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किताबेंः शब्दों के कैनवस पर रफी

1924 में अमृतसर के एक छोटे-से गांव में जन्म से लेकर 1980 में बंबई में उनकी मृत्यु के बीच के कुल 56 बरसों के समय को खासी खोजबीन और शोध के बाद प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है.

मोहम्मद रफ़ी स्वयं ईश्वर की आवाज़ मोहम्मद रफ़ी स्वयं ईश्वर की आवाज़

देवेंद्र राज अंकुर

हमारे यहां फिल्मी दुनिया से जुड़े लोगों को लेकर बहुत कम लिखा गया है. कम-से-कम हिंदी में तो न के बराबर. और फिल्मों में गीत-संगीत की स्थिति और भी शोचनीय है. आज से पंद्रह बीस साल पहले पंकज राग ने धुनों की यात्रा शीर्षक से हिंदी फिल्मों में गाए गए गीतों का इतिहास लिखा था. तीन-चार साल पहले यतींद्र मिश्र ने लता सुरगाथा में लता मंगेशकर के संगीतमय जीवन का आकलन प्रस्तुत किया था.

पर इधर मोहम्मद रफ़ी: स्वयं ईश्वर की आवाज़ नाम की पुस्तक आई है, जो मूल रूप से अंग्रेजी में छपी थी. लेखक हैं मुंबई की फिल्मी दुनिया से जुड़े पत्रकार द्वय—राजू कोरती और धीरेंद्र जैन. इसका हिंदी अनुवाद किया है कवि और कला समीक्षक प्रयाग शुक्ल ने. यह पुस्तक एक बड़े गायक की जीवन गाथा और उनके समग्र काम का जबरदस्त मूल्यांकन है.

1924 में अमृतसर के एक छोटे-से गांव में जन्म से लेकर 1980 में बंबई में उनकी मृत्यु के बीच के कुल 56 बरसों के समय को खासी खोजबीन और शोध के बाद प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत किया गया है. उनकी जीवनयात्रा किसी सिलसिलेवार क्रम में नहीं दी गई है. इसके उलट उनकी जिंदगी में जितने गीतकार, संगीतकार, फिल्म निर्माता, निर्देशक और अभिनेता आए, उनसे साक्षात्कारों के दौरान मिली जानकारियों को संयोजित करने का प्रयास किया है लेखक द्वय ने.

क्या हम इससे पहले जानते थे कि इस महान गायक ने 243 संगीत निर्देशकों केलिए, 310 गीतकारों के लिखे 7,000 से ऊपर गाने गाए, उनके साथ 47 गायकों और 80 गायिकाओं ने जुगलबंदी की है. इस ऊंचाई तक पहुंचने के लिए उनकी मेहनत, लगन और साधना के साथ ही संगीतकार हुस्नलाल-भगतराम, नौशाद, शंकर-जयकिशन और खय्याम को भी श्रेय मिलना चाहिए, जिन्होंने उनको सिखाया, संवारा और इस ऊंचाई तक पहुंचाया.

इन्हीं उपब्धियों के बरअक्स कुछ अप्रिय प्रसंग भी हैं. मसलन, एक बार रिहर्सल में देर से आने पर ओ.पी. नैयर की रफ़ी से नाराजगी और बहुत दिनों तक साथ काम न करना. बाद में नैयर को खुद अफसोस हुआ और उन्होंने दुबारा रफ़ी को साथ लिया. पूरी पुस्तक ऐसे अंदाज में लिखी गई है कि वह मूल्यांकनपरक होने की बजाए लंबी कहानी या उपन्यास का सा मजा देती है.

नहीं मालूम कि इसे मूल अंग्रेजी में पढ़कर कैसा लगता लेकिन प्रयाग शुक्ल ने जैसा अनुवाद किया है, उसे पढ़कर लगता ही नहीं कि हम किसी कृति का अनुवाद पढ़ रहे हैं. यह जिज्ञासा सहज ही पैदा होती है कि जिन लोगों ने रफ़ी के गाए गीतों की पंक्तियों को रोमन लिपि में पढ़ा होगा उन्हें मूल भाषा का क्या मजा आया होगा? रफ़ी के प्रशंसकों केलिए यह एक जरूरी उपहार है.

मोहम्मद रफ़ी: स्वयं ईश्वर की आवाज़
लेखक:
राजू कोरती और धीरेंद्र जैन
अनुवाद: प्रयाग शुक्ल
नियोगी बुक्स, दिल्ली 
कीमत: 595 रुपए.

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