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किताबेंः संवेदना के साथ समाजशास्त्र

उपन्यास का बड़ा हिस्सा हिंदू शरणार्थियों की दुर्दशा पर केंद्रित है.

कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए  अलका सरावगी कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए  अलका सरावगी

दिनेश कुमार

हिंदी साहित्य के पाठक भारत विभाजन की ऐतिहासिक त्रासदी को प्राय: उन्हीं रचनाकारों के साहित्य से महसूस करते रहे हैं जो पाकिस्तान से पंजाब आए थे. स्वभाविक है कि उन रचनाओं का भूगोल पश्चिमी पाकिस्तान, पंजाब और उसके आस-पास का क्षेत्र रहा है. पश्चिमी बंगाल और पूर्वी पाकिस्तान का परिदृश्य अब तक हिंदी साहित्य में अनुपस्थित था. इस लिहाज से अलका सरावगी का उपन्यास कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए हिंदी साहित्य में एक बड़े अभाव की पूर्ति करने वाला उपन्यास है.

आजादी के समय नोआखली के दंगे, तीन साल बाद बरिसाल के दंगे और 17 साल बाद 1964 में कश्मीर के हजरतबल से मोहम्मद साहब की दाढ़ी के बाल के चोरी हो जाने के बाद भड़के दंगों के साथ-साथ मुक्तिवाहिनी के संघर्ष की पृष्ठभूमि में यह उपन्यास उन स्थितियों की बारीक पड़ताल करता है, जिसके कारण पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में हिंदुओं का पलायन हुआ.

विषयवस्तु ऐसी है कि थोड़ी-सी चूक होते ही वह हिंदू भावनाओं को उभारने वाला सांप्रदायिक खुराक बन जाता, लेकिन लेखिका की विरल कथा-दृष्टि ने तथ्यों को बिना तोड़े-मरोड़े और सच को कहते हुए भी उपन्यास को सांप्रदायिक परिणति से पूरी तरह बचा लिया है. ऐसा करना सामान्य रचनाकार के लिए संभव नहीं होता है. 

बड़े कुल-खानदान का होते हुए भी घोर उपेक्षित और गोपाल प्रसाद दास के रूप में अपनी पहचान छुपाकर जी रहे कुलभूषण जैन और श्यामा धोबी के निजी जीवन की कहानियों के माध्यम से उपन्यास का कथानक बुनते हुए लेखिका ने बड़ी-बड़ी राजनीतिक और समाजशास्त्रीय सचाइयों को हमारे सामने प्रस्तुत कर दिया है.

अभिजात पात्रों की जगह समाज के आखिरी पायदान पर खड़े दो पात्रों को केंद्रीय महत्व देते हुए उपन्यास का ताना-बाना बुनने से सांप्रदायिकता और विस्थापन का एक सबाल्टर्न विमर्श हमारे सामने आता है. उपन्यास घटनाओं को ऊपर से देखने की जगह 'नीचे से देखने’ को प्रस्तावित करता है. इसलिए उपन्यास पूर्वी पाकिस्तान में हिंदू विरोधी अभियान को सरलीकृत धार्मिक आयाम में देखने की जगह उसके विभिन्न आयामों को सामने लाता है. इसका मुख्य आयाम आर्थिक है.

हिंदू विरोधी हिंसा का असल उद्देश्य उनकी संपत्ति पर कब्जा करना है. उपन्यास में पूर्वी पाकिस्तान से हिंदुओं के पलायन का एक कारण सत्ता पर काबिज पाकिस्तानी हुक्मरानों का बंगालियों के प्रति नफरत को माना गया है. इसलिए हिंदुओं के प्रति हिंसा धीरे-धीरे बंगालियों के प्रति हिंसा में बदल गई. जो मुसलमान हिंदुओं को मार रहे थे वही अब बंगाली मुसलमानों को भी मार रहे थे.

उपन्यास का बड़ा हिस्सा हिंदू शरणार्थियों की दुर्दशा पर केंद्रित है. पूर्वी पाकिस्तान से आए हिंदुओं को बंगाल से बाहर दंडकारण्य (छत्तीसगढ़) में अमानवीय स्थितियों के बीच शरणार्थी कैंपों में रखने और फिर बसाने के प्रयासों का विस्तृत विवरण उपन्यास में है. शरणार्थियों की त्रासद स्थिति इस बात का प्रमाण है कि दूसरे देश के शरणार्थी को अंतत: शरणार्थी ही बनकर रहना पड़ता है. जिन्हें अपना समझकर वह आता है वे भी उसे स्वीकार करने से न सिर्फ इंकार करते हैं बल्कि दोयम दर्जे का व्यवहार भी करते हैं.

सांप्रदायिकता और विभाजन जैसे गंभीर समाजशास्त्रीय विषय को कथा में पिरोकर लेखिका ने जिस तरह से पेश किया है वह अद्भुत है. समाजशास्त्रीय ज्ञान और समझ को सीधे-सीधे प्रस्तुत करने की जगह उसे संवेदना में परिणत कर कैसे कथा में प्रस्तुत किया जाता है, यह इस उपन्यास से सीखना चाहिए. ठ्ठ

अन्य उल्लेखनीनय किताबें

कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए 
अलका सरावगी

वाणी प्रकाशन, दिल्ली 
कीमत: 199 रुपए

ठाकरे भाऊ: उद्धव, राज और उनकी सेनाओं की छाया 
धवल कुलकर्णी

राजकमल प्रकाशन, दिल्ली 
कीमत: 299 रुपए 

शिवसेना को अरसे तक कवर कर चुके मुंबई के पत्रकार धवल कुलकर्णी ने इस पार्टी और उसके संस्थापक कुल की कथा बड़े दिलचस्प अंदाज में लिखी है. ठाकरे परिवार का इतिहास, मराठी पहचान की तलाश, बाल ठाकरे का तेज उभार, राज-उद्वव का फेनोमेना और फिर टकराव. पर्याप्त द्ब्रयौरों और प्रमाणों के बावजूद साफ लिखावट और प्रभात रंजन का सहज अनुवाद इसे पठनीय बनाए रखते हैं.


मूर्ति चोर 
एस. विजय कुमार 

मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल 
कीमत: 299 रुपए

यह दरअसल प्राचीन मूर्तियों के तस्कर सुभाष कपूर की भारतीय मंदिरों से की जाने वाली लूट की दास्तान है. सिंगापुर में रहने वाले शिपिंग एक्सपर्ट विजय कुमार खुद इन मामलों की कानूनी पड़ताल में शामिल रहे हैं. इस लूट कथा के किरदारों और उनकी कार्यशैली का उन्होंने नितांत संवेदनशील ढंग से वर्णन किया है. हां, हिंदी अनुवाद की कृत्रिमता देखकर मुमकिन है आप मूल अंग्रेजी किताब तलाशें.

गो कोरोना गो 
अलका बरबेले

यश पब्लिकेशंस, दिल्ली 
कीमत: 150 रुपए

यह कोरोना पर तीसेक पन्नों की एक कॉमिक बुक है, जिसे पत्रकार-कॉमिक राइटर अलका बरबेले ने खासकर बच्चों को इस महामारी के प्रति जागरूक बनाने के लिए लिखा है. विलेन कोरोना, सुपर ह्यूमन वीरा और सूत्रधार-से 4-5 बच्चे. तमाम पहलुओं को समेटने के चक्कर में किस्सा थोड़ा कमजोर है पर चित्रांकन/संवाद चटख और चुस्त हैं.

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