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म्यांमार: तलवार की धार

अब जब अमेरिका ने खुद अपने लगभग दक्षिणपंथी 'तख्तापलट’ का स्वाद चख लिया है, यह तार्किक ही है कि राष्ट्रपति जो बाइडन लोकतंत्र को अपनी विदेश नीति का एक बड़ा आधार बनाने की जद्दोजहद कर रहे हैं.

गौतम मुखोपाध्याय गौतम मुखोपाध्याय

गौतम मुखोपाध्याय

एक चुनावी विवाद को लेकर म्यांमार में 1 फरवरी को जो सैन्य तख्तापलट हुआ, वह देश के लोगों की इच्छा के विरुद्ध एक और मर्मांतक हस्तक्षेप है. इस सैन्य कार्रवाई के खिलाफ पूरे म्यांमार में शांतिपूर्ण प्रदर्शन और नागरिक अवज्ञा आंदोलन फूट पड़े हैं. यह कार्रवाई ठीक उस दिन की गई जब नवंबर 2020 के राष्ट्रीय चुनाव में डॉ. आंग सान सू की (अब हिरासत में) की अगुआई वाली सत्ताधारी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) की तीसरी बड़ी जीत (पहली दो 1990 और 2015 में) के बाद नई संसद की पहली बैठक होने वाली थी.  

सीनियर जनरल मिन ऑन्ग लाइंग ने 8 फरवरी को वादा किया कि एक साल के आपातकाल के दौरान नए चुनाव आयोग के हाथों चुनाव नतीजों में सुधार के बाद बहुदलीय लोकतंत्र बहाल कर दिया जाएगा. सेना ने ताकत का इस्तेमाल करने से अब तक परहेज किया है और टेलीकॉम/इंटरनेट/सोशल मीडिया पर पाबंदियों तथा राजनैतिक कर्फ्यू का ही सहारा लिया है, लेकिन मुमकिन है कि वहां तनाव बढ़कर हिंसा में बदल जाए.

एशिया के इस क्षेत्र और दुनिया के लिए तख्तापलट के व्यापक नतीजे होंगे. 2016 में जब अमेरिका राष्ट्रपति बराक ओबामा से डोनाल्ड ट्रंप के हाथों में जा रहा था, नवबंर 2015 के चुनाव में सू की की जोरदार जीत लोकतंत्र के अनुमोदन के तौर पर अलग दिखाई दी थी. अब जब अमेरिका ने खुद अपने लगभग दक्षिणपंथी 'तख्तापलट’ का स्वाद चख लिया है, यह तार्किक ही है कि राष्ट्रपति जो बाइडन लोकतंत्र को अपनी विदेश नीति का एक बड़ा आधार बनाने की जद्दोजहद कर रहे हैं.

म्यांमार इसमें उनकी पहली परीक्षा है. मगर शुरुआती संकेत तो यही हैं कि बाइडन सुरक्षा मुद्दों पर चीन के साथ संभवत: कठोरता की नीति बरतना जारी रखेंगे और हिंद-प्रशांत के लिए मुख्य कर्ताधर्ता के तौर पर दिग्गज कूटनीतिक कुर्ट कैंपबेल की नियुक्ति को देखते हुए संभावना नहीं है कि अमेरिका अपनी ‘बर्मा’ नीति एक घटना के आधार पर तय करेगा या निरे प्रतिबंधों का सहारा लेगा.

सू की के साथ अपने रिश्तों को अच्छी तरह से संभालता आ रहा चीन भी एकाएक सकते में आ गया दिखता है, हालांकि वह म्यांमार के खिलाफ किसी भी अंतरराष्ट्रीय भर्त्सना या प्रतिबंध का फायदा उठाने से नहीं चूकेगा. प्रमुख रक्षा भागीदार रूस के साथ तातमादाव (म्यांमार के सैन्य प्रशासन) का रिश्ता जनरल मिन ऑन्ग लाइंग के मातहत फला-फूला है, जिन्होंने पिछली जुलाई में म्यांमार के जातीय हथियारबंद धड़ों को चीन के समर्थन की दबी-छिपी आलोचना करने के लिए रूसी मीडिया चैनल चुना था.

यूरोप और ऑस्ट्रेलिया ने तख्तापलट की खुलकर आलोचना की है. जापान ने थोड़ा एहतियात बरता, लेकिन किरिन बियर ने अपनी सबसे अव्वल ‘म्यांमार’ बियर को लेकर सैन्य उपक्रम म्यांमार इकॉनोमिक होल्डिंग्ज के साथ भागीदारी तोड़ दी है. सेना के खिलाफ खुद जनांदोलन का सामना कर रहा थाइलैंड चौकन्ना है. आसियान और सुरक्षा परिषद दोनों ने अपने सदस्यों के बीच मतभेदों में तालमेल बैठाने की खातिर सीधी भर्त्सना तो नहीं की, लेकिन आपातस्थिति के ऐलान पर 'गहरी चिंता’ व्यक्त की है और हिरासत में लिए गए सभी लोगों को रिहा करने और जन इच्छा का सम्मान करने की मांग की है. बांग्लादेश रोहिंग्याओं की वापसी के हुकूमत के वादे की निगरानी करेगा.

भारत भी वैचारिक द्वंद्व से गुजरेगा. सहस्त्राब्दि बदलने के आसपास तातमादाव से अपने व्यावहारिक जुड़ाव के समय से ही भारत ने सेना और एनएलडी दोनों से भरोसे का रिश्ता विकसित किया है और सेना के साथ अपने रक्षा प्रशिक्षण, आपूर्ति और सुरक्षा संबंधों को म्यांमार की जन इच्छा को दिए जा रहे अपने राजनैतिक समर्थन से अलग रखा है. अब यह कसौटी पर कसा जाएगा.

कुछ हलकों में यह सोचा जा रहा है कि चीन को नियंत्रण में रखने के लिए भारत तातमादाव के साथ काम करने को मजबूर होगा. यह भ्रांत नजरिया है. चीन को अपने रणनीतिक निवेशों, जातीय हथियारबंद धड़ों पर प्रभाव और सुरक्षा परिषद में अपनी वीटो शक्ति की वजह से म्यांमार पर ज्यादा बढ़त जरूर हासिल है, लेकिन उसे वह भरोसा हासिल नहीं है जो भारत ने अर्जित किया है.

सुरक्षा परिषद में अपने मौजूदा कार्यकाल के चलते भारत का वजन कुछ बढ़ जाएगा. भारत को अपनी प्रतिक्रिया में केवल चीन ही नहीं बल्कि म्यांमार के लोगों और अर्थव्यवस्था के साथ संबंध बढ़ाने में अपने दीर्घकालिक हितों को भी ध्यान में रखना चाहिए. पिछले अक्तूबर में भारत के विदेश सचिव और सेना प्रमुख की असामान्य संयुक्त यात्रा इसी को दिमाग में रखकर की गई हो सकती है.

सेना और जनशक्ति के बीच टकराव में भारत को साफ तौर पर लोगों के साथ खड़ा होना चाहिए. मगर उसे अपना भरोसा बनाए रखते हुए शांत कूटनीति का सहारा लेना चाहिए. तातमादाव से अगर कोई आर्थिक रिश्ते हों तो उन पर वह लगाम कस सकता है जबकि लोगों और जगहों को जोडऩे वाले बुनियादी ढांचे और क्षमता निर्माण में निवेश को आगे बढ़ाता रह सकता है, खासकर उस उपेक्षित कृषि-अर्थव्यवस्था पर जोर देते हुए जिस पर म्यांमार के ज्यादातर लोग निर्भर हैं. म्यांमार में असैन्य शासन वापस लाने के लिए वह आसियान और जापान के साथ मिलकर भी काम कर सकता है.

(गौतम मुखोपाध्याय सीरिया, अफगानिस्तान और म्यांमार में भारत के राजदूत रह चुके हैं और अभी नई दिल्ली स्थित सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में सीनियर विजिटिंग फेलो हैं)

 

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