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'उम्मीद जगाता है, पद्ममावत पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला'

अभिव्यक्ति के हरेक माध्यम को सत्ता, प्रमाणित करने वाले बोर्ड या सार्वजनिक आक्रोश की कैंची का सामना करना पड़ा है

पदमावत एक अहम सवाल खड़ा करती है पदमावत एक अहम सवाल खड़ा करती है

पद्मावत के मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला हर उस भारतीय नागरिक के भरोसे को बहाल करता है जो कविता, निबंध, कहानी सरीखे लिखित माध्यमों से या पेंटिंग, डॉक्यूमेंटरी और सिनेमा सरीखे दृश्य माध्यमों से अपने विचारों और भावनाओं का इजहार करना चाहता है. अभिव्यक्ति के हरेक माध्यम को सत्ता, प्रमाणित करने वाले बोर्ड या सार्वजनिक आक्रोश की कैंची का सामना करना पड़ा है, खासकर तब जब वह किसी विश्वास, आस्था, अवधारणा या मान्यता के हिसाब से नहीं चलता.

सिनेमा ने खास तौर पर हाल के दिनों में संजीदा चुनौतियों का सामना किया है, जिनमें पद्मावत सबसे ताजातरीन मिसाल है. भारतीय केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) अपनी शक्ति सिनेमैटोग्राफी अधिनियम 1952 से प्राप्त करता है, जिसके तहत उसे किसी फिल्म को प्रदर्शन का प्रमाणपत्र देने या नहीं देने का अधिकार हासिल है.

पद्मावत एक अहम सवाल खड़ा करती हैः क्या किसी रचनात्मक व्यक्ति को समाज के व्यापक भलाई की खातिर किसी मूल कृति से प्रेरणा लेने या उसके कुछ दृष्टांतों को रूपांतरित करने का अधिकार है या नहीं? जवाब की खोज में मुझे फौरन वाल्मीकि का महाकाव्य रामायण याद आता है. ज्यादातर हिंदुस्तानियों के लिए यह ऐतिहासिक दस्तावेज है और कई इसे महागाथा मानते हैं.

गोस्वामी तुलसीदास ने रामायण से और भगवान राम के चरित्र पर आधारित दूसरी कृतियों से प्रेरणा ली और एक और महाकाव्य रामचरित मानस की रचना की. तुलसीदास की रामचरित मानस में वाल्मीकि की मूल रामायण के कई दृष्टांतों और घटनाओं को अलहदा ढंग से प्रस्तुत किया गया है और यहां तक कि मूल रामायण के कई प्रसंग को रामचरित मानस में नहीं लिया गया है.

गोस्वामी तुलसीदास को भी अपने वक्त में सवालों, उत्पीडऩ और विरोध का सामना करना पड़ा था और अपने वक्त के वेदांत के महान अध्येता मधुसूदन सरस्वती की स्वीकृति लेनी पड़ी थी. आज रामायण के कई क्षेत्रीय संस्करण पाठकों के लिए मौजूद हैं.

महान नाट्यलेखक भास ने दोनों महाकाव्यों—रामायण और महाभारत—से प्रेरणा और कथ्य लिए और उन्हें अपनी रचनात्मक मेधा में ढालकर प्रतिमानाटकम, बालचरितम, कर्णभारम, दूतवाक्यम सरीखे क्लासिक की रचना की.

उरुभागम में, जिसका अर्थ टूटी जंघाएं" है, भास ने महाभारत के खलनायक दुर्योधन को नायक बना दिया. इस महान नाटककार को अपनी रचनात्मक छूट का भरपूर इस्तेमाल करने दिया गया और अपने वक्त में उन्हें अभिव्यक्ति की पूरी आजादी हासिल थी. आज महाभारत के आख्यान के भी अनेक क्षेत्रीय रूपांतर मौजूद हैं. महाकवि सूरदास ने अपनी विलक्षण कल्पना शक्ति से अपने काव्य में भगवान कृष्ण के रहस्यमयी चरित्र को नए सिरे से गढ़ा है.

महाकवि और नाट्यलेखक कालिदास ने अतीत की कृतियों से सामग्री लेकर मालविका अग्निमित्रम की रचना की और उसमें शुंग काल की अनेक ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया है, लेकिन इतिहास का कोई भी संजीदा अध्येता इस नाटक को ऐतिहासिक नाटक नहीं कहेगा.

भारतीय परंपराओं में साहित्य को भी इतिहास माना जाता था. कहने की जरूरत नहीं कि इतिहास केवल तारीखों और घटनाओं का ब्योरा नहीं है. यह घटनाओं की व्याख्या भी करता है और इसलिए वस्तुपरक भी हो सकता है. यही वजह है कि हमें अक्सर अलग-अलग ऐतिहासिक आख्यान मिलते हैं.

हिंदुस्तान में महान अध्येताओं और सर्जकों की पहले की रचनाओं के ''भाष्य" या टीका लिखने की लगातार और अटूट परंपरा रही है, जिसमें मूल पाठ के अन्वेषण और व्याख्या का कार्य निरंतर किया जाता रहा है.

जब मैं संविधान द्वारा गारंटी की गई अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी की जांच-पड़ताल करता हूं, तब सिनेमा की मौजूदा घटनाएं हैरान करने वाली मालूम देती हैं. मेरे तईं हम उस सभ्यता से आते हैं जिसमें उन लोगों की अभिव्यक्ति की आजादी, विचारों और दर्शन का हमेशा सम्मान किया गया है जिन्होंने पवित्र वेदों तक की आलोचना और विरोध किया था.

बुद्ध, महावीर, निग्रंथों और चार्वाक सरीखे कई असहमत दार्शनिकों को वेदों के उनके विरोध के बावजूद भारतीय सरजमीन पर स्वीकार किया गया.

जब भी कोई फिल्मकार हिंदुस्तान, अश्लीलता, हिंसा, मूल्यों और आधुनिक हिंदुस्तान को लेकर कई बहसतलब मुद्दों के बारे में नए विचारों के साथ प्रयोग करता है और हमारी पूर्वधारणाओं को चुनौती देता है, तो हम नए विचारों को खारिज करने और उस फिल्मकार के साथ संवाद शुरू करने के लिए हिंदुस्तान की प्राचीन संस्कृति के शरण में चले जाते हैं और इस तरह नए विचारों से उनके फलने-फूलने का मौका छीन लेते हैं.

फिल्म पद्मावत के मामले की सुनवाई करते हुए भारत के प्रधान न्यायाधीश ने कहा, ''अगर आप इस 60 फीसदी साहित्य के हिसाब से चलें, तो हिंदुस्तान का क्लासिक साहित्य भी पढ़ा नहीं जा सकता." सुप्रीम कोर्ट का फैसला हिंदुस्तान के फिल्मकारों के लिए भारी राहत की तरह आया है.

ऐसे उथल-पुथल भरे वन्न्त में महाभारत ही हमें दिलासा देता है, जो वन पर्व में कहता हैः ''एक विषय की श्रुतियां अलहदा होती हैं, स्मृतियां अलहदा होती हैं. तर्क का कोई अंत नहीं है. एक भी ऋषि या दार्शनिक नहीं है जिसके विचारों को अंतिम सत्य के तौर पर स्वीकार किया जा सके. सही आचरण का सार सचमुच बेहद गूढ़ और गोपनीय है. इसलिए अकेला रास्ता यही है कि महान शख्सियतों के नक्शेकदम पर चलें."

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