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पुस्तक समीक्षाः किस्सों में सभ्यता सार

चलते-फिरते मोबाइल पर लिखी गई ये बोध कथाएं कब वैदिक साहित्य से शुरू होकर रामायण, महाभारत में गोते लगाते हुए जातक कथा सागर में तैरने लगती हैं, पता ही नहीं चलता.

एकदा भारतवर्षे एकदा भारतवर्षे

राहुल देव

एक बार की बात है...‘ संसार की हर भाषा, देश और सभ्यता में बच्चों की सपनीली जादुई दुनिया और कल्पना जगत की शुरुआत इन शब्दों से ही होती है. इन्हीं से द्वार खुलते हैं उस उत्सुकता के जिसके माध्यम से हर बच्चे का अपने समाज, इतिहास, पुराण, शास्त्र, लोक और अपनी सांस्कृतिक परंपरा, संस्कारों, रीति रिवाजों से सहज और गहरा परिचय होता है. दादा-दादी, नाना-नानी से सुनी हुई ये कहानियां बाल चेतना में बीज के रूप में गहरे बैठ जाती हैं. और यूं समाज का सांस्कृतिक महाख्यान इन बाल स्मृतियों के रूप में पीढ़ी दर पीढ़ी जीवंत बना रहता है, परंपरा को आगे बढ़ाता रहता है.

लेकिन इस हजारों वर्ष पुरानी परंपरा को आधुनिकीकरण और उसके सामाजिक प्रभाव ने एक दो पीढिय़ों में ही समाप्त कर दिया है. संयुक्त परिवार अब अपवाद हैं. दादी-नानी की कहानियां भी कम से कम शहरों में लगभग कालकवलित हो चुकी हैं. आज के बच्चों के पास अपनी राष्ट्रीय सभ्यता-संपदा, जातीय स्मृतियों, सांस्कृतिक आत्मबोध से जुडऩे, उसे प्राप्त करने के लिए कोई सहज साधन उपलब्ध नहीं. सर्वत्र उपलब्ध है तो बस मोबाइल-इंटरनेट की महामायावी दुनिया जो उसके चित्त का नित्य हरण कर उसे जीवन के महाभारत में कौरव महारथियों से घिरे अभिमन्यु की नियति पर छोड़ देती है.

इसलिए हेमंत शर्मा की एकदा भारतवर्षे... की शुरुआती कहानियों को पढऩे के बाद ही विचार कौंधा कि काश!  मेरे बच्चे, वृहत्तर परिवार-मित्रों के बच्चे भी इसे पढ़ते. पर जानता था कि अंग्रेजी माध्यम में शिक्षित ये शहरी बच्चे नहीं पढ़ेंगे. इसलिए विचार आया कि मैं खुद इन कहानियों को अपनी आवाज में पढ़कर मित्रों, उनके बच्चों को भेज सकता हूं. भेजूंगा. इसलिए कि वे रुचि से हिंदी पढ़ते हों या नहीं पर उन्हें इस पुस्तक और इसकी कहानियों से वंचित नहीं रहना चाहिए.

एकदा भारतवर्षे... शीर्षक अमृतलाल नागर के अद्वितीय पौराणिक उपन्यास एकदा नैमिषारण्ये... की ही प्रतिध्वनि है, प्रेरित है. लेकिन वह नागर जी के भारतीय सभ्यता के महाभारतकालीन इतिहास की खोज में गंभीर पौराणिक, शास्त्रीय और ऐतिहासिक शोध पर आधारित अद्भुत उपन्यास है.

यह पुस्तक कथा संग्रह है जिन्हें अपने पुराणों, उपनिषदों, जातक कथाओं, बुद्ध चरित, कुछ विदेशी चरित्रों की कहानियों तथा मुख्यत: भारत के दो महानतम महाख्यानों रामायण और महाभारत की मूल संस्कृत सहित दूसरी भारतीय भाषाओं में रचित कथाओं से लिया गया है.

ये दो महाकथाएं भारतीय सभ्यता के महानद के दो तट हैं जिनके बीच कम से कम 4,000 साल से वह अजस्र और अप्रतिहत प्रवाहित होती आई है. हजारों साल पहले आज के सीतापुर के पास नैमिषारण्य के चक्रतीर्थ में ऋषि शौनक ने 88,000 ऋषियों के साथ 12 वर्ष का ज्ञान सत्र किया था.

ब्रह्मण ने इस ज्ञान सत्र के उचित स्थान को खोजने के लिए शौनक को एक चक्र दिया था, इस निर्देश के साथ कि जहां इसकी नेमि यानी बाहरी परिधि स्वयं ही धरती पर गिर पड़े वही जगह सही होगी. शौनक 88,000 ऋषियों के साथ सारे देश में घूमे, तब आज जो स्थान चक्रतीर्थ सरोवर का है वहां वह नेमि गिरी और वह अरण्य (वन) नैमिषारण्य तीर्थ बन गया.

एकदा भारतवर्षे... वैसा ज्ञान सत्र तो नहीं है लेकिन हेमंत ने उन ऋषियों की जगह हमारे आर्ष महापुरुषों तथा ग्रंथों के कथानकों से चुन चुन कर ऐसे कथा रूपी ज्ञान कण एकत्र किए हैं जो आज इस देश-काल में हमारी अगली पीढिय़ों के जीवन पथ को विराट विरासत की विभूतियों से परिचय के माध्यम से आलोकित, आत्मबोध-युक्त कर सकते हैं.

पुस्तक की सफलता इसमें है कि वह पाठक में वही उत्कंठा जगाती है जो हमारे बचपन की स्मृतियों में 'एक बार की बात है’ से शुरू होने वाले जादुई अनुभवों के संसार के दरवाजे खोलती थी. संसार की हर सभ्यता, संस्कृति का रस उसकी कहानियों, किस्सों, परीकथाओं से लेकर महाकाव्यात्मक महाख्यानों के माध्यम से उन्हें सदी दर सदी जीवंत और प्रवाहमान बनाए रखता है. भूमिका में हेमंत भारत ही नहीं वैश्विक सभ्यताओं की इसी कथा परंपरा का इतिहास हमारे सामने रखते हैं.

अपनी निपट बनारसी अड़ी की अक्सर अमर्यादित हो जाने वाली बहसों, शाब्दिक झड़पों को शांत करने के विचार से चलते फिरते, मोबाइल पर लिखी गई ये बोध-कथाएं कब वैदिक साहित्य से शुरू होकर पुराणों के आख्यानों, रामायण, महाभारत, भागवत में गोते लगाते हुए धीरे से बुद्ध चरित के अपार सारवान जातक कथा सागर में तैरने लगती हैं, पता ही नहीं चलता. हेमंत ने इन पुरा कथाओं के अपने मौलिक, आधुनिक कथन को समकालीन सामाजिक यथार्थों के संदर्भो के भीतर रखते हुए सनातन और समकालीन के बीच सुंदर पुल भी बना है.

जानने वाले जानते हैं कि हेमंत शर्मा एक अदम्य और विकट किस्सागो हैं. वे पत्रकार बेहतर हैं या किस्सागो यह तय करना कठिन है. कहानियां, किस्से, संस्मरण मौके की तलाश में जैसे उनके भीरत निरंतर बहते रहते हैं कि कब सुनने वाले जुटें और हम प्रकट हों. यह किस्सागोई संग और प्रसंग के अनुकूल परम शालीन, शास्त्रीय से लेकर लोकविनोद की शुद्ध बनारसी भदेस शैली के बीच सहज संचरण करती रहती है.

लेकिन इस काशीपुत्र ने अपने पिता से प्राप्त ज्ञान, संस्कार, शैली और विरासत को निभाते हुए यह जो पुस्तक पुष्प हिंदी को दिया है वह पिछली प्रशंसित पुस्तकों की ही तरह शुभ और सारवान है, सराहा जाएगा. इन कहानियों को सिर्फ पढ़ा ही नहीं, अन्य माध्यमों से भी अगली पीढिय़ों तक पहुंचाया जाना चाहिए.

किताबः एकदा भारतवर्षे
लेखकः हेमंत शर्मा 
प्रकाशकः प्रभात प्रकाशन, दिल्ली 
कीमत: 700 रुपए

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