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पुस्तक समीक्षाः कविता की तरक्की

व्योमेश इन टिप्पणियों में बात को आसान की तुलना में सटीक ढंग से कहने की कोशिश करते हैं. उनके पास अच्छी प्रेक्षकीय निगाह है.

कठिन का अखाड़ेबाज कठिन का अखाड़ेबाज

संगम पांडेय

कठिन का अखाड़ेबाज भिन्न-भिन्न समयों पर साहित्य-संस्कृतियों के विषयों पर लिखी गई व्योमेश शुक्ल की टिप्पणियों का संग्रह है. इनमें यूं तो बिस्मिल्ला खां, किशन महाराज से लेकर बनारस की रामलीला तक कई तरह के विषय शामिल हैं, पर पुस्तक का ज्यादातर हिस्सा समकालीन आधुनिक कविता पर एकाग्र है, जिनमें निराला, शमशेर से लेकर कुंवर नारायण, अशोक वाजपेयी, असद जैदी तक शामिल हैं.

आज की कविता यद्यपि बेहद छोटे-से दायरे की चीज रह गई है, पर उसके वैश्विक, राजनैतिक चिंताओं वाले साठोत्तरी तेवर अभी भी बदस्तूर हैं. जैसे कभी फिलिस्तीन हुआ करता था, उसी तरह अब हिंदूवादी सांप्रदायिकता इसका अहम मुद्दा है. इसमें इतनी तरक्की हुई है कि पॉलिटिकल एजेंडा अब राजनैतिक पार्टियों का नाम लेने तक प्रत्यक्ष हो चुका है.

इसलिए असद जैदी अपनी एक कविता में कभी अनिवेदित रहे प्रेम की याद में अब उम्रदराज हो चुकी आभासी प्रेमिकाओं से बीजेपी के विरोध की एक लाचार उम्मीद करते हैं कि अगर वोट डालने निकल ही पड़ी हो/ तो कहीं भूलकर भी न लगा देना/ उस फूल पर निशान. व्योमेश इसे 'प्रेम निवेदन की भाषा में’ 'सबसे बड़े खतरे का दमन कर डालने की चुनौती’ कहते हैं.

ये है हिंदी कविता की बौद्धिक भावुकता और ये है उसका आलोचनात्मक रेटॉरिक. कविता जैसी विधा से अमूमन यह उम्मीद नहीं की जाती कि वह यह विश्लेषण करे कि कोई भी सांप्रदायिकता क्यों पैदा हो जाती है, पर कवि इसका अंदाजा तो लगा ही सकता है. इसलिए एक अन्य कविता में असद जैदी कहते हैं, प्रतिक्रियावाद की इस बाढ़ का राज/ कुछ इस जमीन में है/ कुछ बुजुर्गों के कारनामों में. व्योमेश का अंदाजा है ये बुजुर्ग जरूर विभाजन पर मुहर लगाने वाले कांग्रेसी और मुस्लिम लीगी हैं. इस तरह व्योमेश एक ज्वलंत राजनैतिक मुबाहसे की थाह लेने की कोशिश करते हैं.

पुराने ढंग के आलोचक होते तो 'प्रतिक्रियावाद’ जैसे अकाव्यात्मक शब्द पर बवाल मचा देते, लेकिन व्योमेश तो कविता में कहानी कहने वाले विष्णु खरे जैसे 'असाधारण शिल्पकार’ के आलोचकों की भी उनकी 'वैचारिक और कलात्मक गरीबी’ के लिए मलामत करते हैं. खरे की कविता को अभिधा घोषित करने को वे ‘सहजबोध का निरादर’ कहते हैं.

इसी तरह कुंवर नारायण के बारे में उनकी राय है कि आज के भीषण वक्त में वे नैतिकता का जोखिम लेते हैं, जाहिर है इसमें एक हल्की उपदेशात्मकता तो होगी ही. फिर भी कुंवर जी द्वारा आज की कविता को बोधगम्य न होने की वजह से अतिबौद्धिक कहना कोई तुक की बात नहीं. पूछना यह चाहिए कि बार-बार गालिब का उदाहरण देने के बावजूद आज के कविगण खुद गूढ़ या जटिल बातों को आसान भाषा में क्यों नहीं कह पाते.

इसका वास्तविक जवाब होगा कि हिंदी कवियों की पहुंच ही गूढ़ता तक नहीं है, लिहाजा उनकी कविताओं को अतिबौद्धिक मान लेना भी एक भ्रम ही है. वैसे खुद व्योमेश इन टिप्पणियों में बात को आसान की तुलना में सटीक ढंग से कहने की कोशिश करते हैं. जो चीज स्पष्ट है वह यह कि उनके पास एक अच्छी प्रेक्षकीय निगाह है.

—संगम पांडेय

किताबः कठिन का अखाड़ेबाज
लेखक: व्योमेश शुक्ल
प्रकाशनः राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली 
कीमत: 250 रुपए

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