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पुस्तक समीक्षाः छोटी बातों के बड़े निहितार्थ

पिछली गली और मन्नत टेलर्स की पृष्ठभूमि में भी परिवार है लेकिन अपने व्यापक अर्थों में ये बाजारवाद के दो अलग-अलग पक्षों को सामने लाती हैं.

 मन्नत टेलर्स मन्नत टेलर्स

देवेंद्र राज अंकुर

इधर दो-तीन वर्षों में प्रज्ञा की कुछ कहानियां पत्र-पत्रिकाओं में पढऩे का अवसर मिला था लेकिन अब पिछले दिनों आए उनके कहानी संग्रह मन्नत टेलर्स में प्रकाशित ग्यारह कहानियां एक साथ पढ़ डालीं. जिस चीज ने मेरा ध्यान सबसे पहले आकर्षित किया वह यह कि कहानीकार ने लगभग सभी कहानियों का ताना-बाना छोटी-छोटी बातों के इर्द-गिर्द बुना हैो

 चाहे वह लो बजट में एक मध्यवर्गीय परिवार की ठीक-ठाक घर खरीदने की कोशिश हो अथवा बतकुच्चन में दो बहनों को मौसी की बेटी के ब्याह में न बुलाए जाने की तकलीफ. तेरहवीं दस्तक में एक किशोर बच्ची का शारीरिक और मानसिक उलझनों से सामना है तो जिंदगी के तार में एक औरत की आर्थिक कष्टों से गुजरने की लंबी लड़ाई. लेकिन आखिर तक पहुंचते-पहुंचते ये कहानियां पर्यावरण, सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों के व्यापक संदर्भ से जुड़ जाती हैं.

मजे की बात यह है कि लेखिका हर बार किसी न किसी परिवार से जोड़कर उसमें रहने वाले लोगों की जिंदगी में भीतर तक पैठ जाती है. इस दृष्टि से पिछली चार कहानियों के अलावा उलझी यादों के रेशम, परवाज और अंधेरे के पार को विशेष रूप से रेखांकित किया जाना चाहिए. पत्नी की मृत्यु के बाद खाली घर में पागलपन की हद तक अकेले पड़ते जाने वाले पिता की स्मृति में बेटी की रची गई बहुत ही मार्मिक कहानी है उलझी यादों के रेशम. यही बात परवाज की खुशबू के बारे में कही जा सकती है,ो

जहां एक रुढ़िवादी परिवार के भीतर से एक लड़की अपना अलग व्यक्तित्व बनाने की कोशिश करती है. अंधेरे के पार का परिवेश बहुत ही जाना पहचाना है, जिसमें दो अलग अलग पात्र पूर्णिमा और उमाकांत अपने अपने परिवारों की स्थिति को सुधारने में लगे हैं. लगातार संभावना-सी लगती है कि शायद ये दोनों भी आपस में 'सेटल’ हो जाएं—लेखिका ने ऐसी कोई पहल नहीं होने दी है, यह देखकर अच्छा लगता है. 

आखिर वह कौन-सी बात है जो मन्नत टेलर्स की कहानियों को इधर लिखी जा रही दूसरी कहानियों से अलग करती है? इसका सीधा-सा उत्तर यही है कि कहानीकार ने किसी भी तरह के ओढ़े हुए शिल्प, फॉर्म और कारीगरी से अपने को अलग रखा है—सहज, अनायास और एक सीधी रेखा में चलती कहानी. इसके बावजूद यदि कहानी आपको अच्छी लगती है तो सिर्फ इसलिए कि उसमें कहानीपन मौजूद है.

यदि किसी कहानी में अलग से कोई संरचना आई भी है तो कहानी का कथ्य उसके लिए जिम्मेदार है. मसलन, उलझी यादों के रेशम स्मृतियों के सहारे सीधी रेखा में चल ही नहीं सकती. एक झरना जमींदोज परीकथा के तेवर लिए है तो किस्सागो की उपस्थिति सहज स्वीकार्य है. बतकुच्चन दो बहनों के बीच टेलीफोन पर संवाद के माध्यम से आगे बढ़ती है. मुझे नहीं लगता कि यह कहानी किसी और शिल्प में लिखी जा सकती थी.

इस संग्रह की दो कहानियां—पिछली गली और मन्नत टेलर्स की पृष्ठभूमि में भी परिवार है लेकिन अपने व्यापक अर्थों में ये बाजारवाद के दो अलग-अलग पक्षों को सामने लाती हैं. पिछली गली यदि विस्थापन की कहानी है तो मन्नत टेलर्स एक तरह से विस्थापन से सुख-समृद्धि की ओर बढ़ने की यात्रा है.

बेशक सभी कहानियों का अंत बहुत ही अप्रत्याशित होता है लेकिन यह हमेशा सकारात्मक और मानवीय रहता है. इसीलिए ये कुल मिलाकर एक मुश्किल समय में उम्मीद की कहानियां बन जाती हैं.

—देवेंद्र राज अंकुर

किताबः मन्नत टेलर्स
लेखक: प्रज्ञा
प्रकाशकः साहित्य भंडार, प्रयागराज 
कीमत: 125 रुपए

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