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पुस्तक समीक्षाः दलित आंदोलन की गहरी सामाजिक पड़ताल

जाति व्यवस्था के कई अनछुए पहलुओं को तथ्यों के साथ रखा गया है. दूसरा मुख्य कारण था, दास प्रथा. केरल की जाति व्यवस्था यहां की दास प्रथा का मुख्य कारण थी.

केरल में सामाजिक आंदोलन  और दलित साहित्य केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य

नीरज कुमार मिश्र

दलित साहित्य का गहरा संबंध सामाजिक आंदोलनों से है. फुले और डॉ. आंबेडकर की सक्रियताओं और उर्वर चिंतन से पोषित दलित आंदोलन का स्वरूप अखिल भारतीय है. हिंदी के दलित विमर्श में ले-देकर मराठी के दलित आंदोलन का संदर्भ आता है. भारत के अन्य प्रांतों और भाषाओं में रचे जा रहे दलित साहित्य की तरफ प्राय: ध्यान नहीं दिया जाता.

इस कमी को कुछ हद तक दलित साहित्य के समर्पित अध्येता बजरंग बिहारी तिवारी दूर कर रहे हैं. कुछ वर्ष पहले प्रकाशित उनकी किताब भारतीय दलित आंदोलन और चिंतन इस दिशा में उल्लेखनीय है. इसी तरह 2016 में आई उनकी किताब बांग्ला दलित साहित्य: सम्यक अनुशीलन पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में चले दलित साहित्य आंदोलनों का विवेचन करती है. केरल के सामाजिक आंदोलनों का अपना एक इतिहास है.

इन आंदोलनों से उस समय का दलित समाज और साहित्य कितना प्रभावित हुआ है? इसका मुकम्मल जवाब तिवारी की हाल ही छपी पुस्तक केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य में मिल जाएगा. लेखक ने 1800 से 2010 के कालखंड में समूचे केरल के सामाजिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक घटनाक्रमों का ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आलोक में 26 अध्यायों में सूक्ष्म-विश्लेषण किया है. मलयालम के दलित साहित्य पर हिंदी में अपने ढंग की यह पहली किताब है.

केरल के सामाजिक आंदोलन के मुक्चय कारणों में से पहला कारण जाति व्यवस्था थी. पुस्तक में उसे समझने के अहम टूल्स दिए गए हैं, जिनके सहारे आप केरल के सामाजिक ताने-बाने को समझ सकते हैं. जाति व्यवस्था के कई अनछुए पहलुओं को तथ्यों के साथ रखा गया है. दूसरा मुख्य कारण था, दास प्रथा. केरल की जाति व्यवस्था यहां की दास प्रथा का मुख्य कारण थी. दास प्रथा के क्रूरतम साक्ष्य पुस्तक में दर्ज होकर उस समय की गवाही देते देखे जा सकते हैं. सवाल उठता है कि दासों ने अपने ऊपर हो रही क्रूरता का विरोध क्यों नहीं किया? लेखक ने इसके कई कारण गिनाए हैं.

केरल के सामाजिक आंदोलन का तीसरा मुक्चय कारण था धर्मांतरण. पर्दे के पीछे धर्मांतरण के सच को तथ्यों के साथ उद्घाटित किया गया है. समाज व्यवस्था में ठहराव या परिवर्तन का एक कारण भू-संबंधों में निहित होता है. केरल की जाति व्यवस्था भू-संबंधों पर ही टिकी थी. लेखक ने मलयाली समाज में चल रहे भूमि सुधार आंदोलन के ऐतिहासिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य को समझाने का श्रमसाध्य प्रयास किया है.

केरल के आध्यात्मिक और जाति संगठनों की ओर से समाज सुधार का अहम प्रयास रेनेसां के नाम से जाना जाता है. बीसवीं शताब्दी का पहला दशक केरल रेनेसां का साक्षी बना. उसी रेनेसां के बीज केरल की दास प्रथा उन्मूलन की लंबी प्रक्रिया में मौजूद दिखाई देते हैं.

 केरल के सामाजिक आंदोलनों ने यहां के साहित्य को बहुत प्रभावित किया. 1940 से वहां की सामाजिक परिस्थिति में एक नया मोड़ दिखाई पड़ता है. उस समय दलितों को देखने की दो विचारधाराएं समांतर चलती दिखाई देती हैं: गांधीवाद और दूसरा मार्क्सवाद. पहली विचारधारा सामाजिक ढांचे में सुधार चाहती है तो दूसरी विचारधारा उस समाज में आमूल परिवर्तन के लिए इंकलाब. उस समय का मलयाली साहित्य इन्हीं दो विचारधाराओं की धुरी पर घूमता दिखाई देता है.

यह पुस्तक केरल के सामाजिक आंदोलनों के साथ वहां के समूचे साहित्यिक वांग्मय से भी परिचित कराती है. भाषा के प्रति सजग लेखक की छोटे-छोटे वाक्य-विन्यासों से निर्मित शैली ने गंभीर पुस्तक को पठनीय बना दिया है. इसमें मलयालम दलित साहित्य की प्रकृति और प्रवृत्ति का सूक्ष्म आलोचनात्मक विश्लेषण है.

पुस्तक का शीर्षक केरल में सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य है. इस लिहाज से देखें तो लेखक का मन सामाजिक आंदोलनों में ज्यादा रमा है जिसकी वजह से साहित्य पक्ष कमजोर पड़ा है. इन सबके बावजूद केरल के सामाजिक आंदोलन और दलित साहित्य से जुड़े तमाम सवालों के जवाब इस पुस्तक में मिल जायेंगे. केरल के सामाजिक और साहित्यिक परिदृश्य को जानना है तो इस पुस्तक से गुजरना होगा.

केरल में सामाजिक आंदोलन 
और दलित साहित्य 
लेखक: बजरंग बिहारी तिवारी 
प्रकाशक: नवारुण प्रकाशन, गाजियाबाद
कीमत: 490 रु.

—नीरज कुमार मिश्र

आलम आरा की जुबेदा

इस साल पहली बोलती फिल्म आलम आरा को बने 90  साल हो गए हैं. उसकी नायिका जुबेदा पर यह किताब छोटे-छोटे नौ अध्यायों में अहम सूचनाएं देती है. उन्होंने गुले बकावली के साथ-साथ नंद का लाला में भी काम किया जो कि 30 के दशक में फिल्म जगत की प्रगतिशीलता को रेखांकित करता है. जुबेदा पर यह आधारभूत पुस्तक है पर यह पाठकों को पूरी संतुष्टि नहीं देती. इस विषय पर और काम किए जाने की दरकार है.

बोलती फिल्म की प्रथम नायिका जुबेदा 
लेखक: शिवानंद कामड़े 
प्रकाशक: सरस्वती बुक्स, 
भिलाई, छत्तीसगढ़
मूल्य: 150 रु.

लय-ताल से ज्यादा कहन की फिक्र
पत्रकारों का एक तबका ऐसा रहा है जो खबरों की दैनिक भागदौड़ के बीच जीवन के द्वंद्व की रचनात्मक इमेजरी तलाशता-तराशता चलता है. ऐसे ही खबरनवीस राज कुमार सिंह ने वे विंब गजलों-नज्मों के संग्रह हर किस्सा अधूरा है में उतारे हैं. ‌जिंदगी, जमीर और बीच के ऊहापोह को बयां करने में वे शेर-मिसरों की भीतरी लय-ताल से ज्यादा कहन की फिक्र करते हैं. परंपरा से हटकर उनकी गजलें शीर्षकयुक्त हैं.

हर किस्सा अधूरा है
लेखक: राज कुमार सिंह 
प्रकाशक: राधाकृष्ण पेपरबैक्स, दिल्ली
कीमत: 199 रु.

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