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वैचारिक परिवार गढ़ा था पहल ने

हिंदी में प्रतिरोध की जो रचनाशीलता थी, उस धारा के जो लेखक थे, उन सबको मिलाकर उन्होंने एक कुटुंब जैसा बना दिया.

तथ्यों के आईने में पहल तथ्यों के आईने में पहल

अखिलेश

पहल पत्रिका/नजरिया

आखिरी अंक

तथ्यों के आईने में पहल
शुरुआत: 1 अगस्त, 1973
संपादक: ज्ञानरंजन
अंतिम अंक: अप्रैल 2021
कुल अंक निकले: 125

व्यवधान: नब्बे अंक निकलने के बाद 2009 में इसे बंद कर दिया गया था. पर दो-ढाई वर्ष बाद ज्ञानरंजन ने संपादन और दूसरी व्यवस्थाओं में कुछ नए लोगों से निरंतर सहयोग मिलने के भरोसे के बाद उन्हें टीम में जोड़कर इसे फिर शुरू किया. उसके बादी यानी उत्तरार्ध में इसके 35 अंक निकले इसने हिंदी के अलावा पंजाबी, मराठी, उर्दू, कश्मीरी और दूसरी भारतीय भाषाओं पर प्रामाणिक विशेषांक निकाले. चीनी, फ्रेंच, स्पेनिश, रूसी, जर्मन और अंग्रेजी भाषाओं की उम्दा रचनाओं से इसने हिंदी के पाठकों को समृद्ध किया

पहल जैसी महत्वपूर्ण पत्रिका का बंद होना सचमुच तकलीफदेह है. सामान्य तौर पर कोई पत्रिका बंद होती है तो लगता है कि कोई दूसरी आकर उसकी जगह ले लेगी, उसमें रिक्ति का बोध उतना नहीं होता. लेकिन पहल के बंद होने से महसूस होता है कि साहित्यिक परिदृश्य पर एक बड़ी रिक्ति उपस्थित हो जाएगी. पहल के बगैर साहित्यिक दुनिया की बात नहीं हो सकती.

पर मेरा मानना है कि इसका शोक मनाने की बजाय एक ऐसी कोशिश हो कि जो जीवंतता हिंदी साहित्य की है, जो बेहतरीन रचनाशीलता है उसको सामने लाने के लिए अच्छे-अच्छे मंच बनें, अच्छी तैयारी के साथ काम किया जाए. यही पहल के साथ उपयुक्त सहभागिता होगी. उसका सम्मान अगर करना है तो इसी तरह किया जाना चाहिए.

पहल के बंद होने के बाद जहां तक उसके आकलन की बात है, उसकी भूमिका की समीक्षा की बात है तो एक यही कि अच्छी पत्रिका के रूप में तो उसकी उपस्थिति सदैव रही. दूसरे, वैचारिक खलबली से भरी हुई जो रचनाशीलता थी, उसको वह समानांतर ढंग से एकजुट भी करती रही.

मैं पहल के दूसरे दौर की बात नहीं कर रहा, जब यह बंद होकर फिर से शुरू हुई. अगस्त 1973 में पहल की शुरुआत से लेकर एक चौथाई सदी तक वह शिखर साहित्यिक पत्रिका के रूप में स्थापित थी, इस अवधि में वैचारिक हलचल भरे समाज में उसने एक परिवार जैसा भाव पैदा किया.

पहल एक ऐसे समय में निकली थी जब हिंदी समाज में एक वैकल्पिक समाजवादी समाज का स्वप्न बड़ा जीवंत था. उसमें सब लोगों ने पहल को एक आंदोलन की तरह लिया. कोई उसके मेंबर बना रहा है, कोई कहीं दूरदराज से विज्ञापन ला रहा है. तो यह एक बड़ा सामूहिक प्रयास था पहल का.

पत्रिकाएं तो बहुत-से लोग निकालते हैं लेकिन वह ज्ञानरंजन के व्यक्तित्व का ही करिश्मा था जिसने बेहतर समाज का सपना पाले, देश के नए-पुराने ऐसे तमाम लिखने वालों को एक धागे में पिरोकर एक बड़ा परिवार बनाया. हिंदी में प्रतिरोध की जो रचनाशीलता थी, उस धारा के जो लेखक थे, उन सबको मिलाकर उन्होंने एक कुटुंब जैसा बना दिया.

पहल के अवदान की चर्चा करते वक्त इस पहलू को ध्यान में रखना पड़ेगा. पत्रिकाएं निकलती रहेंगी, बहुत अच्छी भी निकलेंगी, उनका भी अवसान हो जाएगा, लेकिन ज्ञानरंजनजी ने एक दौर में यह जो काम किया वह अविस्मरणीय है, उसको भी रेखांकित किया जाना चाहिए.

पहल के आकर्षण और उसके प्रति दीवानगी को इससे समझा जा सकता है कि जब हमारी पीढ़ी युवा थी, तब हम बड़े अधैर्य से उसके प्रत्येक अंक की प्रतीक्षा करते थे और उसकी प्रति आते ही उसे सबसे पहले छूने, पढऩे और उस पर चर्चा करने की होड़ शुरू हो जाती थी.

जब हम बड़े हुए तब भी हमारे वैचारिक, संवेदनात्मक जीवन में पहल ऊर्जा के स्रोत के रूप में बरकरार रही. अनेक बार मैं इस सवाल से रूबरू हुआ हूं कि मैं भी एक पत्रिका निकालता हूं और कथाकार भी हूं, तो मेरे उनसे कैसे संबंध रहें? बेशक वे मेरे हीरो की तरह रहे हैं. मैं उनकी कहानियों का प्रशंसक रहा हूं तो संपादन के इलाके में जिन उस्तादों ने इस कला के हुनर सिखाए उनमें ज्ञानजी बेहद खास हैं.

किसी लेखक की श्रेष्ठ रचना अंतत: अपने रचनाकार से मुक्त होकर स्वतंत्र रूप से अपनी अर्थव‌त्ता साबित करती है; पहल भी ज्ञानरंजन का कई हजार पृष्ठों तक फैला एक कृतित्व है. जो अपने संपादक से विमुक्त होने के बाद भी बहुत वक्त तक अपना महत्व सिद्ध करता रहेगा.

—कथाकार अखिलेश हिंदी की चर्चित साहित्यिक पत्रिका तद्भव के संपादक हैं
 

पहल और साहित्यिक पत्रिकाओं के बारे में ज्ञानरंजन के शब्द
(साहित्य वार्षिकी 2019-20 को दिए गए एक साक्षात्कार में)

जब मैंने संपादन की तरफ पैर बढ़ाए तब मैं ग्रांटा, पेरिस रिव्यू, कल्पना, निकष, एनकाउंटर, पोएट्री जैसी ऐतिहासिक पत्रिकाओं का सपना देख रहा था...

‘‘पहल की भूमिका एक छोटी-सी रौशनी है, जब तक वह हार-थक नहीं जाती.’’

''हिंदी में अधिकांश पत्रिकाएं एक-दूसरे जैसी हैं. उनके संपादकीय विचार और छपी सामग्री के बीच कोई साम्य नहीं है. उनमें आंचलिकता और क्षेत्रीयता भी काम करती है. स्थानीयता से भूमंडल की यात्रा ठप है. चूंकि कतार लगी है इसलिए सामग्री का अभाव नहीं रहता. दमदार और इंतजार की जाने वाली पत्रिकाओं का दौर समाप्त है.
 
पहल के बंद होने पर टिप्पणी
...पहल एक देह की तरह थी, जिसकी आयु भी है. यह आयु आ गई, इसको स्वीकार करते हैं... हम अमर नहीं थे और मर भी नहीं रहे हैं...हमारा ढांचा शिथिल पड़ रहा है क्योंकि यह महामारी जाने से इनकार कर रही है...हमारे कई साथी इसकी चपेट में चले गए. कुछ को वर्तमान अंधी सत्ता ने मौन और निष्क्रिय कर दिया. हम मुखौटे उतारते रहे और अब प्रतिदिन नए मुखौटे तैयार हो रहे हैं. ऐसे वक्त में हम आपसे विदा ले रहे हैं.

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