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नया सिनेमा: मुंबई से बिहार तक

स्क्रीन पर नए किस्म का कड़वी हकीकत बयान करता सिनेमा गांव-शहर के फासले को खत्म करता नजर आ रहा.

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उस दिन फिल्म और टीवी इंस्टीट्यूट में मैंने खुद को वह तमाम चीजें करते पाया, जो मैं आम तौर पर इस तरह की जगहों पर करता आया हूं: उन नई फिल्मों का पता लगाना जिन्हें छात्रों ने हाल ही में कहीं से 'डाउनलोड' किया है या फिर कॉपी किया है. जाहिर है, बदले में जो भी फिल्में मेरे पास होंगी, वह मैं उन्हें दूंगा.

इस बार मेरे कलेक्शन में लगभग 40 जीबी की जापानी फिल्में आ गईं, जिनमें सर्वाधिक विवादित जापानी फिल्मकार सियॉन सोनो की सुसाइड सर्कल सीरीज थी. बदले में मैंने चीन की छठी पीढ़ी के फिल्मकार वांग जियाओशुआई की महत्वपूर्ण फिल्में दीं, जिनमें उनकी हाल ही में बहुचर्चित फिल्म फ्रोज़न और सो क्लोज टू पैराडाइज (जिसे गर्ल फ्रॉम वियतनाम नाम से भी जाना जाता है) भी थी.

भारत में वांग का आधिकारिक रूप से प्रवेश पिछले साल नवंबर में कोलकाता इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल से हुआ था, जिसमें उनकी फिल्म इलेवन फ्लावर्स को एनईटीपीएसी अवॉर्ड से नवाजा गया. हालांकि वांग इससे काफी पहले से युवा फिल्म निर्माताओं और सिनेमा प्रेमियों में 2001 की क्लासिक फिल्म बीजिंग बाइसिकल के कारण खासी पहचान बना चुके थे.

इसके पहले हाइ डिस्क सर्किट की क्लासिक मानी जाने वाली अपनी फिल्मों के कारण किम की-दुक और जिया झांग्के भी आधिकारिक रूप से भारत में कदम रखने से काफी पहले ही यहां ख्यात हो चुके थे. यह ख्याति फिल्म पाठ्यक्रमों से जुड़े छात्रों के उत्साह और अपने लिए नए उस्ताद खोजने की ललक का ही नतीजा थी.

उन्होंने न सिर्फ इन्हें खोजा बल्कि आपस में साझ भी किया. कई मौकों पर सिनेमा प्रेमियों ने वांग जियाओशुआई की फिल्मों को औपचारिक तौर पर सहेजा, जमकर साझा किया और ऑनलाइन मीडिया पर अपनी खूब प्रतिक्रियाएं दीं. इसके चलते इन फिल्मों की पहुंच बढ़ी और इन्हें फिल्म उत्सवों में जाने और दिखाए जाने का मौका हासिल हुआ.

पिछले साल, दिल्ली में नए रंग-रूप में आयोजित हुए ओसियान फिल्म फेस्टिवल में एक बेबाक प्रोग्रामिंग कवायद को अंजाम दिया गया. फिल्म विशेषज्ञ कौशिक भौमिक ने जापानी 'पिंक फिल्म के सिंहावलोकन के साथ-साथ अनुराग कश्यप (गैंग्स ऑफ वासेपुर, दो भाग) और रितुपर्णो घोष की चित्रांगदा और फिर उसके बाद पसोलीनी की चोखी फिल्में (मसलन: सालो: 120 डेज़ ऑफ सोडोम) दिखाईं. यह सब कुछ फिल्म इतिहास पर बात करने के लिए. और मेरे ख्याल से फिल्म प्रोग्रामिंग के संदर्भ में यह वाकई नया प्रयोग था.

ओसियान बात को और आगे बढ़ाने के लिए फिल्ममेकर क्यू (उनकी विवादास्पद फिल्म गांडू की भारत में रिलीज की उम्मीद अभी दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है लेकिन यह फिल्म एक अनौपचारिक सर्किट तो तैयार कर ही रही है) को लेकर आया और उनके बैंड गांडू-सर्कस को दिल्ली के ब्लू फ्रॉग में आमंत्रित किया. समारोह का समापन उसके प्रेरक और फिल्म कला के अग्रणी उस्ताद मणि कौल के काम पर सिंहावलोकन के साथ किया गया.cinema

इस बात को हर कोई बखूबी जानता है कि भारतीय सिनेमा की लगभग सभी भाषाओं में एक नई ऊर्जा देखने को मिल रही है. आंखें खोल देने वाली नई बात वह ग्लोबल संदर्भ है, जिसको ध्यान में रखकर हमारी फिल्मों को बहुत ही सोच-समझकर बुना जा रहा है. और इसके साथ ही, एक नया इको-सिस्टम विकसित हो रहा है.

यह तर्कसंगत है कि अब फिल्म दिखाने के नए ठिकाने तैयार हो रहे हैं, जिनमें आर्ट गैलरी से लेकर कैफे जैसे अनगिनत अनौपचारिक ठिकाने शामिल हैं, इन्हें मैं क्यूरेशन, परफॉर्मेंस और एग्जिबिशन के नए सर्किट कहता. यह कई जीवंत विधाओं/कलाओं और इंस्टालेशन वगैरह को एक साथ लाती है ताकि चलती-फिरती छवियों को देखने के अनुभव को एक नई परिभाषा मिले.

दशक भर पहले तक इसकी कल्पना भी नहीं का जा सकती थी जब मणि कौल जैसे शख्स सत्ता की उदासीनता,  नितांत कम बजट और लगभग असंभव डिस्ट्रीब्यूशन के साथ जूझ रहे थे. आज कौल के छात्र गुरविंदर सिंह ने उन्हें अपनी पहली और अनोखी फिल्म अन्हे घोड़े दा दान समर्पित की है, यह पंजाबी फिल्म है जिसमें बठिंडा के पास के एक गांव के चौबीस घंटे का जिंदगीनामा है. यह फिल्म नेशनल फिल्म डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन (एनएफडीसी) ने बनाई है और इसे गैर-प्रोफेशनल पेशेवर अभिनेताओं के लिए जाना जाएगा.

कोई भी बन सकता है फिल्मों का दीवाना
अधिकतर लोगों के लिए नए सिनेमा का जाना-पहचाना चेहरा फिल्मकार और प्रोड्यूसर अनुराग कश्यप हैं. अनुराग बांग्ला में क्यू की फिल्म ताशेर देश, मराठी फिल्मकार सचिन कुंडलकर की अय्या और बेदब्रत पाइन की चटगांव को भी प्रोड्यूस कर चुके हैं. वे कौल की अगली फिल्म भी प्रोड्यूस करते लेकिन कौल के निधन की वजह से ऐसा नहीं हो सका. इसलिए अब वे कौल पर एक डाक्युमेंटरी प्रोड्यूस कर रहे हैं. कई लोगों को अनुराग का इस नए स्पेस का इस्तेमाल अवसरवाद लग सकता है.cinema

हालांकि मदद के लिए उनका लोगों (मसलन विक्रमादित्य मोटवाणी) और विभिन्न भाषाओं और संदर्भों की फिल्मों का चयन यह बताता है कि कैसे पुरानी शैली के फिल्म प्रोडक्शन को नए ढंग के क्यूरेशन से जोड़ा जा सकता है. सुधीर मिश्र, कुंदन शाह, जाह्नू बरुआ और रितुपर्णो घोष जैसे निर्देशकों की, ग्यारह छोटी-छोटी कहानियों वाली अनुराग की फिल्म मुंबई कटिंग बिल्कुल उसी तरह है जैसे किसी फिल्म स्टुडेंट की हार्ड डिस्क. तमाम तरह की फिल्मों को दोस्तों और ऑनलाइन अनजान सिनेमा प्रेमियों के साथ साझा करना और कई बार इसे फिल्म निर्माण की प्रैक्टिस में तब्दील करना शामिल रहता है.

हमारे लिए दोनों ही शैलियां जमी-जमाई हैं और पीछे मुड़कर हम यह अंदाज लगा सकते हैं कि अब किस तरह की फिल्में और फिल्मी इतिहास बन सकता है. एकदम साफ रुझान देखने को मिल रहा है—पहला, फिल्में देखी और जुटाकर रखी जाती हैं. ऐसा नहीं लगता कि भारतीय सिनेमा को अगले सौ साल के लिए आर्काइव की जरूरत है. फिल्म के किसी भी छात्र की 1 टीबी की डिस्क यह काम बखूबी कर सकती है.

इस सब से जिस तरह के फिल्म निर्माण की कला सामने आ रही है उसे परिभाषित करना थोड़ा मुश्किल काम है, लेकिन इस बात को समझने के पर्याप्त संकेत हैं कि क्या चल रहा है. यहां कुछ सुझाव पेश किए जा रहे हैं. कड़वी हकीकत पर जोर वाकई चलन में है: आज के दौर की ढेर सारी फिल्मों में वासेपुर ने इसकी शुरुआत की है. इससे पहले के दौर में 1980 और 90 के दशक के मुंबई के गैंगस्टरों की फिल्में ही बना करती थीं.new wave cinema

कह सकते हैं कि यह वास्तविकता का मार्क-टू है. इसने आजादी के बाद की तमाम सिनेमाई यथार्थवाद को बदल डाला है. मसलन यही देखिए न कि इसने गांव और शहर के फर्क के रूप में दिखाए जाने वाले दूसरे यथार्थवाद के फर्क को पाट दिया है. कश्यप की वासेपुर इन दोनों के बीच में है, एक ऐसी जगह जो कभी मुंबई और बिहार के बीचोबीच हुआ करती थी.

इस तरह का यथार्थवाद पूरी तरह से नए साउंडस्केप पर निर्भर करता है: एक स्तर पर सिंक साउंड नजर आता है, लेकिन दूसरे पर साउंड का इस्तेमाल इस तरह होता है कि उसे आज स्नेहा खानविलकर की साउंडट्रिपिंग में पा सकते हैं. इसे लोकेशन साउंड और उससे थोड़ी छेड़छाड़ के साथ तैयार किया जाता है. यानी खास तरह का संगीत जिसे मौके के हिसाब से पिरोया जाता है.

पहले हमने ऐसा कभी नहीं देखा?
आप आज की फिल्म निर्माण की शैली को तब तक नहीं समझा सकते, जब तक गुजरे जमाने की शैली को न समझेंगें: फिल्म की सारी जबानें घनी हो रही हैं. यानी बातचीत का ऐसा गहन मुहावरा जिसे आसानी से परिभाषित नहीं कर सकते. सबसे पहले एक शब्दकोश लेकर बैठना होगा, जिससे आप एक शताब्दी पुरानी फिल्मों के तौर-तरीके जान सकें. फिर यह रीमेक का जमाना है: साहब, बीबी और गैंगस्टर का दौर, बॉलीवुड का वह दौर जिसे समझना भी सहज नहीं है. मसलन—ओम शांति ओम, बशर्ते आप सत्तर के दशक की फिल्मों को जानते हों. मेरे लिए सबसे दिलचस्प सिनेमा को नए रूप-रंग में पेश करना है. मेरा सबसे ताजा अनुभव है सृजित मुखर्जी की 2010 की बंगाली फिल्म ऑटोग्राफ. इसमें अभिनेता प्रसेनजित सुपरस्टार की भूमिका में हैं, जो सत्यजीत रे की फिक्शनल रीमेक नायक में काम कर रहे हैं और अभिनेता उत्तम कुमार का रोल कर रहे हैं.

फिल्म ही नहीं, बहुत कुछ
कड़वे यथार्थ पर आधारित फिल्मों में एक तीसरा रुझान चरित्रों की बनावट है. मुझे लगता है कि आदान-प्रदान वाला सिनेमा आगे बढ़ रहा है और परस्पर संवाद के रूप में तब्दील होने की कोशिश कर रहा है. इस तरह हमारे पास चरित्रों की लंबी कतार है और एक चरित्र से दूसरे पर जाने की आजादी. इस तरह सिनेमा बढ़ रहा है. सबसे दिलचस्प यही रुझान है क्योंकि हमें लगता है कि अपनी कहानी कहना बेहद जरूरी है. लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था इसे व्यावसायिक दृष्टि से बढ़ावा नहीं देती: सोनी प्ले स्टेशन-3 के लिए बने रा.वन  गेम की असफलता इसी की मिसाल है.

जरूरत तो इस बात की है कि रजनीकांत की फिल्म रोबो या शाहरुख खान की सुपर हीरो होने की आकांक्षाएं जो सिनेमा से भी आगे जाती हैं— यानी सिनेमा के दर्शक को शीशे के उस पिंजरे में ले जाती हैं, जिसमें हीरो फंसे हैं. इसलिए ऐसी पहल कीजिए जो इन सितारों से भी बड़ी हो. यह एक कोशिश है, जो भारतीय सिनेमा को ऐसे दौर में ले जा रही है, जिसके लिए न तो बाजार तैयार है और न ही टेक्नीक.

यह सब उस भारतीय सिनेमा के लिए नया नहीं है, जो हमेशा बिना किसी मार्केट सपोर्ट के अपना काम करता आया है...अंतर सिर्फ यही है कि दर्शक नई हार्ड डिस्क के जरिए सिनेमा से ज्यादा जुड़ रहे हैं.

लेखक सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ कल्चर ऐंड सोसायटी में सीनियर फैलो हैं और एनसाइक्लोपीडिया ऑफ इंडियन सिनेमा के लेखक हैं.

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