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अमेरिका की पूंछ क्यों पकड़ना

अमेरिकी पहल पर बनने वाले किसी संगठन में शामिल होने का भारत को ठोस लाभ न होगा क्योंकि प्रभावी ताकत होने के नाते उसके भीतरी समीकरण तो अमेरिका ही तय करेगा

नजरियाः भरत कारनाड नजरियाः भरत कारनाड

अमेरिकी विदेश मंत्री माइकल पोम्पियो ने पूर्व राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन की 1972 में शुरू की गई चीन को पालने-पोसने की नीति पर अफसोस जाहिर किया है. अमेरिका तब से उसी पर चलता आया है. पोम्पियो का मानना है कि यह गंभीर रणनीतिक भूल थी. इसके तहत चीन को व्यापार की रियायती शर्तों, अमेरिकी बाजार तक बेरोकटोक पहुंच और उसकी सेना तथा मैन्युफैक्चरिंग उद्योग को आधुनिक बनाने के लिए उन्नत टेक्नोलॉजी के हस्तातंरण की इजाजत देकर उम्मीद की गई थी कि इस सबसे साम्यवादी शासन व्यवस्था उदार व्यवस्था में बदलेगी. लेकिन 21वीं सदी के दूसरे दशक में चीन आक्रामक अधिनायकवादी शासन व्यवस्था, वाणिज्यिक शक्ति केंद्र और सैन्य प्रतिद्वंद्वी के तौर पर उभरा. पोम्पियो ने 23 जुलाई को कैलिफोर्निया के अपने भाषण में जोर देकर कहा कि उसका मुकाबला ''लोकतांत्रिक देशों के एक नए गठबंधन'' के जरिए ही किया जा सकता है.

उम्मीद के मुताबिक, हल्की-सी हलचल को ही इशारा समझ लेने वाले भारत के रणनीतिकार फौरन पोम्पियो के सुर में सुर मिलाने लगे, यह सोचकर कि किसी और नाम के साथ 'लोकतांत्रिक देशों का यह गठबंधन' भारत के मकसद भी पूरे करेगा. अलबत्ता इस मामले में मोदी सरकार थोड़ी एहतियात बरत रही है, जैसा कि विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने इशारा किया है. पिछले हफ्ते 'माइंडमाइन समिट' के वेब दर्शकों से उन्होंने कहा कि जहां 'अतिरिक्त चौंकन्नेपन और बहुपक्षवाद पर अतिरिक्त निर्भरता के युग को हम पीछे छोड़ चुके हैं;' वहीं अमेरिका के 'अपना रुख नए सिरे से तय करने' और अमेरिकी सुरक्षा छतरी के 'ज्यादा छोटी, कम मोटी' होने का नतीजा यह है कि इसने 'दूसरे देशों को कहीं बड़ी भूमिका निभाने का मौका दिया' है.

जाहिरा तौर पर, ऐसी भूमिका में वे भारत को 'बीच वाली शक्ति' के रूप में देखते हैं; अलबत्ता जयशंकर के शब्दों में, ''प्रबल द्विध्रुवीय विशेषताओं के साथ बहुध्रुवीय दुनिया'' में मोदी सरकार देश को स्वायत्तता के रास्ते पर कैसे ले जाना चाहती है, इसके बारे में स्पष्टता का अभाव है. दिक्कत उसके रिकॉर्ड की वजह से है. अमेरिका की तरफ खड़े होना उसका तयशुदा अविचारित रुख मालूम देता है, जिसने रूस और ईरान जैसे पुराने दोस्तों को दूर और पराया कर दिया है.

मुद्दा यह है कि क्या लोकतांत्रिक देशों के किसी ऐसे 'सहयोगी रिश्ते' या 'गठबंधन' की कल्पना की जा सकती है, जिसमें भारत न हो? बिल्कुल नहीं. लिहाजा अमेरिका की तरफ से पेश ऐसे समूह में शामिल होने का कोई असल नीतिगत फायदा या ठोस लाभ नहीं है, जिसमें अमेरिका प्रभावी ताकत होने के नाते गठबंधन के भीतरी मामलों की व्यवस्थाएं तय करेगा और अपनी पसंद से गैरलोकतांत्रिक विरोधी देशों के साथ रिश्तों के नियम-कायदे थोपेगा. लेकिन इस स्थिति में भारत के लिए फायदा इसी में है कि वह अपनी राह चले, अमेरिका की 'यह करो और वह मत करो' सरीखी हिदायतों से बेपरवाह रहकर अपने लक्ष्य पर आगे बढ़े और ऐसे गठबंधनों में अपनी भागीदारी की कीमत वसूल करते हुए अपने मकसद को बढ़ावा दे और अपने हितों को नुक्सान पहुंचाने वाले कदमों से फासला रखे.

चीन के खतरे को लेकर भारत की धारणा उन देशों के अनुरूप ही है जो उसके घेरे के इर्दगिर्द हैं. इसको देखते हुए ऐसी एक सुरक्षा व्यवस्था से जुडऩे में कहीं ज्यादा समझदारी है जो इस विस्तारित क्षेत्र की सेहत के लिए सहज और मददगार हो. ऐसी व्यवस्था भारत, जापान, दक्षिण एशियाई देशों के एक गुट और ऑस्ट्रेलिया की भागीदारी के साथ बना मोडिफाइड क्वाड्रिलेटरल या मॉड क्वाड है, जिसमें अमेरिका हिंद-प्रशांत में इस क्षेत्र से बाहर की संतुलनकारी शक्ति होने के नाते शामिल होने या न होने का विकल्प चुन सकता है. यह उस चतुर्पक्षीय संगठन से कहीं बेहतर है जिसमें अमेरिका शामिल है और जिसकी सैन्य टकराव की तैयारी उतनी ही घट रही है जितनी चीन की सैन्य निपुणता बढ़ रही है. मसलन, मॉड क्वाड भारत को इतनी छूट देगा कि वह वियतनाम, फिलीपींस और इंडोनेशिया को रणनीतिक हथियारों से लैस कर सके और जापान, ऑस्ट्रेलिया और ऐसी ही दूसरी क्षेत्रीय ताकतों के साथ मिलकर काम कर सके, जिनका चीन की एकाधिकारवादी प्रवृत्तियों पर लगाम लगाने की खातिर इसमें बहुत कुछ दांव पर लगा होगा.

चीन और अमेरिका को अलग करने वाला महासागरीय विस्तार और चीन तथा मॉड क्वाड के सदस्यों को अलग करने वाली, एक दूसरे से सटी विवादित जमीनी सरहदें और संकरे समुद्र बिल्कुल अलग-अलग सुरक्षा समीकरण पेश करते हैं. बिल्कुल अलहदा हित और प्रेरणाएं किस तरह काम करती हैं, इसके प्रमाण के तौर पर पूर्वी लद्दाख के टकराव पर विचार कीजिए. अमेरिका ने बाल बराबर मदद की. फिलीपीनी सागर में दो विमानवाहक कार्य समूहों की तैनाती का वास्ता दक्षिण चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य से था, पर भारतीय मीडिया ने इसे ऐसे पेश किया मानो यह समर्थन का इशारा हो.

भरत कारनाड यूनाइटेड सर्विस इंस्टीट्यूशन ऑफ इंडिया में विशिष्ट फेलो और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च में मानद प्रोफेसर हैं

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