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किताबेंः एक कवि से खरे संवाद

फ्रांसीसी लेखक मालरो की संस्मरणों की किताब का नाम ही ऐंटी मेमोयर है. विष्णु खरे मुझसे आठ साल बड़े थे पर हम दोनों हमउम्र दोस्त ज्यादा बन गए थे.

तुम्हें खोजने का खेल खेलते हुए तुम्हें खोजने का खेल खेलते हुए

विनोद भारद्वाज

फेसबुक ने लिखने की शैली, भाषा आदि पर अच्छा-खासा असर डाला है. डायरी, संस्मरण, आलोचना आदि ने एक नया और कभी-कभी प्यारा रूप ले लिया है. पंकज चतुर्वेदी ने पहले वीरेन डंगवाल पर अपनी यादों को इस नई शैली में लिखा और अब वे मंगलेश डबराल के असमय निधन के बाद उनकी यादों और कविताओं, विचारों पर अलग ढंग से लिख रहे हैं.

व्योमेश शुक्ल ने विष्णु खरे पर इसी ढंग से अपनी खास शैली में लिखा और फेसबुक पर उनकी यादें खासी चर्चित रहीं. मैंने खुद फेसबुक से ही अपनी नई किताब यादनामा की डायरीनुमा लॉकडाउन टिप्पणियां लिखीं जो ऐंटी मेमोयर शैली में थीं. फ्रांसीसी लेखक मालरो की संस्मरणों की किताब का नाम ही ऐंटी मेमोयर है. विष्णु खरे मुझसे आठ साल बड़े थे पर हम दोनों हमउम्र दोस्त ज्यादा बन गए थे. इसलिए व्योमेश की इन इकतालीस यादों को एक साथ पढऩा मेरे लिए एक अलग तरह का अनुभव है.

विष्णु खरे की पीढ़ी 1940 के आसपास जन्मी पीढ़ी है. चंद्रकांत देवताले, अशोक वाजपेयी, विनोद कुमार शुक्ल, प्रयाग शुक्ल आदि इस पीढ़ी के कुछ प्रमुख नाम हैं. देवताले उनके प्रिय थे और करीब भी. यह भी गौर करने की बात है कि बाद की पीढिय़ों ने (मंगलेश डबराल, असद ज़ैदी से ले कर व्योमेश तक) इस पीढ़ी के सम्मानित नामों में विष्णु खरे की कविताओं से सबसे अधिक संवाद और जिरह की है.

दरअसल उनकी अनेक कविताएं आज भी एक बिल्कुल नए नजरिए से जानी-जांची जा सकती हैं. व्योमेश के ये नोट्स उनकी अनेक कविताओं का असरदार और आत्मीय विश्लेषण करते हैं. वे विष्णु खरे की जीवनी, सोच और अपने ही सोच से जिरह को खूबसूरती से नोट्स का हिस्सा बना लेते हैं. देखने में यह किताब छोटी-सी है पर इसकी लगभग हर टिप्पणी में अनेक कविताओं पर कई सार्थक बातें उभरकर आती हैं.

मैं यहां सिर्फ दो कविताओं का जिक्र कर पाऊंगा. एक टेबिल कविता और दूसरी सिंगल विकेट सीरीज कविता. खास तौर पर टेबिल कविता जिसे खुद विष्णु खरे अपने परिवार का उपन्यास मानते थे. व्योमेश की छोटी-सी टीप इस कविता की ही नहीं, पिता से उनके जटिल रिश्तों की अद्भुत जांच-पड़ताल करती है. विष्णु खरे ने सोलह साल की उम्र से लिखना-छपना शुरू कर दिया था.

उनके स्कूल अध्यापक पिता का जब निधन हुआ तो खरे की उम्र अट्ठाईस साल की थी. व्योमेश को उन्होंने काफ्काई अंदाज में बताया, ‘‘मुझ पर पिता का बहुत आतंक था. जब तक मेरे पिता जिंदा रहे, लेखन के मोर्चे पर मैंने खुद को कैद में महसूस किया. मुझे यह भी लगता था कि अगर मेरे पिता दस-बीस साल जिंदा रह गए, तो मैं मर जाऊंगा. मैं कुछ लिख ही नहीं पाऊंगा.’’

इसे अगर एक ईमानदार और कुछ-कुछ डराने वाला कन्फेशन मान लिया जाए तो किसी जीवनीकार के लिए यह एक बहुत बड़ा चैप्टर साबित हो सकता है. पर जैसा हम सब जानते हैं, हिंदी के जीवनीकार किसी काम के नहीं हैं. वे जीवन के अंधेरे पक्ष से घबराते हैं.

विष्णु खरे ने क्रिकेट पर तीन कविताएं लिखी थीं. कवर ड्राइव को तो वे बाकायदा एक दिलचस्प ऐक्शन के साथ पढ़ते थे. सिंगल विकेट सीरीज पर व्योमेश ने अच्छा लिखा है. उन्होंने स्वीडिश फिल्मकार बर्गमान की कालजयी फिल्म द सेवेन्थ सील को याद किया है जिसमें नायक मौत के साथ शतरंज खेल रहा है. विष्णु खरे बैटिंग कर रहे हैं और मौत बॉलिंग कर रही है.

क्लीन बोल्ड होने के खतरे के साए में आप बल्लेबाजी करने के लिए मजबूर हैं. व्योमेश ने शोएब अख्तर का सही हवाला दिया है जो रनअप पर दौड़ते हुए मौत के फरिश्ते लगते थे. चॉकलेटी ब्रेट ली की जगह वे वेस्टइंडीज के जोएल गार्नर का नाम लेते तो बेहतर था.

विष्णु खरे के जीवित रहते मैंने एक बार उनकी काली जुबान का जिक्र किया था. शायद उन्हें पसंद भी न आया हो. पर उनकी काली जुबान के शहद को भी हम सब मित्र पहचान लेते थे. व्योमेश ने एक जगह उनकी गालियों की बात की है, कोमल कविता पर लिखते हुए. व्योमेश के अनुसार उनकी बौद्धिक संस्कृति गालियों की इजाजत नहीं देती थी.

पर किसी बहस में प्रतिपक्षी को नीचा दिखाने के लिए वे मूर्ख, मतिमंद, जाहिल, शोहदा, कायर आदि का धाराप्रवाह इस्तेमाल करते थे. पर व्योमेश यह भी जोड़ देते हैं कि ''लेकिन मेरा शक है कि उनके मन में गालियों के लिए एक अब्सेशन जरूर था, जो मध्य भारत के कस्बाई आदमी का एक चरित्र—लक्षण है.’’

विष्णु खरे को खोजने का यह खेल शतरंज की तरह है, पर व्योमेश का मुकाबला आसानी से बाजी न हारने वाले खिलाड़ी से है. जरूर पढ़ें इस किताब को.


तुम्हें खोजने का खेल खेलते हुए
व्योमेश शुक्ल 
वाणी प्रकाशन, दिल्ली 
कीमत: 199 रुपए
 

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