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किताबेंः यात्रा का आनंद

असगर वजाहत के यात्रा आख्यान उनकी रचनाशीलता की उपलब्धि कहे जाएंगे. अपनी नयी पुस्तक उम्र भर सफर में रहा में वे दुनिया के अनेक देशों और भारत के कुछ अनजाने प्रदेशों में ले जाते हैं. इस किताब में उनके कुछ अनोखे प्रयोग भी हैं. जैसे अमेरिकी यात्रा के अनुभवों पर उन्होंने दो कहानियां लिखी थीं.

उम्र भर सफर में रहा उम्र भर सफर में रहा

पल्लव  

कथेतर लेखन का पाठकों ने जैसा स्वागत किया है यह उसी का सुफल है कि संस्मरण, यात्रा आख्यान, जीवनी और डायरी जैसी हाशिये की मानी गई विधाओं में नया उत्साह देखने को मिल रहा है. इन विधाओं का सबसे बड़ा गुण यह है कि यथार्थ के फार्मूलाबद्ध ढांचे से बाहर जीवन की अंतरंगता रचनाओं में चित्रित होती है. यात्रा आख्यान इन सबमें विशिष्ट हैं और कठिन भी.

सूचना माध्यमों की सर्वसुलभता से अब लेखक के लिए चुनौती यह है कि किसी स्थान के संबंध में वह क्या लिखे जो पाठक नहीं जानता, जाहिर है वह कोई हृदयस्पर्शी मौलिक अनुभव ही होगा जो रचना को भी विशिष्ट बनाए. इधर आए तीन यात्रा आख्यान उम्र भर सफर में रहा, एक सड़क एक जगह और नील के आर पार सचमुच विशिष्ट बन पड़े हैं तो इसका कारण स्थानों की नवीनता न होकर विशिष्ट जीवनानुभव हैं जो इन यात्राओं से उपजे हैं.

असगर वजाहत के यात्रा आख्यान उनकी रचनाशीलता की उपलब्धि कहे जाएंगे. अपनी नयी पुस्तक उम्र भर सफर में रहा में वे दुनिया के अनेक देशों और भारत के कुछ अनजाने प्रदेशों में ले जाते हैं. शुरुआत सत्तर के दशक की अमेरिका यात्रा से होती है जिसके कुछ विवरण दिनमान में छपे थे. उन विवरणों को वजाहत ने यहां नई भूमिकाओं के साथ पेश किया है. फिर ईरान और पाकिस्तान के लंबे सफरनामे हैं तो आगे आजरबाईजान, जॉर्डन, मारामरोश, बल्गारिया, मैक्सिको सहित भारत के अंडमान-निकोबार, मिजोरम, शिमोगा, लेह और बंगाल यात्राओं के आख्यान भी.

असगर वजाहत अपनी यात्राओं को सोशल टुरिज्म कहते हैं और इमारतों की जगह लोगों के जीवन को देखना ज्यादा पसंद करते हैं. इस किताब में उनके कुछ अनोखे प्रयोग भी हैं. जैसे अमेरिकी यात्रा के अनुभवों पर उन्होंने दो कहानियां लिखी थीं. यहां उस यात्रा के बारे में विस्तार से बताते हुए वे दोनों कहानियां भी पढ़ने का अवसर देते हैं. फिर आगे वे प्रसंग भी हैं जो दिनमान के कुछ अंकों में धारावाहिक छपे थे.

उनकी ईरान और पाकिस्तान यात्राओं पर हिंदी में खूब चर्चा हुई है और इन यात्रा आख्यानों के बाद ही इस विधा में नयी हलचल हुई. इधर के दिनों में वजाहत ने बल्गारिया यात्रा पर लिखा है जिसे इस पुस्तक में पढ़ा जा सकता है. अनोखा प्रयोग यह है कि वे बल्गारिया में एक ऐसी ग्रामीण महिला के घर तीन चार दिन मेहमान बनते हैं जो सिर्फ बल्गेरियन भाषा ही जानती थी और वजाहत को बल्गेरियन नहीं मालूम. अब देखिये मजा: ‘‘पाली के साथ गांव घूमने निकले.

उनके मकान के बराबर वाला मकान खंडहर हो गया है. वे उस मकान के सामने रुक गईं. गांव घुमाने के उत्साह में पाली यह भूल चुकी थीं कि मैं बुल्गेरियन नहीं जानता. उन्होंने काफी विस्तार से बुल्गेरियन भाषा में उस मकान के खंडहर होने की कहानी मुझे सुनाई. मैं इस तरह गर्दन हिलाता रहा जैसे पूरी तरह सारी बातें मेरी समझ में आ रही हैं. मैं पाली के इस विश्वास को तोडऩा नहीं चाहता था कि मैं बुल्गेरियन नहीं समझता.

जो कुछ समझ पाया वह इतना था कि इस मकान में रहने वाले कहीं और चले गए हैं और मकान की देखरेख न हो पाने के कारण वह खंडहर हो गया है.’’ असगर वजाहत स्थानों की सुंदरता और इमारतों के इतिहास से अभिभूत होकर रह जाने वाले यात्री नहीं. वे जीवन की साधारणता का अनदेखा जादू तलाश करते हैं. इस किताब में उन्होंने यात्रा, घुमक्कड़ी और पर्यटन का अंतर करने का आग्रह किया है और सोशल टूरिज्म का अर्थ भी बताया है.

मंगलेश डबराल को हिंदी पाठक उनकी कविताओं के कारण पसंद करते हैं. लगभग पच्चीस साल पहले उनका यात्रा आख्यान छपा था एक बार आयोवा (1996), जो 1991 की उनकी अमेरिका यात्रा पर केंद्रित था. उनकी नयी यात्रा पुस्तक एक सड़क एक जगह में रोतरडम, आइस्लिंगेन, उल्म, ज्यूरिख, पेरिस, लाइपजिग, आयोवा, क्योतो, हरसिल और अंडमान की यात्राओं पर लिखे गए ये संस्मरण पढ़े जा सकते हैं.

इन्हें सच्चे अर्थों में कवि का गद्य कहना चाहिए जिसमें दुनियावी चिंताओं के बरअक्स कवि अपने संसार में भी खोया हुआ है. आमतौर पर ये संस्मरण डबराल को कविता पाठ के लिए आमंत्रित किए जाने वाले प्रसंगों से उपजे हैं, तब भी जगहों और लोगों के जीवन में कवि की दिलचस्पियां पाठकों के लिए भी कम रोचक नहीं.

नीदरलैंड के एक शहर रोतरडम को देखते हुए डबराल ने लिखा है, ''शहर चमत्कृत करते हैं. उनकी तेज धुंधली तीखी थरथराती धरती की ओर जाती हुई रोशनियां मनुष्य को आवेग और उत्तेजना से भर देती हैं. उनसे होकर बहती हुई हवाएं कभी खामोश और कभी तेज उन रोशनियों को कंपाती रहती हैं और उनके नीचे एक सभ्यता सांस लेती हुई दिखती है...शहर सभ्यताओं के प्रकाश स्तम्भ हैं.’’

मंगलेश यूरोप और अमेरिका के शहरों में वहां के स्थापत्य और समृद्धि को देखते हुए लोगों की जिंदगियों को टटोलना नहीं भूलते. वे कहीं प्रेमियों के लगाए ताले देखते हैं तो घुप्प अंधेरे वाले रेस्त्रां में शाम भी बिताते हैं. जापान यात्रा में उनका अनुभव है, ‘‘हम सब कुछ-कुछ हाइकू के सम्मोहन में हैं. हमारा कद भी कुछ कम हो गया है.’’ इसी तरह हरसिल का संस्मरण उनके निजी स्पर्श से रंगा है.

वे लिखते हैं, प्रभाष जोशी जब पहाड़ में उनके गांव गए, उनके पिता से मिले और पूछा कि आपको मंगलेश ने अपना नया संग्रह घर का रास्ता भेजा है तो उन्होंने हाथ में संग्रह लेकर कहा कि उसने संग्रह मुझे समर्पित किया है और खुद घर का रास्ता भूल गया है. यहां अंत में डबराल ने लिखा है, ‘‘हरसिल का जादू बीहड़ चट्टानों और घने पेड़ों से भरे रास्ते को पार करने के बाद अकस्मात एक आश्चर्य की तरह प्रकट होने में है.’’ पुस्तक का एक रोचक पक्ष है हर संस्मरण के साथ एक कविता, जो किसी विश्व प्रसिद्ध या भारतीय कवि की है. 

हरिसुमन बिष्ट अपने उपन्यासों के लिए चर्चित रहे हैं. उत्तराखंड के जीवन अनुभवों पर केंद्रित उनके लेखन का नया पक्ष यात्रा वृत्तांत है जिनका संग्रह नील के आर-पार इस विधा में उनकी रुचि को दर्शाता है. उन्होंने विश्व हिंदी सम्मेलन के लिए जोहानिसबर्ग की यात्रा की तो मिस्र के काहिरा और यूनान के भी कुछ शहरों को देखा. वे बचपन में पढ़े उपन्यास बाबर से अभिभूत होकर कथानायक की खोज में ताशकंद जाते हैं तो भारत के छत्तीसगढ़ के देवपहरी और मैनपाट जैसे अल्पख्यात स्थानों पर भी. हिमालय की वादियों में बसे कौसानी का वृत्तांत भी यहां है.

बावजूद पुस्तक में उन्होंने एकाधिक बार लिखा है कि हिमालय ने उन्हें कभी आकृष्ट नहीं किया. कौसानी पर लिखा गया वृत्तांत उनके कथाकार स्वभाव का सुंदर उदाहरण बन गया है. ताशकंद पर लिखे वृत्तांत में उज्बेकिस्तान के रीति-रिवाजों का बढिय़ा चित्रण हुआ है. यात्रा पर बिष्ट की पहली किताब इस विधा में संभावना पैदा करने पर भी वृत्तांत ही है.

वस्तुत: ये किताबें उदाहरण है कि युवा होती नयी सदी में हिंदी गद्य पारंपरिक खांचों से निकलने के लिए किस तरह की तैयारी कर रहा है और विधाओं की अंतक्रिया किन नयी संभावनाओं की आहट दे रही है.

—पल्लव


उम्र भर सफर में रहा
अस़गर वजाहत
अनन्य प्रकाशन, दिल्ली 

कीमत: 850 रुपए

 

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