह लैंगिक सशक्तीकरण किसके लिए है? बुर्के के आधार पर औरतों को शिक्षा से वंचित करना मुझे लगता है कि बहुत खतरनाक है.ठ्ठ

लैंगिक सशक्तीकरण के लिए बुर्के पर प्रतिबंध लगाना तो बहाना भर है. हम हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ रहे हैं, जहां लोकतंत्र महज चुनाव तक सीमित है.

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