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किताबेंः कुमार पर लयकारी

कबीर को गाने वाले स्वनामधन्य कुमार गंधर्व पर एक महत्वपूर्ण किताब

कबीर को गाने वाले स्वनामधन्य कुमार गंधर्व पर एक महत्वपूर्ण किताब कबीर को गाने वाले स्वनामधन्य कुमार गंधर्व पर एक महत्वपूर्ण किताब

सब कुछ मैं कैसे जान पाऊंगा? कितना ही ध्यान लगाया, कितना ही ज्ञान पाया, संगीत के अगम्य रूप की थाह मैं अब तक नहीं ले पाया हूं. संगीत अमूर्त है. उसके रागों और स्वरों का बोध हो पाना बड़ा दुरूसाध्य है. मैंने बेशक विकट तालों की, लयों की राह पकड़कर खोजने की कोशिश की है, अब तक न तो मैं उसकी थाह ले पाया हूं और न ही छोर तक पहुंच सका हूं''. पंडित कुमार गंधर्व के इस आत्मकथ्य  के साथ पुस्तक की शुरुआत होती है. इसके बाद शुरू होता है उन पर लिखे गए लेखों का सिलसिला.

कुमार पर लयकारी

कुमार गंधर्व की बेटी कलापिनी कोमकली और रेखा इनामदार-साने संपादित इस किताब को वाणी प्रकाशन और राजहंस प्रकाशन ने साझा प्रकाशित किया है. इसके दो खंड हैं, जिसमें कुमार जी के परिजनों, शिष्यों और करीबियों ने उन पर लेख लिखे हैं. ये लेख हिंदी, अंग्रेजी और मराठी भाषा में हैं. चूंकि सभी लेख अलग-अलग हैं, इसलिए पाठक को यह आजादी है कि वह किताब को कहीं से भी पढ़ सकता है. कुमार जी की गायकी, उनके संस्कार, उनकी सोच और उनके अंदाज को जानने-समझने का इससे अच्छा विकल्प नहीं हो सकता.

कुमार जी के बारे में लिखी गई कुछ पंक्तियों का उल्लेख जरूरी है. उनकी बेटी कलापिनी कोमकली लिखती हैं: ''कुमार जी के सान्निध्य में जीवन को देखने-समझने की अलग ही दृष्टि पाई. मेरे लिए संगीत मुझे बार-बार बाबा से मिलाने की प्रक्रिया है.'' प्रभाष जोशी जी लिखते हैंरू ''कुमार गंधर्व सिर्फ गायक नहीं हैं. कन्नड़ जिनकी मातृभाषा है और मराठी दूसरी भाषा, उन कुमार जी से आप हिंदी की भक्ति कविता पर चाहे जैसे बात कर लीजिए...कबीर को गाकर जैसी व्याख्या कुमार गंधर्व ने की है, वैसा तो खैर कोई कर ही नहीं सकता. दूसरे कई शास्त्रीय गायकों की तुलना में कुमार गंधर्व ऊंचे बैठते हैं क्योंकि वे कुलीगीरी नहीं करते.'' रामाश्रय झा, मधुप मुद्गल, शुभा मुद्गल और मोहन नाडकर्णी वगैरह के कुमार जी पर लिखे गए लेख अद्भुत हैं. इसके अलावा कुमार जी से रमेशचंद्र शाह, राहुल बारपुते और मंगलेश डबराल की बातचीत है, जिसे पढऩा पूरी एक परंपरा से रूबरू होना है.   

कालजयी कुमार गंधर्व

लेखकः कलापिनी कोमकली और रेखा इनामदार-साने

प्रकाशकः वाणी और राजहंस प्रकाशन

कीमतः 800 रु.

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