scorecardresearch
 
डाउनलोड करें इंडिया टुडे हिंदी मैगजीन का लेटेस्ट इशू सिर्फ 25/- रुपये में

मेहमान का पन्नाः अक्ल पर पर्दा

लेखक विचारों के इतिहासकार और हिंदू धर्म के अध्येता हैं. उनकी नवीनतम पुस्तक कबीर-कबीर है. फिलहाल वे हिंदू धर्म पर किताब के लिए काम कर रहे हैं.

X
पुरुषोत्तम अग्रवाल पुरुषोत्तम अग्रवाल

पुरुषोत्तम अग्रवाल

उडुपी 'हिजाब विवाद’ का सबसे दिलचस्प, बल्कि शिक्षाप्रद पहलू वह है जिसमें युवा हिंदुओं ने अपनी धार्मिक पहचान पर बल देकर विरोध दर्ज करने का रास्ता चुना. अपने वचनों और कर्मों से उन्होंने कहा, ''अगर तुम्हें हिजाब पहनने की इजाजत है, तो हमें भी भगवे की इजाजत मिलनी चाहिए.’’ इस तरह वे—बल्कि उनके शिक्षक और मार्गदर्शक—लोगों का ध्यान सीधे कथित 'मुस्लिम तुष्टीकरण’ के व्यापकतर मुद्दे की ओर खींचने में सफल रहे.

हिजाब को मुसलमानों के लिए एक और 'नाहक रियायत’ के तौर पर देखा गया, जिसे शुरू में ही कुचल देना जरूरी है. यह विवाद भाजपा के लिए उत्तर प्रदेश और अन्य राज्यों में चल रहे चुनावों में 'तुष्टीकरण विरोधी’ अपना संदेश फैलाने का समयोचित वाहक बन गया. यह कारगर हो या न हो, हिंदुत्व की ताकतें खासी उम्मीद कर सकती हैं कि यह विवाद उनकी 'मुस्लिम तुष्टीकरण’ की लफ्फाजी को और ताकत देगा.

मगर हिंदुत्व के लिए यहां कुछ ज्यादा अहम भी है—यह उन्हें सामी अंदाज में हिंदुओं को 'केंद्रीय रूप से मार्गदर्शित’ (अगर नियंत्रित नहीं भी हो तो) समुदाय में बदलने की अपनी फंतासी को आगे बढ़ाने का एक और औजार देगा. यही वह उद्देश्य है जिसके तहत 1925 में आरएसएस की स्थापना की गई थी और सावरकर के उस सिद्धांत का भी यही लब्बोलुबाब है जो कहता है, ''हिंदुत्व वैसा नहीं है जैसा हिंदू धर्म शब्द से अस्पष्ट रूप से संकेत मिलता है.’’

हिंदू धर्म की केंद्रीय विशेषता आचरणों की विविधता और साफ-साफ परिभाषित मूल धर्मशास्त्रीय सिद्धांत की गैरमौजूदगी है. इसलिए सावरकर सही हैं, यह वाकई वह नहीं है जो हिंदुत्व शब्द के जरिए जोर देकर बताया गया है. हिजाब कुरान या शरीआ की ओर से निर्देशित है या नहीं, यह इस्लाम के धर्मशास्त्रियों और जनसाधारण को तय करना है, मगर इतना स्पष्ट है—धर्मशास्त्र, हिंदू कानून की अनगिनत किताबों में से एक भी किसी भी किस्म के विशेष पहचान सूचक पहनावे का आदेश नहीं देती, चाहे वह भगवा टोपी हो या दुशाला.

पहनावे की चीजें सामाजिक शिष्टाचार, नियम-कायदों और परिपाटी का अंग भले हों, पर धार्मिक बाध्यता निश्चित ही नहीं हैं. धर्मशास्त्रीय विचार-पद्धतियों (यहां तक कि जिनका जमकर विरोध हुआ वे भी), सामाजिक आचरणों और देह के प्रति सौंदर्यपरक खुलेपन की बहुलता का सह-अस्तित्व हिंदू धर्म के 'ग्रंथ का धर्म’ नहीं होने का सुखद परिणाम है और इसे 'प्रतिद्वंद्वी’—यानी इस्लाम या ईसाइयत—की हू-ब-हू नकल में बदलने के हिंदुत्व के सपने के लिए सबसे मजबूत चुनौती का निर्माण करता है. 

धर्मों को एकाश्म की तरह देखने वालों के लिए विचार करने की बात यह है—इस्लाम सरीखे 'ग्रंथ आधारित धर्म’ भी क्या ऐतिहासिक क्रांति से वाकई अप्रभावित रह सके? उत्तर हमारे चारों ओर हैं जिन्हें कोई भी देख सकता है. 'बीते समय की महिमा’ की अतीतजीवी ललक कितनी भी उचित या हानिरहित जान पड़ती हों, क्या यह यथार्थपरक या वांछनीय भी है कि समय में पीछे लौटा जाए?

प्रीलैप्सेरियन या मनुष्य के पतन से पहले की कभी हाथ न आने वाली मासूम अवस्था में लौटने के लिए बाहें फैलाई जाएं? यहां तक कि अपने सांस्कृतिक आत्म के प्रति वास्तविक या कल्पित खतरों के प्रति प्रतिक्रिया के रूप में भी? क्या इससे इनकार किया जा सकता है कि जीवन की भौतिक परिस्थितियों में परिवर्तन समाज के जीने और अपनी कल्पना करने के तरीकों को भी मौलिक ढंग से बदल देता है?

महज कुछ सदी पहले भारत में महिलाओं की शिक्षा कुछ लोगों का हसीन सपना थी, तो दूसरों के लिए सांस्कृतिक दु:स्वप्न. संयुक्त राज्य अमेरिका के दक्षिणी राज्यों में 'नीग्रो’ को पीट-पीटकर मौत के घाट उतार देना और महिलाओं को मतदान का अधिकार न देना 20वीं सदी की शुरुआत तक 'सामान्य’ बात थी. वह सब इस कदर बदल चुका है कि वापस नहीं आ सकता. अतीतजीविता तो नहीं ही होनी चाहिए.

यहां 'चयन या पसंद’ के विचार को सही नजरिए में रखना होगा. वैसे तो धर्म जैविक विकास की अवस्था से गुजर रहे हैं लेकिन हम दुनिया भर में आधुनिकता को पीछे हटते देख रहे हैं—न हिंदू धर्म इससे बचा और न इस्लाम. जब प्रतिगामी आचरण, खासकर महिलाओं को प्रभावित करने वाले आचरण, महिलाओं द्वारा स्वेच्छा से अपनाए जाने की शक्ल में लौटते हैं, चाहे वह हिजाब हो या करवा चौथ का व्रत, तो हमें समझना चाहिए कि चयन या पसंद की आड़ में किस तरह उन्हें खास ढंग से ढाल लिया गया है.

प्रगतिशील समाज का—धर्म, समाज और लिंग-भेद के अध्येताओं का—काम उस पर्दे को बेधना और युवाओं को उसके खिलाफ राजी करना है. बेशक लड़कियों का हिंसक उत्पीड़न इसका तरीका नहीं है. इससे रवैये चौतरफा सख्त ही होंगे, क्योंकि पिशाचविद्या 'दूसरे’ की नकल की गोपनीय इच्छा हमेशा छिपा लेती है. ठ्ठ

जब प्रतिगामी आचरण, खासकर महिलाओं को प्रभावित करने वाले आचरण, महिलाओं  द्वारा स्वेच्छा से अपनाए जाने की शक्ल में लौटते हैं,  तो प्रगतिशील समाज को उस पर सवाल उठाना चाहिए

—पुरुषोत्तम अग्रवाल.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें