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संगत पुरानी रंगत नई

कोरोना के चलते उपजे अंतराल के बाद फिर चल पड़ा साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्सवों का सिलसिला

ज्ञान चतुर्वेदी: व्यंग्यकार ज्ञान चतुर्वेदी: व्यंग्यकार

महामारी और लॉकडाउन की हदबंदियों से बाहर निकलते हुए पिछले हफ्ते इंडिया टुडे के साहित्यिक-सांस्कृतिक आयोजनों के सिलसिले की फिर से शुरुआत हुई. इंडिया टुडे रचना उत्सव के कुल तीन सत्रों वाले भोपाल संस्करण का शनिवार को ऑनलाइन आयोजन हुआ. पहले सत्र में मशहूर शायर राजेश रेड्डी से बातचीत शुरू करने से पूर्व इंडिया टुडे हिंदी के संपादक अंशुमान तिवारी ने पीरजादा कासिम का यह शेर पढ़ते हुए एक भूमिका तैयार की: एक से सिलसिले हैं सब, हिज्र की रुत बता गई/फिर वही सुबह आएगी, फिर वही शाम आ गई. हालात धीरे-धीरे बेहतर होते जाने से आगे के उत्सव सुधी श्रोताओं की जीवंत मौजूदगी में होने की संभावनाएं तेजी से बढ़ रही हैं. उस लिहाज से यह मौके के मुताबिक बेहद मौजूं शेर था.

मुंबई से ऑनलाइन जुड़े राजेश रेड्डी पूरी लय में नजर आए. उन्होंने अपनी मशहूर गजलें (कुछ तो तरन्नुम में) सुनाईं ही, गजलगोई के अपने पूरे सफर पर भी बीच-बीच में गुफ्तगू करते गए. अपनी कुछ चुनिंदा गजलों के अलावा लॉकडाउन के दौरान रचे कुछ शेर भी सुनाए. जैसे आज की दुनिया के हालात को आईने में रखता यह शेर: यूं देखिए तो आंधी में बस इक शजर गया, लेकिन न जाने कितने परिंदों का घर गया. और यह भी कि यहां हर शख्स हर पल हादसा होने से डरता है, खिलौना है जो मिट्टी का फना होने से डरता है.

उनकी शायरी में बच्चे इतना क्यों आते हैं: शाम को जिस वक्त खाली हाथ घर जाता हूं मैं, मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूं मैं. रेड्डी के ही शब्दों में, ''बच्चे मेरी शायरी में जान-बूझकर नहीं बल्कि नितांत स्वाभाविक ढंग से आए हैं.जैसे नासिर काजमी के यहां उदासी बहुत है, (फैज अहमद) फैज साहब गुल, गुलशन और बहार के बहाने से पूरे समाज और दुनिया का आईना रखते हैं. बच्चा पूरी दुनिया में मासूमियत का प्रतीक है, दुनिया कहां से कहां तक आ गई कि बच्चा बड़ा होने से डर रहा है.'' एकांतपसंद रेड्डी ने कुबूला कि लॉकडाउन के दौरान उन्हें पढऩे, बैठकर कई बातें महसूस करने और कुछ अलग तरह की गजले रचने का मौका दिया, जो शायद आम दिनों में मुमकिन न था.

दूसरे सत्र में दो युवा लेखक दिव्य प्रकाश दुबे और राकेश कायस्थ 'इश्क और अफसाना' मजमून पर बातें करते हुए चर्चा को खुसरो से शुरू कर आज के प्रॉब्लम ऑफ प्लेंटी तक लेकर आए. पहले प्रेम दिल में उपजने से लेकर माशूका के सामने व्यक्त हो पाने में ही महीनों लग जाते थे. कई प्रेमी तो पहले तल्ले पर रहती प्रेमिका की छवि के दीदार के लिए फर्श को गीला रखते थे. कोमल भावनाओं के लेखक दुबे ने कहा कि प्रेम का एक्सपर्ट होना कोई अच्छी बात नहीं है. ''शुरू में मैंने अपने आसपास के उन लोगों की कहानियां लिखी थीं जो कि नाकाम माने जाते थे. फिर धीरे-धीरे आज के प्रेम के पहलुओं पर आया और ये चल निकलीं. तो ऐसा कोई सायास कोशिश नहीं की थी कि मुझे राइटिंग में शाहरुख खान बनना है.''

युवा व्यंग्यकार कायस्थ ने लव जेहाद का जिक्र करते हुए कहा कि वैलेंटाइन डे के आसपास लम्हों को तेल पिलाना भी शुरू हो जाएगा. दोनों ने एक-दूसरे की भी चुटकी ली. हिंदी में गद्य लेखन को नई पहचान देने वालों में शुमार और इंजीनियरिंग का पेशा छोड़कर लेखक बने दुबे ने नई वाली हिंदी पर चर्चा के दौरान अपने ताजा उपन्यास इब्नेबतूती से जुड़ा अनुभव साझा किया. वे बता रहे थे कि कई युवाओं ने यह उपन्यास अपने अभिभावकों को पढ़ाए हैं, जिसके बाद उन्होंने अपनी युवावस्था का कोई रहस्य खोला है.

दुबे और कायस्थ ने कहानियों की एक ऑडियो सीरीज पर भी साथ काम किया है, जिसमें कायस्थ की मुंबई लोकल में सफर के अनुभवों पर लिखी कहानियां है. यह बात भी आई कि अब लेखन को पेशे के रूप में अपनाने के नजरिए से एक अच्छी बात यह हुई है कि किसी किताब पर फिल्म, सीरीज, पॉडकास्ट, किस्सागोई जैसे कई रास्ते खुल गए हैं.

रचना उत्सव के इस वर्चुअल संस्करण का तीसरा और आखिरी सत्र आज के इस कठिन दौर में व्यंग्य के स्पेस पर था. छह व्यंग्य उपन्यास लिख चुके हिंदी के शीर्ष व्यंग्यकार और स्वयं एक सर्जन ज्ञान चतुर्वेदी के पास एक बहुत पैनी प्रेक्षकीय दृष्टि है. उन्होंने महामारी के दौरान अस्पतालों में डॉक्टरों और मरीजों के व्यवहार में आए बदलावों के कुछ चौंकाने वाले किस्से सुनाए. उनसे बातचीत कर रहे थे एक अन्य व्यंग्यकार आलोक पुराणिक.

आपने कोरोना काल में क्या किया? इस सवाल के जवाब में, व्यंग्य लेखन में पचास वर्ष पूरे करने वाले चतुर्वेदी का कहना था कि रचनात्मक मोर्चे पर उनके पास इतना कुछ था कि घबराने वगैरह का समय ही न मिला. बुंदेलखंड पर बारामासी और हम न मरब के बाद त्रयी का तीसरा उपन्यास स्वांग इसी बीच उन्होंने पूरा किया; बारामासी का अंग्रेजी अनुवाद तैयार हुआ; और फिर 68 वर्ष की उम्र में उन्होंने पहली बार प्रेम को केंद्र में रखकर उपन्यास लिखना शुरू किया एक तानाशाह की प्रेमकथा.

उन्हीं के शब्दों में, ''मेरे लेखन और कुछ उपन्यासों पर इस बात का आरोप था कि उनमें स्त्रीपात्र सशक्त नहीं हैं. मेरे मन में दो साल से यह ऊलजुलूल किस्म का विचार था कि एक तानाशाह देशप्रेम करता है, उसी नाम पर तानाशाही चलती है. तो वह अगर प्रेम करे तो क्या होगा. यह पहला उपन्यास था जिसका नाम मेरे दिमाग में पहले ही आ गया था.''

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