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अलग है इस बार का अमेरिकी आंदोलन

जॉर्ज फ्लॉयड की जघन्य हत्या, जिनकी गर्दन को पुलिसवाला अपने घुटनों से तकरीबन नौ मिनट तब दबाए रहा और वे सांस न ले पाने की गुहार लगाते रहे, वहां जुट आई भीड़ भी उनकी जान बचाने को चीखती-चिल्लाती रही.

ब्रेंडन ओ’फ्लाहर्टी राजीव सेठी ब्रेंडन ओ’फ्लाहर्टी राजीव सेठी

अमेरिका के महान लेखक जेम्स बाल्डविन ने 1966 में अपने एक लेख में अश्वेत बस्तियों के बारे में लिखा था कि उन्हें ऐसे ''नियंत्रित किया जाता है जैसे वे कब्जाए गए इलाके’’ हों. अब चूंकि पुलिस को मालूम होता है कि उनसे नफरत की जाती है, ऐसे में बाल्डविन ने लिखा, ‘‘वे हमेशा डरे रहते हैं. क्रूरता का इससे अचूक फॉर्मूला कोई शायद ही तलाश पाए.’’

अमेरिका में उसके बाद से काफी कुछ बदल गया है लेकिन क्रूरता की अनकही दास्तान अक्सर उभर ही आती है. उसकी ताजा किस्त है जॉर्ज फ्लॉयड की जघन्य हत्या, जिनकी गर्दन को पुलिसवाला अपने घुटनों से तकरीबन नौ मिनट तब दबाए रहा और वे सांस न ले पाने की गुहार लगाते रहे, वहां जुट आई भीड़ भी उनकी जान बचाने को चीखती-चिल्लाती रही.

ऐसे अत्याचारों के खिलाफ पहले भी विरोध प्रदर्शन होते आए हैं, और आखिरकार मसला शांत होकर सामान्य स्थितियां बहाल हो जाती रही हैं. पर इस बार कुछ अलग-सा लगता है. अमेरिका में ऐसी उथल-पुथल दशकों से नहीं देखी गई है. लाखों लोग बड़े शहरों और छोटे कस्बों में सड़कों पर निकल आए. नारा लगाते, गाना गाते, सड़कों पर घुटनों के बल झुके वे यही मांग कर रहे हैं कि अब पुलिसिया क्रूरता और उत्पीडऩ खत्म हो. कुछेक मामलों में पुलिस अधिकारी भी उनके साथ हो लिए और उनके साथ घुटनों के बल झुक गए.

लेकिन दूसरी जगहों पर पुलिस और फौज की टुकडिय़ां उतनी ही क्रूरता और आक्रामकता से पेश आईं, जगह-जगह खड़े वाहनों के चक्कों को तोड़ दिया, पत्रकारों पर टूट पड़े, प्रदर्शनकारियों पर लाठी-डंडे बरसाए, रबड़ की गोलियों और रासायनिक द्रव्यों की बरसात की, हेलिकॉप्टरों की नीची उड़ान के जरिए उन्हें तितर-बितर करने, यहां तक कि उन पर गाडिय़ां चढ़ा देने की कोशिश की. कम से कम एक व्यक्ति पुलिस की कथित तौर पर आत्मरक्षा में चलाई गोली से मारा गया. ज्यादातर प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहे, कई में तो उत्सव जैसा माहौल था, कुछेक तत्वों ने इस अराजकता का फायदा उठाकर लूट-खसोट, तोड़-फोड़, आगजनी वगैरह भी की. पुलिस ने इसे ही सख्त जवाबी कार्रवाई का बहाना बनाया.

यह सब कुछ महामारी के उस दौर में हुआ, जब अमेरिका में इससे एक लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं और ऐसी आर्थिक बदहाली हुई है, जो महा मंदी के दौर के बाद देखी नहीं गई. पिछले दस हफ्तों में 4 करोड़ से ज्यादा अमेरिकी बेरोजगारी बीमा के शुरुआती दावे ठोक चुके हैं. देश में वस्तुओं का उत्पादन और सेवाएं दूसरी तिमाही में 12 फीसद तक नीचे जा पहुंचने का अंदेशा है, यानी उत्पादन के मद में 2.5 खरब डॉलर की गिरावट. यूं तो महामारी और आर्थिक बदहाली का असर सभी तबकों पर पड़ा है लेकिन मौत और रोजगार जाने की चोट अपेक्षाकृत उन पर ज्यादा पड़ी है, जो पहले ही निचले पायदान पर हैं.

विभिन्न ताकतों के एक दिशा में आगे बढऩे के साथ ऐसा लगता है कि हम शायद किसी स्थायी बदलाव की ओर कदम रख रहे हैं. कांग्रेस में डेमोक्रेट अत्यधिक बल प्रयोग पर पाबंदी लगाने और दंडित करने के प्रस्ताव आगे बढ़ा रहे हैं जबकि सेनेट में रिपब्लिकन सदस्य अपनी तरह का कानून बनाने की दिशा में बढ़ रहे हैं. ऐसा लगता है कि प्रदर्शनों के पक्ष में जन समर्थन विचारधारा और दलगत सीमाओं को तोड़ चुका है. 2012 में राष्ट्रपति पद के रिपब्लिकन उम्मीदवार रहे सेनेटर मिट रोमनी प्रदर्शनकारियों के साथ मार्च में शामिल हुए और ब्लैक लाइव्ज मैटर (अश्वेत जिंदगियों की अहमियत है) नारे का साथ दिया.

हालांकि अमेरिका में पुलिस व्यवस्था मोटे तौर पर स्थानीय उपक्रम होती है और देशभर में कानून पर अमल कराने वाली अलग-अलग तरह की 18,000 एजेंसियां हैं. इसी मोर्चे पर उत्पीडऩ और क्रूरता के खिलाफ लड़ाई लड़ी और जीती जाएगी. मिनियापोलिस सिटी काउंसिल ने अपने पूरे पुलिस बल को भंग करने के पक्ष में वोट दिया है. दूसरी जगहों पर भी ऐसी तेज मांग उठ रही है. कैमडन सिटी को दूसरों के लिए मिसाल की तरह पेश किया जा रहा है, जहां पुलिस बल को भंग करके पूरी तरह से नए बल का गठन किया गया है.

अमेरिकी आंदोलन की गूंज दुनिया भर में सुनाई पड़ रही है, लंदन से लेकर ऑकलैंड की सड़कें प्रदर्शनकारियों से भर गई हैं. वहां भी कब्जाए क्षेत्र जैसी बस्तियां हैं और लोग अपनी गर्दन पर घुटनों का बोझ महसूस करते हैं. भारत भी ऐसी स्थितियों से अलग नहीं है और ऐसा न सोचिए कि लोग सिर्फ दूर से देखते रहेंगे. यकीनन यह वक्त आत्मनिरीक्षण और सकारात्मक बदलाव का है.

ब्रेंडन ओ’फ्लाहर्टी कोलंबिया यूनिवर्सिरटी में और राजीव सेठी बर्नार्ड कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं; उनकी किताब शैडोज ऑफ डाउट: स्टीरियोटाइप्स, क्राइम ऐंड परसुइट ऑफ जस्टिस 2019 में हार्वर्ड यूनिर्सिटी प्रेस से छपी है.

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