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पुस्तक समीक्षाः लाजिमी था भावुक होना

गांधी की अहिंसा में साहस सबसे महत्वपूर्ण अवयव था. इस किताब ने मुझे सबसे पहले साहस दिया. भय नजदीक नहीं आया

उसने गांधी को क्यों मारा उसने गांधी को क्यों मारा

अशोक कुमार पांडेय

उसने गांधी को क्यों मारा का सवाल किसी भी संवेदनशील मनुष्य को बहुत भीतर तक मथने का सवाल है. खासतौर पर तब जब उनके हत्यारे ने कोर्ट में उनकी हत्या की वजहें बताते हुए जो लंबा बयान दिया है, उसे इस हद तक प्रचारित और प्रसारित किया गया है कि लोगों का एक हिस्सा उसे अंतिम सच की तरह स्वीकार करने लगा है. भारत के आधुनिक इतिहास को पढ़ते हुए उसके आरोपों का खोखलापन जैसे-जैसे स्पष्ट होता गया, इसे लिखने की जिद वैसे-वैसे मजबूत होती गई.

पता नहीं यह महज संयोग है या कुछ और कि गांधी हत्या पर आजतक हिंदी में कोई किताब लिखने की जरूरत किसी को महसूस नहीं हुई, जबकि हिंदी क्षेत्र में गोडसे का वह बयान अलग-अलग दसियों रूप में छापा है. अंग्रेजी में भी कुल दो-तीन किताबें ही हैं इस विषय पर. सबसे ज्यादा चर्चित मनोहर मालगांवकर की किताब है तो बहुत रोचक लेकिन उसका असल उद्देश्य कपूर आयोग की रिपोर्ट में गांधी-हत्या के षड्यंत्रकारी के रूप में सावरकर का नाम आने के बाद उन्हें निर्दोष साबित करना था.

तुषार गांधी की हजारेक पन्नों की किताब लेट्स किल गांधी हिंदी के पाठकों के कितने काम आई, कह पाना मुश्किल है. ऐसे में एक नई किताब लिखना चुनौती तो थी ही, लेकिन हिंदी जगत से अपने परिचय के कारण मुझे इसकी जरूरत पर भरोसा था और जिस तरह का स्वागत हुआ है इसका, उसने इस भरोसे को सही साबित किया.

उस दौर से गुजरना आसान नहीं होता. कपूर आयोग की रिपोर्ट, गांधी हत्या के आर्काइव और न्यायालय के दस्तावेज पढ़ते कितनी ही रातें भयावह उद्विग्नता में गुजरीं. ऐसा लगता था काश! इस मोड़ पर होता और उस हत्या को रोक देता. कुछ बेहद आसान सावधानियों से उस कीमती जान को बचाया जा सकता था.

कितने ही लोगों के लिखे/कहे से गुजरते हुए लगा कि जितना कुछ है इन कागजों में, षड्यंत्र उससे अधिक गहरा तो नहीं? एक पुलिस अधिकारी जिसे जरूरी कागजात लेकर जाने हैं, वह दिल्ली से बंबई पहुंचने में 48 घंटे लगा देता है. एक मुख्यमंत्री और उसके गृह मंत्री एक बेहद महत्वपूर्ण सूचना को लेकर एकदम लापरवाही से व्यवहार करते हैं.

कोर्ट में एक सवाल का जवाब देने की जगह मोरारजी देसाई सावरकर के वकील से कहते हैं कि पहले सावरकर से पूछ लीजिए कि क्या वे चाहते हैं कि मैं जवाब दूं! जब मैंने आर्काइव और कपूर कमिशन की रिपोर्ट देखने के बाद मोरारजी की जीवनी खंगालनी शुरू की तो समझ आया कि अगर उस दौर में बंबई प्रांत में गृह मंत्री मोरारजी ने वकील से पूछने की जगह कोर्ट को बता दिया होता कि सावरकर के खिलाफ कार्यवाही की असली वजह उनके सचिव और अंगरक्षक की गवाही में सामने आई>

यह बात थी कि गोडसे और आप्टे गांधी हत्या के लिए निकलने से पहले दोनों बार उनसे मिले थे तो सावरकर गांधी हत्या में आरोप से कतई बरी नहीं हो सकते थे. आखिर वे गवाहियां कोर्ट में पेश क्यों नहीं की गईं? आश्चर्य है कि प्रदेश से लेकर देश तक की सत्ता में गांधीवादियों के रहते यह हुआ.

ऐसे अनेक प्रसंगों को पढ़ते हुए जाने क्यों ऐसा लगता है कि कुछ लोग सच और पूरे षड्यंत्र को सामने लाने की जगह चाहते थे कि बस सामने दिख रहे हत्यारों को सजा हो और बाकी सब पर पर्दा पड़ जाए. कपूर आयोग की रिपोर्ट पढ़ते हुए तो यह भरोसा और मजबूत होता जाता है. विडंबना ही है कि वह रिपोर्ट भी कहीं धूल खा रही है और लोक परिवृत्त में उसकी चर्चा शायद ही कभी सुनाई देती है.

यही नहीं, राष्ट्रपिता के हत्यारे को नौ घंटे तक भाषण देने की अनुमति दो बार दी जाती है और फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर उसके झूठ पर लगा प्रतिबंध हटा दिया जाता है! उसका झूठ घर-घर में पहुंचता है. हत्यारा हीरो बनता जाता है. संसद और विधानसभाओं में उसके प्रशंसक दिखाई पड़ने लगते हैं.

जिस आदमी ने आखिरी दम तक विभाजन का विरोध किया, उसे विभाजन के लिए कठघरे में खड़ा किया जाता है और जो लोग आजादी की लड़ाई से बाहर रहकर हिंदू-मुसलमान के बीच खाइयां गहरी करने में अंग्रेजों की मदद करते रहे, उन्हें नायक बनाने की कोशिशें होती रहीं. दुखद था मेरे लिए यह जानना कि खुद को गांधी का वारिस बताने वालों ने अपने को समाज से इस कदर काट लिया कि उन्हें गोडसे के आधारहीन आरोपों के सीधे जवाब देने की कभी जरूरत ही महसूस नहीं हुई.

वह पीड़ा ही थी शायद कि इस किताब की भाषा जगह-जगह भावुक हुई है. वह पीड़ा ही थी जिसने कोविड संक्रमण के समय भी लिखना रुकने नहीं दिया. वह पीड़ा ही थी कि भय नजदीक नहीं आया. गांधी की अहिंसा में साहस सबसे महत्वपूर्ण अवयव था. इस किताब ने मुझे सबसे पहले साहस दिया—एक लेखक का निर्भय सच कहने का साहस. या यों कहें, जो मैं कर रहा था अब तक उसे एक नैतिक आधार दिया. इसीलिए लेखन अब मेरे लिए एक अहिंसक सत्याग्रह था.

गांधी की हत्या रोकने में हम असफल रहे. सत्य की रक्षा में सफल हो पाए तो यह देश बचेगा. देश बचा तो बचेगा वह सपना जो हमारे पुरखों ने देखा था. सपना जिसे टैगोर ने शब्द दिए थे—हो चित्त जहां भय-शून्य, माथ हो उन्नत. 

किताबः उसने गांधी को क्यों मारा
लेखक:
अशोक कुमार पांडेय
प्रकाशकः राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 
कीमत: 299 रुपए

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