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जनादेश देने वाली जनभावना

कूटनीतिक तरीकों या फिर गुप्त सर्जिकल स्ट्राइक जैसे विकल्प या फिर कश्मीरी आतंकवादियों को मार गिराने से काम चलने वाला नहीं है. जनभावना है कि भारत पाकिस्तानी जवानों और आतंकवादियों पर इतनी बड़ी कार्रवाई करे जो पुलवामा के जख्म को भरने लायक हो

कमर सिब्तैन मेल टुडे कमर सिब्तैन मेल टुडे

भारतीय जनता पार्टी के मुख्यालय में शुक्रवार 15 फरवरी को तीसरे तल पर महासचिवों के लिए बने 7 कमरों में से 6 बंद पड़े थे. सिर्फ एक कमरा जो कैलाश विजयवर्गीय का है, खुला था. वहां किसी कार्यकर्ता या दूसरे लोगों की आवाजाही रोकी गई थी क्योंकि दोपहर में अपने कमरे में बैठे कैलाश सभी भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्रियों को फोन के जरिए राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का निर्देश सुना कर उसका अक्षरशः पालन सुनिश्चित करने को कह रहे थे. निर्देश यह था कि पुलवामा हमले में शहीद हुए सीआरपीएफ जवानों के अंतिम संस्कार में सीएम या राज्य सरकार के मंत्री जरूर उपस्थित रहें.

विजयवर्गीय को जब भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने मुख्यमंत्रियों को पार्टी का निर्देश सुनाने को कहा (तकरीबन दोपहर 2 बजे) उससे पहले उन्हें (अमित शाह को) विभिन्न राज्यों से यह सूचना मिल चुकी थी कि सीआरपीएफ जवानों पर आतंकी हमले के खिलाफ स्वतःस्फूर्त भीड़ एकत्र हो रही है. दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों में लोगों के स्वतःस्फूर्त हुजूम को देखते हुए भाजपा युवा मोर्चा और महिला मोर्चा से कहा गया कि वे इस भीड़ को नेतृत्व दें लेकिन इस सावधानी के साथ कि भाजपा का बैनर पोस्टर लेकर भीड़ का नेतृत्व न करें और जहां जरूरत हो, वहां सिर्फ भीड़ का हिस्सा बन कर उनकी आवाज को बुलंद करें.

सधे हुए और सावधान अंदाज में भाजपा की यह कवायद क्यों और किसलिए थी? पार्टी के एक वरिष्ठ नेता दो-टूक कहते हैं, ''यह जनभावना ही 2019 के जनादेश का एजेंडा है. एक ऐसा एजेंडा जिसे किसी पार्टी या व्यक्ति ने नहीं बल्कि देश ने तय कर दिया है." जनभावना को देखते हुए ही भाजपा कार्यकर्ताओं ने 17 फरवरी को देश के सभी जिला केंद्रों पर श्रद्धांजलि सभा आयोजित कर शहीदों को नमन किया. पार्टी अध्यक्ष ने साफ निर्देश दिया था कि ये कार्यक्रम किसी बंद कमरे या हॉल में नहीं हों बल्कि किसी खुले और सार्वजनिक स्थान पर आयोजित किए जाएं. ऐसा इसलिए ताकि श्रद्धांजलि सभा सिर्फ भाजपा से जुड़े होने की जगह आम लोगों से जुड़ी लगे.

भाजपा के रणनीतिकार यह मान रहे हैं कि पुलवामा की घटना ऐसे समय हुई है जब भाजपा को 2019 के लिए एक प्रभावी मुद्दे की दरकार थी. 2014 में स्वयं नरेंद्र मोदी जनादेश का एजेंडा बन गए थे. उन्हें 2013 की जून में गोवा में हुई भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में 2014 के लोकसभा चुनाव के लिए कैंपेन कमेटी का मुखिया बनाना भाजपा के लिए मजबूरी बन गया था, क्योंकि कार्यकारिणी से पहले भाजपा के हर कार्यक्रम में मोदी-मोदी के नारे लगने शुरू हो गए थे. लोगों और कार्यकर्ताओं की भावनाओं को देखते हुए मोदी को सितंबर, 2013 में प्रधानमंत्री का प्रत्याशी घोषित कर दिया गया. भाजपा को इसका लाभ भी मिला और पार्टी ने पहली बार पूर्ण बहुमत से अधिक सीटें (282) हासिल कीं. 1984 के बाद, अर्थात् 30 साल के बाद किसी भी दल को पूर्ण बहुमत क्यों मिला? पार्टी के एक महासचिव कहते हैं कि, ''ऐसा इसलिए संभव हो सका क्योंकि 2014 में जनभावना मोदी को प्रधानमंत्री बनाने की थी."

पुलवामा की घटना से पहले 2019 के लिए जो चुनावी माहौल बन गया था और बनता जा रहा था उसमें एकजुट जनभावना जैसी कोई बात नहीं थी. सभी सियासी दल चुनावी चर्चा को अपने रुख के हिसाब से मोडऩे की कोशिश में लगे थे. कांग्रेस और दूसरी विपक्षी पार्टियां राफेल, सीबीआइ और दूसरी जांच एजेंसियों के दुरुपयोग, किसानों की दुर्दशा जैसे मुद्दे उछाल रही थीं और भाजपा इन मुद्दों पर रक्षात्मक रुख अपना रही थी. साथ ही इस कोशिश में लगी थी कि 2019 का चुनाव मोदी की नेतृत्व क्षमता के मुद्दे पर लड़े. इसके अलावा राम मंदिर, ट्रिपल तलाक और आरक्षण जैसे सियासी हथियारों के जरिए भाजपा अपना किला बचाने की जुगत में लगी थी. मोदी को लेकर 2014 जैसा माहौल नहीं है, इसका संकेत विभिन्न सर्वे के नतीजों से भी निकल रहा था. भाजपा इस तथ्य को समझ रही थी. लेकिन पुलवामा ने इन सारे समीकरणों और मुद्दों को पीछे छोड़ दिया है.

भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद जीवीएल नरसिम्हा राव कहते हैं कि अब यह पूरी तरह साफ है कि 2019 लोकसभा चुनाव के लिए जनमानस का मुद्दा अब आतंकवाद के खात्मे का बन गया है और सभी लोग पीएम नरेंद्र मोदी के साथ हैं. जनभावना के इस नैरेटिव को समझते हुए खुद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह, पीएम के विकास कार्यों का जिक्र करने की जगह मोदी को आतंकवाद को मुंहतोड़ जवाब देने वाले नेता के रूप में चर्चा के केंद्रबिंदु में लाने की कोशिश में लग गए हैं. 17 फरवरी को असम के लखीमपुर स्थित सबोती स्टेडियम में अमित शाह ने पार्टी के युवा प्रवाह विजय लक्ष्य कार्यक्रम में कहा, ''हमारे वीर शहीदों का बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा क्योंकि इस बार केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार है. मोदी सरकार की सबसे बड़ी प्राथमिकता राष्ट्र की सुरक्षा है और इस मुद्दे पर कोई समझौता नहीं किया जा सकता." शाह का यह बयान ऐसे समय में आया है जब पूरे देश में राष्ट्र की सुरक्षा चर्चा की प्राथमिकता लिस्ट में सबसे ऊपर है.

आसान नहीं है राह

पुलवामा घटना के बाद जनमानस की भावनाओं पर खरा उतरने का अवसर मोदी सरकार के पास है. लेकिन मौजूदा स्थिति में यह अवसर से अधिक चुनौती दिख रहा है. भाजपा के नेता भी मान रहे हैं कि कूटनीतिक तरीकों या गुप्त सर्जिकल स्ट्राइक जैसे विकल्प या फिर कश्मीरी आतंकवादियों को मार गिराना जैसे उपायों से काम चलने वाला नहीं है. जब तक लोगों को सीधे तौर पर यह नहीं दिखेगा कि भारत ने पाकिस्तानी जवानों और आतंकवादियों पर उससे बड़ी कार्रवाई की है जो आतंकियों ने पुलवामा में जवानों पर की थी, तब तक जनभावनाओं पर खरा नहीं उतरा जा सकता. लेकिन मौजूदा हालात में आनन-फानन में इस तरह की कार्यवाई के विकल्प तलाशना असंभव नहीं तो कठिन जरूर है.

यही सबसे बड़ी चुनौती है. भाजपा नेता परोक्ष बातचीत में यह मान रहे हैं कि पुलवामा का बदला लेने में जितनी देर होगी, जनमानस में सरकार के खिलाफ गुस्सा पनपना शुरू हो जाएगा. विपक्ष भी उस मौके के इंतजार में बैठा है जब सरकार की तरफ से देरी हो या छिटपुट कार्रवाई हो ताकि वह सरकार के खिलाफ माहौल बनाने के लिए आगे आए. इसकी शुरुआत हो चुकी है.

कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, ''मोदी प्रोटोकॉल को ताक पर रखकर उनका (सउदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान) भव्य स्वागत करते हैं जिन्होंने आतंकवाद के पोषक पाकिस्तान को 20 बिलियन डॉलर का तोहफा दिया और पाकिस्तान के आतंकविरोधी रवैये की प्रशंसा की."

सुरजेवाला यहीं नहीं रुकते, वे कहते हैं, ''देश की जनता देख रही है कि प्रधानमंत्री उस शख्स को गले लगा रहे हैं जो पाकिस्तान के समर्थन में है.

क्या मोदी सऊदी अरब से पाकिस्तान के साथ दिए संयुक्त बयान को वापस लेने की मांग मांग करने का साहस दिखाएंगे, जो मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने की दृढ़ता को ठुकराता है."

कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि कोई भी राजनैतिक पार्टी इस बात की अनदेखी नहीं कर सकती कि हमारे पीएम उस शख्स के साथ गले मिल रहे हैं जो मसूद अजहर को अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी घोषित करने के प्रयासों का विरोध कर रहा हो.

कुल मिलाकर पुलवामा हमले के बाद जनभावना की जिस लहर पर भाजपा और मोदी सरकार सवार हुई है, यदि उसे किनारे तक लाने में पार्टी सफल हुई तो जनादेश मोदी सरकार के साथ होगा, नहीं तो फिर यह लहर सरकार और भाजपा के लिए वह भंवर साबित हो सकती है जिसका इंतजार विपक्ष भी कर रहा है.

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