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अव्वल बनना है तो...

आज विश्वविद्यालयों का दायित्व नौकरी लायक व्यक्ति बनाने का ही नहीं बल्कि विद्वान नागरिक बनाने का भी है

डॉ. फादर अब्राहम वी.एम. डॉ. फादर अब्राहम वी.एम.

भारत पहली से आठवीं सदी के बीच ज्ञान की भूमि माना जाता था. उच्च शिक्षा के क्षेत्र में आज उसके पास दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तंत्र है. भारत में नालंदा, तक्षशिला, वल्लभी, विक्रमशिला और कांचीपुरम जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय थे, फिर भी भारतीय उच्च शिक्षा संस्थानों का उत्कृष्ट अंतरराष्ट्रीय संस्थानों की फेहरिस्त में कोई स्थान नहीं. तीन दशक से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में होने, और विश्वस्तरीय बनने की चाहत रखने वाले विश्वविद्यालय के अगुआ के रूप में मैं कुछ अनुभव साझा करना चाहूंगा.

भारतीय उच्च शिक्षा पर समकालीन बहस-विमर्शों में राज्य और क्षेत्रीय स्तर के संस्थानों की घटती प्रासंगिकता के पीछे की वजहों के रूप में हमेशा निजी संस्थानों के उभार की ओर इशारा किया गया है. उत्कृष्टता और समावेशी रवैए के बीच असंतुलन के लिए भी इन्हें ही जिम्मेदार माना जाता है. आइआइटी, आइआइएम, आइआइएससी और केंद्रीय विश्वविद्यालयों जैसे उत्कृष्ट संस्थान हैं, लेकिन वहां जाने वाले छात्रों की संख्या राज्य और क्षेत्रीय स्तर के विश्वविद्यालयों की तुलना में काफी कम है. लेकिन उच्च शिक्षा में भीड़ बढऩे के साथ पैदा होती है बुनियादी ढांचे और अच्छे, योग्य शिक्षकों की कमी जैसी समस्या.

यही वह खाई है जो क्राइस्ट (डीम्ड विश्वविद्यालय) जैसे निजी विश्वविद्यालयों ने भर दी है. छात्रों के दाखिले के मामले में क्राइस्ट राज्य विश्वविद्यालयों की तरह काम करता है, इसका पाठ्यक्रम वैश्विक है, यहां की अनुसंधान संस्कृति और शिक्षाशास्त्र उत्कृष्टता के दूसरे केंद्रों की तरह है और यह 21वीं सदी के लिए यूनेस्को के तय किए नैतिक और निरंतरता के पहलुओं को ध्यान में रख भारत को ज्ञानवान समाज बनाने की दिशा में ले जा रहा है.

भारतीय संस्थानों को वैश्विक संस्थानों के मुकाबले लाने के लिए हमें असाधारण प्रतिभावान छात्रों को पहचानना होगा, और उन्हें चुनौतीपूर्ण काम देने के साथ ही इंटर्नशिप के मौके मुहैया कराने होंगे. इसके अलावा ऐसे छात्रों के लिए पुल बनाने का काम करना होगा, जिन्होंने उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं किया. उन्हें इसके लिए पूरक पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने होंगे. इस तरह पक्का किया जा सकेगा कि हर छात्र की क्षमता का विकास हो सके.

उन छात्रों के लिए शिक्षण के तौर-तरीकों को डिजाइन और कार्यान्वित करने के वास्ते संस्थानों को स्वायत्तता देने की जरूरत है. राज्य और केंद्र सरकारों को नियमों और हस्तक्षेप के बीच एक संतुलन बनाने की जरूरत है. विश्वविद्यालयों के प्रशासन में सियासी दखल और मीडिया के जरिए दबाव बनाकर दादागीरी करने और उनकी प्रतिष्ठा धूमिल करने की कोशिशों से उनका मनोबल गिरेगा.

विश्वविद्यालयों को अध्यापन, शोध और मानव संसाधन प्रशिक्षण को भी बराबर की अहमियत देनी होगी, चाहे वह कौशल विकास हो या क्षमता का विकास. एक ओर संस्थान के अकादमिक कैलेंडर में फैकल्टी विकास और गुणवत्ता सुधार जैसे कार्यक्रमों को शामिल करना चाहिए, साथ ही यह पक्का करना भी महत्वूपूर्ण है कि इंडक्शन और ओरिएंटेशन के कार्यक्रम भी समय-समय पर आयोजित किए जाते रहें ताकि शिक्षकों को संस्थान की संस्कृति और दर्शन के बारे में बताया जा सके और उनमें वे गुण डाले जा सकें. इसके बिना अध्यापन, शोध और सांस्थानिक संस्कृति बनाने के नजरिए से शिक्षकों के समय का उचित संतुलन साधा नहीं जा सकेगा.

विश्वविद्यालयों को विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों के रूप में पहचान हासिल करने के लिए अनुसंधान पर ध्यान केंद्रित करना होगा. इसके लिए उन्हें राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के शोध संस्थानों और विशेषज्ञ विभागों से जुडऩा होगा ताकि फैकल्टी और छात्रों को विशेष तौर पर बनी प्रयोगशालाओं और प्रसिद्ध शोधार्थियों तक पहुंच हासिल हो सके.

छात्रों के पास एक से दूसरे पाठ्यक्रमों में जाने-चुनने का विकल्प होना चाहिए. क्रेडिट और सेमेस्टर व्यवस्था, आजीवन पढऩे के लिए चयन आधारित पाठ्यक्रम और राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रूप से बड़े पैमाने पर ऑनलाइन पाठ्यक्रमों से छात्रों को मौजूं पाठ्यक्रम चुनने में मदद मिलती है. विश्वविद्यालयों के लिए यह भी जरूरी है कि वे अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय मानकों को आगे बढ़ाएं और हमारे छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करें. एनएएसी से विश्वविद्यालयों को दिए जाने वाले ग्रेड और नेशनल इंस्टीट्यूट रैंकिंग फ्रेमवर्क ने शिक्षा की गुणवत्ता को बढ़ाने में मदद की है. यह विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी है कि वे ऐसी मान्यता हासिल करने की दिशा में काम करें.

आज विश्वविद्यालयों की बड़ी जिम्मेदारी सिर्फ नौकरी करने लायक व्यक्ति तैयार करना नहीं बल्कि विद्वान नागरिक और बौद्धिक उद्यमी तैयार करने की भी है. इस तरह सामाजिक परिवर्तन के उत्प्रेरक के रूप में विश्वविद्यालय की कल्पना करने के लिए शिक्षा क्षेत्र के अगुआ को ठोस प्रयास करने चाहिए. जरूरत इस बात की है कि मानविकी विषयों और सामाजिक विज्ञान को सांस्कृतिक, स्त्री और पर्यावरणीय मसलों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाया जाए.

इक्कीसवीं सदी में नेटवर्किंग और इंटरनेट ने खुद को लेन-देन और बातचीत के मंच के रूप में तब्दील कर लिया है और शेयरिंग लोकतांत्रिक उपक्रम है. इसलिए आज के विश्वविद्यालय ज्ञान का समाज बनने के लिए तैयार हैं जो प्रतिस्पर्धा या अनुकरण के माध्यम से नहीं, बल्कि जनहित के लिए सहयोग की भावना से पनपेगा. हमारे विश्वविद्यालयों को आज विभिन्न विषयों के अध्यापकों और विद्वानों के समुदाय में बदलना होगा.

डॉ. फादर अब्राहम वी.एम. क्राइस्ट (डीम्ड टु बी युनिवर्सिटी), बेंगलूरू के कुलपति हैं

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