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किताबेंः मानव इतिहास का प्रेरक पहलू

सभ्यता शांति और प्रगति का पर्याय तथा जंगली जीवन युद्ध और पतन का पर्याय बन गया. लेकिन ब्रेख़मान की राय अलग है.

ह्यूमनकाइंड: मानवजाति का आशावादी इतिहास ह्यूमनकाइंड: मानवजाति का आशावादी इतिहास

इस विषय पर बहुत विवाद रहा है, लेकिन मानव स्वभाव के बारे में ज्यादातर लोगों की एक जैसी राय है. वह यह कि मनुष्य बुनियादी तौर पर स्वार्थी होता है, और उसकी सारी गतिविधियां स्वार्थ से प्रेरित होती हैं. यह धारणा खासकर पश्चिमी सभ्यता में रच-बस गई है.

लेकिन रुत्ख़ेर ब्रेख़मान की ह्यूमनकाइंड: मानव-जाति का आशावादी इतिहास में इस धारणा को सिरे से खारिज करते हुए दलील दी गई है कि होमो सैपियंस ने सहयोग, प्यार, विश्वास के बूते क्रमिक विकास किया है, न कि प्रतिस्पर्धा, नफरत और अविश्वास के दम पर. दूसरों के बारे में खराब राय बनाकर हम अपनी राजनीति और अर्थव्यवस्था को भी खराब करते हैं.

चूंकि हम दूसरे लोगों को स्वार्थी, अविश्वसनीय और खतरनाक मानते हैं, लिहाजा उनसे व्यवहार के मामले में हमारा रवैया रक्षात्मक और संदेह से भरा होता है. सत्रहवीं सदी के दार्शनिक थॉमस हॉब्स की धारणा थी कि हमारे और हिंसक अराजकता के बीच कठोर राज्य व्यवस्था और सख्त नेतृत्व होता है. 

ब्रेख़मान का मानना है कि इससे हम मानव जाति के प्र‌ित नकारात्मक दृष्टिकोण अपना लेते हैं. इसी वजह से वे फ्रांसीसी दार्शनिक जियां-जाक्स रूसो की राय से सहमत नजर आते हैं. रूसो ने कहा था कि मनुष्य आजाद पैदा हुआ था और सभ्यता ने—अपनी ताकतों, सामाजिक वर्गों और प्रतिबंधात्मक कानूनों के जरिए—उसे बेडिय़ां पहना दीं. हॉब्स और रूसो मानव जाति की प्रकृति के बारे में बिल्कुल उलट राय रखते हैं तथा ब्रेख़मान फ्रांसीसी चिंतक के पक्ष में लगते हैं.

मनुष्य ने अपने इतिहास के ज्यादातर हिस्से को प्रकृति के साथ तालमेल के साथ बिताया. फिर उसने खेती का ढंग सीख लिया और उसके अगले दस हजार साल तक संपत्ति, जंग, लालच और अन्याय में डूब गया. ब्रेखमान का तर्क है कि घुमंतू जीवनशैली को छोड़कर जानवरों को पालने की वजह से खसरा, चेचक, तपेदिक, सिफिलिस, मलेरिया, हैजा और प्लेग जैसी संक्रामक बीमारियां आ गईं.

वैसे, कृषि के साथ रोगाणु ही नहीं, इनसानों की आबादी भी तेजी से बढऩे लगी. और जब आबादी बढ़ी तो चालीस-पचास लोगों के समूह वाले घुमंतू शिकारियों से काम नहीं चल सकता था क्योंकि हजारों की बस्तियों में आबाद सभी लोगों का पेट भरना था. इसके लिए कृषि और राजव्यवस्था के पेचीदा तंत्र पर निर्भरता बढ़ गई.

सभ्यता शांति और प्रगति का पर्याय तथा जंगली जीवन युद्ध और पतन का पर्याय बन गया. लेकिन ब्रेख़मान की राय अलग है. एक ओर जहां पारंपरिक इतिहास में सभ्यताओं के पतन को अंधकार युग माना गया है, वहीं आधुनिक विद्वान इसे एक तरह का ठहराव मानते हैं जिसमें गुलाम आजाद हो गए और संस्कृतियां फली-फूलीं. यह पूरी तरह सही नहीं हो लेकिन ब्रेख़मान की दलील में दम है.

ब्रेख़मान बहुआयामी शोध और जांच के जरिए बताते हैं कि मानव जाति कैसे अपने मूल स्वभाव की बदौलत बेहतर समाज तैयार कर सकता है. वे ब्रिटिश शिक्षक विलियम गोल्डिंग के उपन्यास द लॉर्ड ऑफ फ्लाइज का जिक्र करते हैं. गोल्डिंग का उपन्यास इस पाश्चात्य धारणा को मजबूत करता है कि इनसान स्वार्थी होता है.

लेकिन इसके बरअक्स ब्रेख़मान प्रशांत महासागर के टोंगा द्वीप के कुछ बच्चों की असली कहानी बताते हैं. ’60 के दशक में वे बच्चे समुद्र में भटककर एक निर्जन द्वीप अटा पर पहुंच गए, जहां उन्होंने परस्पर विश्वास तथा सहयोग के बूते जिंदगी की जंग जीत ली.

किताब का हर अध्याय विभिन्न अध्ययनों और केस स्टडी पर आधारित है, और लेखक किसी भी तरह से अपनी दलील से नहीं डिगते. वैसे, सबमें मुख्य ध्यान पुरुषों पर है. इसमें यह तो है कि करिश्माई मर्द नेता बन बैठे, लेकिन यह नहीं है कि समाज में महिलाओं को वह स्थान क्यों हासिल नहीं हुआ.

यही नहीं इस अध्ययन को तर्क कर दिया गया कि नेतृत्वविहीन समूह दोस्ताना रवैए वाले और करिश्माई नेताओं की जगह ‘आत्ममुग्ध या दंभी’ नेता चुन लेते हैं. इसी तरह महिलाओं के साथ हिंसा की वजह पर भी ज्यादा जिक्र नहीं है. करीब चार सौ पन्ने की किताब में शायद इतना ब्योरा मुमकिन नहीं है!

यह पुस्तक मानवजाति के प्रति नया नजरिया पेश करती है. ब्रेख़मान ने मनुष्य के स्वभावत: लालची, स्वार्थी और पापी होने के हॉब्स से लेकर रिचर्ड डॉकिंस तक की दलीलों को ऐतिहासिक और दार्शनिक आधार पर खारिज कर दिया है. क़ायल कर देने वाली उनकी हर दलील का नतीजा यही निकलता है कि इनसान बुनियादी तौर पर प्यार, परस्पर विश्वास, सहयोग और दया भाव की वजह से इतना विकास कर रहा है.

ऐसे समय में जब बीती बातों को सिर्फ गलत वजहों से ही उद्धृत किया जा रहा है, तब इसकी जरूरत सबसे ज्यादा है. लिहाजा, अख़बार, टीवी और सोशल मीडिया से थोड़ा वक्त निकालकर ज्यादा से ज्यादा लोगों को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए.


ह्यूमनकाइंड: मानवजाति का आशावादी इतिहास
लेखक:
रुत्ख़ेर ब्रेख़मान
अनुवादक: मदन सोनी
प्रकाशक: मंजुल पब्लिशिंग हाउस, भोपाल
कीमत: 499 रुपए

‘‘मनुष्य के जन्मजात रूप से स्वार्थी होने के मत (डॉक्ट्रिन) की पश्चिम के विधान (कैनन) में पवित्र परंपरा रही है...मानव प्रकृति से संबंधित धारणाओं के मामले में पश्चिमी चिंतन में व्याप्त निरंतरता चौंकाने वाली है’’

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