scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

मेहमान का पन्नाः सियासत की सफाई का जनादेश

राजनीति पर वर्चस्ववादी राजनेताओं से मतदाता थक और ऊब गए थे. और उनके मन में यह धारणा गहरा गई थी कि ये सब आपस में मिले हुए हैं

X
राजनीति पर वर्चस्ववादी राजनीति पर वर्चस्ववादी

विपिन पब्बी

दीवार की इबारत साफ संकेत दे रही थी कि पंजाब का मिजाज बदलाव का है. और यह बदलाव महज नए खिलाड़ी आम आदमी पार्टी के जरिए ही लाया जा सकता था. क्योंकि साफ दिख रहा था कि पिछले पांच दशकों से सूबे में शासन कर चुकीं और आजमाई जा चुकी पार्टियां परिवर्तन के माकूल नहीं हैं.

लेकिन पुराने दिग्गजों को बुहारकर साफ करते हुए इस तरह की प्रचंड जीत का अनुमान बेहद कम लोगों ने ही लगाया था. इसने न सिर्फ कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल को रोक दिया, बल्कि सभी दिग्गज योद्धाओं को पराजित किया, जिनमें पूर्व मुख्यमंत्रियों प्रकाश सिंह बादल, सुखबीर सिंह बादल, पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू, कैप्टन अमरिंदर सिंह, चरणजीत सिंह चन्नी और इसके साथ मंत्रियों का पूरा समूह शामिल है.

आम आदमी पार्टी के ज्यादातर उम्मीदवार पहली बार चुनाव लड़ रहे थे. यहां तक कि दिग्गज पत्रकारों और राजनैतिक विश्लेषकों ने भी अधिकांश उम्मीदवारों के नाम कभी नहीं सुने थे. यह स्पष्ट है कि लोगों ने पार्टी को वोट दिया, उम्मीदवारों को नहीं.

राजनीति पर वर्चस्वशाली राजनेताओं से मतदाता थक और ऊब गए थे और उनके मन में यह मजबूत धारणा घर कर गई थी कि वे सब एक-दूसरे के साथ मिले हुए हैं. ऐसी धारणा बन गई कि यह नेता एक-दूसरे को बचा रहे हैं और एक-दूसरे के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर रहे थे.

किसान आंदोलन पर भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन तोडऩे के बावजूद शिरोमणि अकाली दल का ग्रामीण इलाकों में जनाधार छीज गया. इसके पास शहरी इलाकों में जनाधार की बढ़त थी लेकिन भाजपा की वजह से वह भी खत्म हो गया. दूसरी तरफ, पिछले छह महीने से कांग्रेस में जारी सार्वजनिक सिरफुटौव्वल से उसकी साख खत्म हो गई. अप्रत्याशित किस्म के नवजोत सिंह सिद्धू को लाने और कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाने का फैसला करके कांग्रेस ने अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने भाजपा से हाथ मिला लिए और उनका एकमात्र मकसद कांग्रेस को तबाह करना था.

कांग्रेस को जितना सभी विपक्षी पार्टियों ने मिलकर नुक्सान पहुंचाया होगा उससे अधिक सिद्धू ने पहुंचा दिया, क्योंकि पहले तो उन्होंने कैप्टन अमरिंदर सिंह नीत कांग्रेस सरकार की खुलेआम आलोचना की और फिर चरणजीत सिंह चन्नी सरकार की आलोचना को उन्होंने अपनी दिनचर्या में शामिल कर लिया था.

सिद्धू न सिर्फ खुद को भावी मुख्यमंत्री घोषित किया बल्कि उन्होंने पंजाब के लिए सिद्धू मॉडल का ऐलान भी किया और इसके साथ ही उन्होंने कई किस्म की घोषणाएं कीं. इन हरकतों से इस पुरातन पार्टी से लोगों का मन विरक्त हो गया.

हालांकि, कांग्रेस और अकाली अपनी साख खो बैठे थे और भाजपा का शहरों में सीमित आधार था, इस खालीपन को आप ने बहुत जल्दी से भर दिया और उसके आते ही सियासी मैदान में हवा का ताजा झोंका-सा आया. लोग आप के दिल्ली मॉडल की बात करने लगे कि किस तरह सरकार ने मोहल्ला क्लिनिक खोलकर मुफ्त स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराई हैं, बिजली और पानी पर सब्सिडी दी है और सरकारी स्कूलों में बदलाव के साथ ही सार्वजनिक सेवाओं को घर पर ही उपलब्ध कराया जा रहा है.

लेकिन इस इलाके के बाहर के लोगों को यह सवाल परेशान कर सकता है कि आप पंजाब में क्यों झाड़ू लगाने में सफल रही और भाजपा क्यों नहीं, जो अन्य चार राज्यों में विधानसभा चुनावों में जीत हासिल करने में सफल रही है. इसका स्पष्ट कारण यही है कि अकालियों के साथ भाजपा के गठबंधन ने इसके विकास को बेहद सीमित कर दिया था. 117 में से 23 निर्वाचन क्षेत्रों का इसका कोटा पिछले 30 वर्षों से जरा भी नहीं बदला है. और अकालियों से अलग होने के बाद उसके पास अन्य चुनाव क्षेत्रों में अपने कैडर तैयार करने के लिए बहुत कम समय था.

हालांकि, यह उम्मीद की जा रही है कि राज्य में अगले विधानसभा चुनावों में भाजपा एक प्रमुख दावेदार होगी और यह ठीक वैसे ही होगा जैसे उसने पश्चिम बंगाल में 2016 के विधानसभा चुनावों में परिदृश्य का जायजा लिया था और पिछले साल विधानसभा चुनाव में प्रमुख चुनौती के रूप में उभरी थी.  

विपिन पब्बी वरिष्ठ पत्रकार हैं

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें