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मेहमान का पन्नाः बाधाओं को कैसे पार कर सकता है स्टार्टअप इंडिया

भारत में स्टार्ट-अप संस्थापक युवा हैं और उन्हें उद्यमों का उतना गहरा तजुर्बा नहीं है जो बड़ी कंपनियों की समस्याओं के समाधान के लिए जरूरी होता है

युवा पीढ़ी की कल्पनाओं को पंख देते स्टार्ट-अप की एक लहर आई युवा पीढ़ी की कल्पनाओं को पंख देते स्टार्ट-अप की एक लहर आई

वेंकटेश शुक्ल

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों 2016 में स्टार्टअप इंडिया की शुरुआत ने युवा पीढ़ी की कल्पनाओं को पंख दे दिए और स्टार्ट-अप की एक लहर आई. भारत में अब 30 से अधिक यूनिकॉर्न (एक अरब डॉलर से अधिक मूल्य वाले निजी स्टार्ट-अप) हैं, जो अगले 30,000 उद्यमियों को आने वाली चुनौतियों से निपटने के लिए प्रेरित करेंगे. यह भरोसा भी बढ़ता दिख रहा कि प्रौद्योगिकी और उद्यमिता मिलकर देश की बड़ी समस्याओं का समाधान निकाल सकते हैं. नवाचार के प्रति मानसिकता में बदलाव भारत के लिए अच्छा है.

भारत ने जहां से शुरुआत की है अगर उसे आधार मानकर देखें तो हमने काफी प्रगति की है, लेकिन विश्व स्तर हम पर अपनी क्षमता से काफी पीछे खड़े हैं. इन तथ्यों पर विचार करें: 80 लाख की आबादी वाले देश इज्राएल की 250 कंपनियों ने अमेरिका में आइपीओ जारी किए हैं और इसके हजारों स्टार्ट-अप का बड़ी अमेरिकी कंपनियों ने अधिग्रहण किया है. इनमें अधिकतर कंपनियां बड़े और मध्यम आकार के उद्यमों के लिए समाधान प्रदान करती हैं. इसकी तुलना भारत के वैश्विक प्रभाव से करें—भारत की पांच से भी कम कंपनियों के अमेरिका में आइपीओ आए हैं और केवल मुट्ठीभर कंपनियों का अधिग्रहण बड़ी वैश्विक कंपनियों ने किया है.

पहल हो या उद्यमिता, भारतीय प्रतिभाएं किसी से पीछे नहीं हैं. समस्याएं दरअसल कहीं और हैं, और सरकार उनमें से कुछ को हल कर सकती है.

भारत में कानून, पिछले कुछ वर्षों में स्टार्ट-अप के लिए काफी अनुकूल हुए हैं. लेकिन अभी भी कुछ क्षेत्र हैं जो चीजों को धीमा करते हैं. कंपनियों को शुरू करना बहुत आसान हो गया है, लेकिन उन्हें बंद करना लंबी प्रक्रिया है. जितनी जल्दी कोई कंपनी बिक जाती है, उतनी ही जल्दी प्रतिभाएं अगली चुनौती के लिए उपलब्ध होती हैं. फिलहाल एक कर्मचारी को वर्तमान नियोक्ता को छोडऩे में कम से कम दो महीने लगते हैं, जो गति पर प्रतिस्पर्धा करने वाले किसी स्टार्ट-अप का जीवनचक्र है. सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए और सभी रोजगार अनुबंधों के साथ जुड़े घिसे-पिटे नोटिस पीरियड को कम करना चाहिए.

एक और समस्या है कर व्यवस्था. ऐंजल इनवेस्टेमेंट (किसी फर्म के लिए मुख्य निवेशकर्ता के निवेश) के कराधान को हटाने के संघर्ष में जो अनुभव रहा है उससे एक बात समझ आई है कि कर विभाग के पास कर संग्रह के प्रत्येक संभावित राजस्व स्रोत के दोहन के लिए एक प्रोत्साहन या इंसेंटिव उपलब्ध है. यह दुराग्रही प्रोत्साहन सीबीडीटी (केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड) की ओर से कर संग्रह के लिए वार्षिक कोटा देने की भारत की अजीबोगरीब प्रथा की देन है. कर संग्रह का कोटा, ऊपर से प्रत्येक आयकर अधिकारी को दिया जाता है जिसके लिए उसे जवाबदेह भी ठहराया जाता है. ऐसे में अगर कर अधिकारी अतिउत्साह दिखाते हैं तो इसमें हैरानी की क्या बात है, प्रोत्साहन की चाह उन्हें ऐसा व्यवहार करने को उकसाता है.

लेकिन अब तक की सबसे बड़ी समस्या अनुबंधों को लागू करने की बेहद धीमी कानूनी व्यवस्था है. इसके नुक्सानदेह प्रभाव को कम करके आंका जाता है. अगर आपका ग्राहक समय पर भुगतान नहीं करता है या गलत चेक लिखता है, तो आप अदालत से तत्काल न्याय की आशा नहीं कर सकते. अगर आपका सहसंस्थापक आपका सोर्स कोड लेकर चला जाता है तो आपका स्टार्ट-अप एक ढुलमुल कानूनी नोटिस जारी करने के अलावा और क्या कर सकता है? गलत काम करने वालों में इस बात का जरा-सा भी भय नहीं है कि उन्हें जवाबदेह ठहराया जा सकता है. धीमी न्यायिक प्रणाली का सबसे बड़ा नुकसान उस कम संसाधनों वाले व्यक्ति को होता है जिसके पास लंबे खींचने वाले मुकदमों के लिए संसाधन या समय नहीं है. बड़ी कंपनियां शायद ही कभी कुछ नया करती हैं, छोटी कंपनियां नया करती हैं और अनुबंधों के अनुपालन में होने वाली किसी भी कोताही का सबसे ज्यादा खामियाजा उन्हें ही उठाना पड़ता है. अंतत: इससे भारत का नुक्सान होता है.

भारत के अपनी क्षमता से कम प्रदर्शन का एक और कारण, उद्यमिता की इसकी प्रकृति है. भारत में स्टार्ट-अप की नींव रखने वालों में भारी संख्या उन युवाओं की है जो उम्र के 20 के दशक में या फिर 30 के दशक की शुरुआत में है और जिनके पास काम का अनुभव कम है. बड़े उद्यमों के जटिल व्यावसायिक समस्याओं को हल करने की जरूरी अंतर्दृष्टि विकसित करने के लिए वर्तमान प्रौद्योगिकियों और उनकी सीमाओं से परिचित होने की जरूरत होती है. यह अंतर्दृष्टि अनुभव से आती है और इसका कोई शॉर्टकट नहीं है—आपको इसे कई वर्षों की कड़ी मेहनत से अर्जित करना होगा. लेकिन भारत में शायद ही कोई उद्यमी हो जो उम्र के 40 या 50 के दशक में हो. जब तक उद्योग के 15-20 साल के गहन अनुभव वाले पेशेवर लोग बड़ी संख्या में दायित्व नहीं लेते, तब तक बड़ी संख्या में ऐसी कंपनियां नहीं उभर सकेंगी जो विश्वस्तर पर प्रभावी हों.

वेंकटेश शुक्ल सिलिकॉन वैली में स्थित मोंटा विस्टा कैपिटल के एमडी हैं और टीआइई ग्लोबल के पूर्व अध्यक्ष हैं

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