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भविष्य में अगुआई तो निजी विश्वविद्यालयों को ही करनी है

एक छात्र के रूपांतरण के मुकाबले उसे मिलने वाली कागज की डिग्री का भला क्या मूल्य! समग्र बदलाव ज्यादा अहम है

डॉ. अतुल चौहान डॉ. अतुल चौहान

अमेरिका में हार्वर्ड, स्टैनफोर्ड, येल, प्रिंसटन और एमआइटी जैसे कई शीर्ष विश्वविद्यालय निजी और 'नफे-नुक्सान से परे' के सिद्धांत पर चलने वाले हैं. उनमें से ज्यादातर सैकड़ों साल पुराने हैं. भारत में बगैर मुनाफे वाले निजी विश्वविद्यालयों की क्रांति करीब 25 साल पहले शुरू हुई जब एमिटी सरीखी संस्थाएं उभरीं. मुझे यकीन है कि भविष्य में भारत के अग्रणी विश्वविद्यालयों का नाम लिए जाने पर फेहरिस्त में कई निजी विश्वविद्यालय होंगे. भारत में उनकी कम उम्र को देखते हुए यह बड़ी बात है कि दुनिया भर में ऊंचे पायदान पर आने वाले भारत के 50 विश्वविद्यालयों में से एक-तिहाई निजी संस्थान हैं.

भारत को जो अहम बढ़त हासिल है वह है हमारे युवा लोगों की तादाद. इस विराट क्षमता और संभावना को बेडिय़ों से मुक्त करने के लिए जरूरी है कि हम इन्हें ऐसे हुनर और ज्ञान से लैस करें जो उन्हें लाभदायक रोजगार पाने और देश को खुशहाली की तरफ ले जाने में मददगार हो. सकल नामांकन अनुपात के लक्ष्यों और शिक्षा का अधिकार कानून के जरिए स्कूल व्यवस्था में दाखिल होने वाले छात्रों की तादाद पर विचार करते हुए सरकार ने कई साल पहले हिसाब लगाया था कि भारत में 1,500 और विश्वविद्यालयों की जरूरत होगी. इतने विश्वविद्यालय सरकार के लिए अपने दम पर स्थापित कर पाना मुश्किल होगा, यही एहसास निजी विश्वविद्यालयों की बढ़त की वजह बना.

भारत में निजी विश्वविद्यालय खुलने के सिलसिले को मैं क्रांति कहता हूं क्योंकि सरकार से लेकर विश्वविद्यालय चलाने वाले, सभी को इस दौरान बड़े सबक मिल गए. उन्होंने जाना कि नियम-कायदों से उनका गला घोंटे बगैर अच्छे निजी विश्वविद्यालय बनाने और चलाने के लिए निजी बुनियादों को ताकतवर कैसे बनाया जाए. एक शानदार नीति 'क्रमिक स्वायत्तता' की है, जिसके तहत तयशुदा मानदंडों पर अच्छा प्रदर्शन करने वाले विश्वविद्यालय अधिकाधिक स्वायत्तता पाते जाते हैं. मैं मानता हूं कि सरकार को निजी विश्वविद्यालय खोलने की अनुमति देने को खासे ऊंचे मानक रखने चाहिए. इससे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों का निर्माण होगा.

ऐसे बहुत-से विश्वविद्यालय हैं जो गुणवत्ता के साथ समझौता करते हैं. गंभीर शिक्षाविदों को हमेशा इस बात की पीड़ा रही है. मगर वक्त बदल गया है. छात्रों और अभिभावकों को एहसास हो गया है कि डिग्री के कागज से कहीं ज्यादा अहमियत विश्वविद्यालय के जरिए छात्र के कायापलट की है. और यही वह मूल्य है जिसके आधार पर दुनिया भर के निजी विश्वविद्यालयों ने अगुआई की है और भारत में भी ऐसा ही करेंगे. पारंपरिक विश्वविद्यालयों में डिग्री प्रोग्राम एक 'प्रोडक्ट' है. एमिटी सरीखे विश्वविद्यालयों में छात्र ही हमारा 'प्रोडक्ट' है. हरेक छात्र पर व्यक्तिगत ध्यान दिया जाता है ताकि वे अपनी अधिकतम क्षमता विकसित करना पक्का कर सकें.

फैसले लेने की चुस्ती-फुर्ती और रफ्तार निजी विश्वविद्यालयों की कामयाबी की एक और मजबूत बुनियाद है. ऐसे युग में जब टेक्नोलॉजी तेजी से उन्नत हो रही है, जहां भविष्य में मौजूदा जॉब प्रोफाइल बेमतलब हो जाएंगी और नए हुनरों की जरूरत होगी, जो विश्वविद्यालय खुद को नए रंग-ढंग में नहीं ढाल सकेंगे, नवाचार नहीं करेंगे, वे बच न सकेंगे. पारंपरिक विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रमों की समीक्षा पांच साल में की जाती है. अच्छे निजी विश्वविद्यालयों में यह उद्योगों के साथ गहरी साझेदारी के जरिए निरंतर होता है.

वैश्विक महामारी ने नए माहौल के हिसाब से ढलने और तेज रफ्तार की अहमियत को और भी रेखांकित किया है. एमिटी में दुनिया भर के हमारे संकाय शिक्षकों और टेक्नोलॉजी कर्मियों ने दिन-रात काम करके पक्का किया कि लॉकडाउन के ऐलान के कुछ ही दिनों के भीतर 1,50,000 से ज्यादा छात्र सुदूर ऑनलाइन पढ़ाई को अपना सकें. छात्रों को आकर्षित करने के लिए ऑनलाइन यूथ फेस्ट आयोजित किए गए, जिनमें सैकड़ों स्कूलों और विश्वविद्यालयों के 25,000 से ज्यादा छात्रों ने हिस्सा लिया. नोबेल विजेताओं, उद्योग के अगुआओं, उपलब्ध प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों और दलाई लामा तथा श्री श्री रविशंकर सरीखे आध्यात्मिक गुरुओं के 1,900 से ज्यादा ऑनलाइन अतिथि व्याख्यान हुए. अच्छे विश्वविद्यालयों का लचीलापन इस मुश्किल वक्त में भी निखरकर सामने आया.

भारतीय विश्वविद्यालयों को बेशक अभी लंबी दूरी तय करनी है. लेकिन भविष्य निश्चय ही अच्छा है. जब एमिटी के संस्थापक डॉ. अशोक के. चौहान सरीखे और भी औद्योगिक घराने और परोपकारी परिवर्तनकारी शिक्षा के जरिए देश को खुशहाल बनाने में मदद करने का बीड़ा उठा रहे हैं, ऐसे में वह दिन दूर नहीं जब दुनिया पढ़ाई के लिए एक बार फिर भारत आएगी, जैसे वह तक्षशिला और नालंदा के दिनों में आती थी. लाभ नहीं कमाने के लिए बनाए गए विश्वविद्यालय, जिनकी बुनियाद जनसेवा के सच्चे सिद्धांतों पर रखी गई है, निश्चित रूप से अगुआई करेंगे.

डॉ. अतुल चौहान एमिटी यूनिवर्सिटी के चांसलर और एमिटी एजुकेशन ग्रुप के प्रेसिडेंट हैं

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