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किताबेंः आज के काकोरी का सस्पेंस

कहानी में ट्रेन, ब्रिटिश कॉइन्स और एक जर्मन माउजर में छिपा है वह कोड जिसे डीकोड करने की जद्दोजदहद में छिपा है पूरा का पूरा सस्पेंस और थ्रिल.

कोड काकोरी कोड काकोरी

काकोरी अस्पताल के वार्ड में एक डेड बॉडी पड़ी है. लाश पूरी तरह काली पड़ चुकी है. डेड बॉडी पर सोने-चांदी के ब्रिटिश कॉइन्स पड़े हैं. हर सिक्के पर क्वीन विक्टोरिया की तस्वीर छपी है. कातिल ने लाश के सीने पर पीतल के थंब पिन से एक ए-4 साइज का कागज भी टैग किया है, जिस पर लिखा है—''हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’’. ये वही ''हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’’ है जो चंद्रशेखर आजाद ने 1924 में बनाई थी.

ये वही विक्टोरियन कॉइन्स हैं जो 9 अगस्त 1925 को काकोरी कांड में लूटे गए थे. तब क्रांतिकारियों का मकसद था अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ बारूदी जंग छेड़ना. बारूद उगलने वाले हथियार खरीदने के लिए लूटा गया था अंग्रेजों का खजाना. लेकिन चौरानबे साल बाद, अब क्या मकसद है, अब किसके खिलाफ है ये जंग, अब क्या इरादा है, अब क्यों बनाया गया है कोड काकोरी. 

कुछ ऐसा कथानक है कोड काकोरी नाम के इस नॉवेल का, जिसे एमेजॉन वेस्टलैंड एका ने प्रकाशित किया है. टीवी और अखबार के जाने-माने पत्रकार मनोज राजन त्रिपाठी का यह पहला उपन्यास है. इससे पहले वे अजय देवगन, परेश रावल, कार्तिक आर्यन और कृति खरबंदा की सुपरहिट फिल्म अतिथि तुम कब जाओगे पार्ट टू यानी गेस्ट इन लंडन के डायलॉग लिख चुके हैं.

1924 में काकोरी कबाब की रेसिपी बनी, जो आज देश और दुनिया के 7 स्टार मेन्यू में शामिल है. 1925 में काकोरी कांड हुआ, जिसका मुकदमा किंग एंपरर वर्सेज पंडित राम प्रसाद बिस्मिल के नाम से दो साल तक चला. 22 अगस्त 1927 को 115 पन्नों का फैसला आया जिसमें 12 को काला पानी और उम्रकैद की सजा हुई और 19 दिसंबर को रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां, राजेंद्रनाथ लाहिड़ी, रोशन सिंह को एक साथ फांसी दे दी गई.

त्रिपाठी के इस नॉवेल की कहानी 2019 की है, जिस वक्त कश्मीर से धारा 370 हटाई जा चुकी थी और सीएए के खिलाफ देश में हल्ला बोला जा रहा था. कहानी आज की है लेकिन इस कहानी में काकोरी कबाब की महक भी है और काकोरी कांड की दहक भी है.

नॉवेल के कैरैक्टर्स की बात की जाय तो यह कहानी असली काकोरी कबाब बनाने वाले खानसामे की तीसरी और आखिरी पीढ़ी के एक बुजुर्ग और उसकी बेटी के इर्दगिर्द घूमती है जो इतिहास की शिक्षक है. कहानी में एक भ्रष्ट पुलिस इंसपेक्टर और उसके दो बेटे भी हैं.

एक बेटा है होटल मैनेजमेंट पास आउट है और दूसरा एस्ट्रो फिजिक्स साइंटिस्ट है, जो नासा की एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी और नॉमनक्लेचर में सेलेक्ट हो गया है. किताब रोलरकॉस्टर की तरह तेजी से ऊपर ले जाती है और जबरदस्त रक्रतार के साथ नीचे लाती है. लेकिन खास बात यह भी है कि कहानी शुरू से आखिर तक जम कर हंसाती गुदगुदाती भी है.

सबसे अहम है इस कहानी का थ्रिल और सस्पेंस जो काकोरी कांड के साथ बेहद खूबसूरत अंदाज में पिरोया गया है. नॉवेल का डाइलेक्ट यानी संवाद बेहद चुटीला और गुदगुदाने वाला है. किताब का हर पन्ना हंसाता भी है और पढऩे वाले के भीतर सिहरन भी पैदा करता है. आज की जनरेशन के हिसाब से इस कहानी की भाषा लिखी गई है.

इसमें इस बात का पूरा ख्याल रखा गया है कि हिंदी को ऐसे परोसा जाय जिसे आम आदमी और यंग जनरेशन एक बार में समझ ले. कंटेंट में फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम के साथ-साथ हॉलीवुड-बॉलीवुड की फिल्मों का भी बखूबी इस्तेमाल किया गया है. सोशल मीडिया की भाषा को आज की नेचुरल हिंदी में लोगों तक पहुंचाने का जरिया बनाया गया है. नॉवेल पढ़ते वक्त कोई वेब सीरीज या फिल्म सामने दिखाई देती है.

कोड काकोरी का कवर बताता है कि कहानी में ट्रेन, ब्रिटिश कॉइन्स और एक जर्मन माउजर में छिपा है वह कोड जिसे डीकोड करने की जद्दोजदहद में छिपा है पूरा का पूरा सस्पेंस और थ्रिल. जिस फिल्मी अंदाज में यह नॉवेल लिखा गया है उसे पढ़कर सिर्फ एक लाइन में कहा जा सकता है कि 1924 में काकोरी कबाब, 1925 में काकोरी कांड और 2021 में काकोरी इज बैक.

कोड काकोरी
लेखक: मनोज राजन त्रिपाठी
एमेजॉन वेस्टलैंड एका
कीमत: 299 रुपए

—अश्वनी धीर

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