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किताबेंः चाहिए पूर्वाग्रह से परे एक दृष्टि

ये कहानियां आपस में मिलती भी हैं और कमोबेश एक दूसरे को प्रभावित भी करती हैं. प्रदीप सौरभ के लेखन की यह शैली अनूठी है.

ब्लाइंड स्ट्रीट ब्लाइंड स्ट्रीट

नरेश अरोड़ा

मुन्नी मोबाइल और तीसरी ताली जैसे चर्चित उपन्यासों के बाद प्रदीप सौरभ ने अपना नया उपन्यास ब्लाइंड स्ट्रीट दृष्टिबाधितों को केंद्र में रखकर लिखा है. हिंदी साहित्य में अभी विकलांग विमर्श लेखकों के एजेंडे पर नहीं है, और अंग्रेजी की कुछेक आत्मकथाओं को छोड़ दें तो विकलांगों ने भी इस पर कलम नहीं चलाई है. इसलिए यह उपन्यास अपने आप में एक नया और जोखिमभरा प्रयोग है.

यह उपन्यास किसी दृष्टिबाधित की जीवनी नहीं और न ही जीवनियों का समुच्चय है. यह नायक-नायिका वाला भी उपन्यास नहीं है. उपन्यास के परंपरागत ढांचे के विपरीत इसके सभी पात्र अलग-अलग पृष्ठभूमि, जीवन-संघर्षों और अपनी अलग-अलग मनोसामाजिक स्थितियों के साथ अलग-अलग कहानियां कहते हैं.

ये कहानियां आपस में मिलती भी हैं और कमोबेश एक दूसरे को प्रभावित भी करती हैं. प्रदीप सौरभ के लेखन की यह शैली अनूठी है. उपन्यास में कॉलेजों के प्राध्यापक, छात्र-छात्राएं, सरकारी कर्मचारी यहां तक कि भिखारी भी अपनी अस्मिता की लड़ाई के साथ मौजूद हैं. इतने व्यापक और वैविध्यपूर्ण समूह को एक उपन्यास में वर्णित करना चुनौतीपूर्ण और अभिनव प्रयोग है. तीसरी ताली की तरह ही यह भी एक सामुदायिक उपन्यास है.

हालांकि है यह फिक्शन लेकिन लेखक ने इसके लिए गहरा शोध और फील्ड वर्क किया है. शोध और दृष्टिबाधितों के जीवन में करीने से झांके बगैर इसकी रचना संभव नहीं थी. उपन्यास में शिक्षा और रोजगार के लिए दृष्टिबाधितों का आठवें दशक में किया गया आंदोलन, बिना स्पॉन्सरशिप के की गई दृष्टिबाधितों की 700 किलोमीटर की भारत पदयात्रा और दृष्टिहीन विद्यालयों की अमानवीय स्थितियों का चित्रण भी है

यह उपन्यास दृष्टिहीनों के ऐंद्रिय नृविज्ञान में भी उतरता है और उस जगत को पकड़ने की कोशिश करता है, जहां श्रवण, गंध, स्पर्श तथा स्वादादि के माध्यमज को दृष्टि के अभाव की भरपाई करते हुए ये लोग अपना अनुभव संसार रचते हैं. इसमें लेखक ऐसे दृष्टिबाधितों के लिए प्रयोग की जाने वाली स्पर्शनीय सांकेतिक भाषा की चर्चा करना भी नहीं भूलता जो सुन और बोल भी नहीं सकते.

एक पात्र के माध्यम से लेखक यह भी बताता है कि लेखन, छापेखाने और बाद के अविष्कारों ने दृष्टिबाधितों का जीवन किस तरह दुरूह कर दिया है. नतीजतन अन्य ऐंद्रिय अनुभवों को गौण समझा जाने लगा है. श्रुति परंपरा के खात्मे से सबसे ज्यादा दृष्टिबाधितों को ही नुक्सान हुआ है.

प्रदीप इस उपन्यास के पात्रों के माध्यम से यह आग्रहपूर्वक संदेश देते हैं कि दृष्टिबाधित न तो दया के पात्र हैं और न ही उपेक्षा के. वे न तो दिव्यांग हैं और न ही उनमें कोई देवत्व है. इसके विपरीत वे अमानुषिक भी नहीं. यह बात दीगर है कि समाज में अधिकांश दृष्टिहीनों को अक्सर सामान्य लोगों के अमानुषिक व्यवहार और टिप्पणियों से दो चार होना पड़ता है.

प्रदीप के सभी पात्र हाड़ मांस के सामान्य इनसान हैं, इसी समाज में पले, बड़े हुए और इसी समाज में रहते हुए अस्मिता और अस्तित्व के लिए जद्दोजहद करते हैं. उनके हर्ष-विषाद, महत्वाकांक्षाएं, कुंठाएं, पीड़ाएं और हर तरह के व्यवहार सामाजिक संपर्कों से ही बनते हैं. जेएनयू, जामिया और दिल्ली विश्वविद्यालय की समसामायिक घटनाएं प्रदीप सौरभ के पात्रों को प्रभावित करती हैं. देश में वर्तमान स्थितियों पर उनका भी एक नजरिया है. इस बात को भी उपन्यास सलीके से उठाता है.

दृष्टिहीनों के लिए चलने वाली सरकारी योजनाओं और स्वसयंसेवी संस्थाओं के अपने गोरखधंधे हैं, जो कुछ खास लोगों का हित साधते हैं. इस तथ्य का भी उपन्यास में खुलासा हुआ है. दृष्टिहीन भी मैत्री, प्रेम और रोमांस, सेक्स तथा समलैंगिकता आदि सारी नै‍सर्गिक इच्छाओं के साथ जीते हैं. आर्थिक तंगी और महंगाई भी उन्हें प्रभावित करती है

कुल मिलाकर प्रदीप सौरभ ने अत्यधिक संवेदनशीलता के साथ समाज के इस हिस्से को कलमबंद करने की बड़ी कोशिश की है. यह एक बड़ा और गंभीर प्रयोग है. यह बात दीगर है कि उपन्यास में अंधा शब्द का अत्यधिक प्रयोग दृष्टिबाधित पाठकों को शायद खटके. आशा है कि पाठक इसे बिना पूर्वाग्रह के पढ़ेंगे, दृष्टिबाधितों के प्रति अपने पूर्वाग्रहों को तोड़ेंगे और नए पूर्वाग्रह नहीं बनाएंगे.

लेखक दृष्टिबाधित हैं और दिल्ली के कमला नेहरू कॉलेज में इतिहास के सहायक प्रोफेसर हैं

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