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एक सरीखी सरजमीं पर

महामारी के दौरान भी कई अच्छी बातें देखने को मिलीं. उन्हीं में से एक था इस साल के लाहौर लिटरेरी फेस्टिवल में कई हिंदुस्तानियों का हिस्सा लेना.

अमिताभ घोष अमिताभ घोष

लेखिका झुंपा लाहिड़ी कहीं पर एक अदद जमीन के टुकड़े से किसी तरह का अपनापा न जुड़ पाने से भीतर ही भीतर जूझती रही हैं. लंदन में बंगाली माता-पिता के घर जन्मी और अमेरिका में पलीं-बढ़ीं लाहिड़ी के मन में स्वदेश या किसी एक जगह की होने का एक निश्चित एहसास कभी नहीं रहा. पिछले हफ्ते उन्होंने लाहौर लिटरेरी फेस्टिवल (एलएलएफ) के नौवें संस्करण में कहा, ''एक तरफ तो मुझे इसका गर्व है...

एक जगह का झंडा नहीं फहरा पाकर मैं कहीं ज्यादा अच्छी-भली हूं...हो सकता है इसी की बदौलत मैं दूसरी जगहों के झंडों को लेकर उत्सुक रह पाती हूं...साथ ही, पैदाइश के एक निश्चित बिंदु के एहसास की कमी है जिस पर न तो संदेह किया जा सकता है और न ही जिसे बदला जा सकता है.’’

इनसान के बनाए भूगोल के ढांचे के भीतर अपनी जड़ों के बारे में लाहिड़ी को बोलते सुनना खास तौर पर मर्मस्पर्शी था क्योंकि इस साल सीमाएं तिरोहित हो गईं. एक हिंदुस्तानी के लिए अपनी सरहद के उस पार सबसे बड़े फेस्टिवल में से एक की झलक देख पाना तकरीबन नामुमकिन है.

मगर फरवरी में हिंदुस्तान और पाकिस्तान के लोगों को एक दूसरे के कलह से बेजार इलाकों के भीतर ताक-झांक करने, दाखिल होने और ठहरने दिया गया. लाहौर और जयपुर दोनों लिटरेरी फेस्टिवल ऑनलाइन हुए, जिसकी वजह से कुछ सबसे ज्यादा हाजिरजवाब लोगों और उनके बीच संवाद तक वीजा-मुक्त पहुंच हासिल हो सकी. 

बात महज श्रोताओं-दर्शकों की भागीदारी की ही नहीं थी. दोनों देश सालों से समृद्ध सांस्कृतिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना चाहते रहे हैं, लेकिन सीमा-पार बुलावे भेजने के रास्ते बंद हो गए. 2021 अलहदा था. वर्चुअल या आभासी संसार में कोई नियंत्रण रेखा नहीं है, लिहाजा भारतीय वक्ताओं ने लाहौर का सफर किया और पाकिस्तानी वक्ता जयपुर में बोले.

एलएलएफ में भारतीय लेखकों के नामों की एक प्रभावशाली फेहरिस्त थी. इनमें राना सफवी, अमिताभ घोष, फारूख ढोंढी, श्राबणी बसु, सुनीता कोहली और कई अन्य थे. फेस्टिवल उपमहाद्वीप के साझा अतीत को शृद्धांजलि की तरह लगा.

पिछले साल एलएलएफ जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कला इतिहास की प्रोफेसर कविता सिंह को बुलाने के लिए खासा उत्सुक था, लेकिन यह इस साल मुमकिन हो सका, वह भी इसके डिजिटल अवतार के तोहफे की बदौलत. कविता सिंह पाकिस्तानी कला इतिहासकार सलीमा हाशमी के साथ संवादरत थीं.

हाशमी ने दोनों देशों के बीच कई शांति पहलों की अगुआई की है. उनके सत्र का नाम था: डिकोडिंग द आर्टिस्टिक प्रोसेस: द मेकिंग ऑफ मिनिएचर्स इन द मुगल कोर्ट्स (कलात्मक प्रक्रिया के गूढ़ अर्थ समझना: मुगल दरबारों में मिनिएचर कला का निर्माण). इसमें साझा सांस्कृतिक विरासत पर चर्चा की गई. इसी तरह क्लेयर चैंबर्स की एंथोलॉजी देसी डेलिकेसीज़ के लोकार्पण के मौके पर दक्षिण एशियाई पाक कलाओं का संगम और साझा इतिहास सामने आया.

अध्येता और इतिहासकार वेंडी डोनिगर ने प्रमुख वक्ता के रूप में अपने भाषण में पाकिस्तान में घोड़ों के मिथकशास्त्र की चर्चा की. उनका व्याख्यान अतीत में मेलजोल के कई दृष्टांतों से भरा पड़ा था. हिंदू अनुष्ठानों और मिथकों में अरबी घोड़े और/या मुस्लिम घुड़सवार शामिल थे.

उन्होंने कहा, ''दिल्ली की सल्तनत या मुगल साम्राज्य के राजनीतिक प्रभुत्व के बावजूद या उसकी वजह से इस काल की भारतीय कहानियों में अरबी घोड़ों और मुस्लिम घुड़सवारों, दोनों को अनुकूल रोशनी में दिखाया गया है... कई सारे हिंदुओं ने घोड़े के तोहफों का वाहक होने की वजह से मुसलमानों का स्वागत किया.’’

घोड़ों में दिलचस्पी हो या न हो, लेकिन आगे बढऩे के लिए इस विचार को जरूर मन में संभालकर रखा जा सकता है: सरहदों की संप्रभुता के हाथों हमें बांटे जाने से पहले इस क्षेत्र में एकता हुआ करती थी.

—सुखदा टटके

 

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